आओ देश के मज़दूर इतिहास को जानें!

अतीत और विरासत को जानकर ही खुबसूरत भविष्य का संघर्ष आगे बढ़ता है!

आइए, अपने देश के मज़दूर संघर्षों के इतिहास को जाने, ताकि अपनी विरासत से प्रेरणा ले सकें। इसी उद्देश्य से यह श्रृंखला हम शुरू कर रहे हैं, जिसमें भारत में उद्योग-धंधों के विकास के समय से लेकर अबतक के मज़दूरों के शोषण, दमन, हालत, संघर्ष, कुर्बानी, मिलते व छिनते अधिकारों की कहानी हम बताने की कोशिश करेंगे।

लगभग पौने दो सौ वर्षों के लम्बे इतिहास को थोड़े में समेटने से इसमें कई कमियां-कमजोरियाँ रहेंगी। इन सीमाओं के बावजूद हमारा प्रयास मज़दूर साथियों के सामने अतीत की एक जीवंत तस्वीर उभारने की है।

पहली किस्त

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आएंगे उजले दिन, ज़रूर आएंगे!

जो रोटी का युद्ध करेगा
वह रोटी को आप वरेगा।
(मुक्तिबोध)

मज़दूर वर्ग का शानदार इतिहास बेइन्तहां संघर्षों और कुर्बानियों से भरा पड़ा है। जिसमें जीत और पराजय की अनगिनत कहांनियां हैं। यह तबसे जारी है जबसे मानव द्वारा मानव के शोषण की शुरुआत हुई। दौर बदला, हालात बदले और उद्योग धंधों के विकास ने शोषण का यह नया दौर शुरू हुआ। जहाँ स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के नारों और ‘सबको चुनने व चुने जाने’ का अधिकार मेहतकशों के लिए महज छलावा बन गया है।

जिस समाज में अन्न पैदा करने वालों के बच्चे भूखे पेट सोने को मजबूर रहते हैं। कपड़े का उत्पादन करने वालों के तन पर कपड़े नहीं होते और जहाँ हक़ की बात करना तक गुनाह बन जाता है।

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आज हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहाँ हर चीज मुनाफे और बाजार के मातहत है। अगर पैसा है तो इलाज कराओ, वर्ना मरते रहो! अंतिम संस्कार तक के लिए टेंट में रुपये चाहिए। पुलिस-थाना, कानून तक पैसों में बिकता है। खुदा न खास्ता अगर किसी मुकदमें में फंस गये (या फसा दिये गये) तो जेल से बाहर आने के लिए जमानत देने-लेने की भी औकात चाहिए।

मज़दूर का जीवन संघर्षों का जीवन है

लेकिन हालात कितने भी बुरे हों, मज़दूर का जीवन ही संघर्षों का जीवन है। पूरी दुनिया का भी और हमारे देश का भी इतिहास मज़दूर वर्ग के संघर्षों का इतिहास है। ये संघर्ष महज वेतन-भत्ते की लड़ाई नहीं है। यह तो गुलामी की जिन्दगी जी रहे मेहनतकश की मुक्ति की लम्बी लड़ाई का महज छोटा सा हिस्सा है। जो मेहनतकश को सम्मानजनक जीवन पाने और आदमी द्वारा आदमी के शोषणकारी व्यवस्था के खात्मे की लड़ाई है।

एक ऐसे खूबसूरत समाज को बनाने की लड़ाई है, जहाँ हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी, बीमार को मुफ्त इलाज मिले। इससे भी उन्नत उस समाज का सपना साकार हो जिसमें आदमी भयमुक्त हो और अपनी ज़िन्दगी के फैसले खुद ले सके।

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हम पिछड़े हैं मगर क्यों?

आइए, एक अहम मसले से बात शुरू करें। अक्सर बात होती है कि फैक्ट्री में तो मज़दूर समय से पहुँचता है, अनुसाशित रहता है, लेकिन बाकी जगह समय का पालन नहीं करता, यहाँ तक कि अपनी बैठकों में भी देर से पहुँचता है। यह भी देखा जाता है कि आधुनिक मशीनों पर काम करने के बावजूद मज़दूर अक्सर अंधविश्वासों में फंस जाता है। इसका कारण भी हमारे अतीत में है, इतिहास में है।

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ग़ुलामी ने स्वाविक विकास को कुंद कर दिया

भारत में औद्योगिक मज़दूरों की पैदाइश बहुत ही दुखदाई और कठिन स्थितियों में हुई। देश में जब अंग्रेज आतताई आए तो उस वक्त यहाँ का हस्तशिल्प व कुटीर उद्योग काफी विकसित था। ढाका का मलमल तो आज भी किस्से कहानियों में जीवित है।

तो हुआ यह कि सबसे पहले अंग्रेज व्यापारियों ने अपने स्वार्थ में यहाँ के परम्परागत उद्योगों को तबाह कर दिया। इससे भारी पैमाने पर अपने फन के माहिर कारीगर तबाह और बेरोजगार हो गये। ये उजड़े कारीगर गाँव की ओर लौटने और भूमिहीन किसान बन दुर्दिन झेलने को मजबूर हुए।

दूसरी तरफ, पुराने भारतीय समाज का लम्बे और कष्टप्रद दौर में विघटन, यहाँ पूँजीवाद के विकसित होने की बेहद धीमी गति, उत्पादन की प्राचीन पद्धति के खात्में और नये उद्योग-धंधों के विकास के बीच लम्बे समय के अन्तराल ने भारतीय मज़दूर वर्ग के शुरुआती दौर में भारी समस्याएं पैदा कर दी थीं।

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जब देश में आधुनिक उद्योगों, कल-कारखानों और रेलवे का विकास हुआ तब देश के पुराने कारीगरों की तीसरी पीढ़ी जवान हो चुकी थी। जो अपने पुरखों के फन से पूरी तरह कटी हुए थी। यूरोप में जब आधुनिक उद्योग पनपे तब वहाँ के दस्तकार और करीगर उन कारखानों की रीढ़ बने थे। इसके विपरीत हमारे मुल्क में अकुशल मज़दूरों की नयी फौज खड़ी थी, जो बेहद दरिद्रता का जीवन जी रही थी।

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रुढ़िवादी विचारों के साथ बने आधुनिक मज़दूर

इस स्थिति में दो दुखदाई बातें हुईं। एक, इन मज़दूरों का मनमाने रूप से खून निचोड़ना और आसान बना। दूसरे, वे खेती किसानी से उजड़ कर तो आए, लेकिन रोजगार की अनिश्चितता उन्हें गाँव और जमीन से भी जोड़े रखा। एक लम्बा ग्रामीण जीवन जीने के कारण काम करने की एक मंथर गति और तमाम पिछड़ी प्रवृतियाँ उनके जीवन का अभिन्न अंग बनी रहीं। रूढ़ीवादी विचार लिए वे आधुनिक मज़दूर बने। इसका लाभ उठाकर भारत के देशी व अंग्रेज पूँजीपति मज़दूर आबादी में कथित भारतीय परम्परा के बहाने अंधविश्वास भरने तथा जाति-क्षेत्र के नाम पर बाँटने का खेल खेलने लगे। यह एक ऐसा फार्मुला बना जो मेहनतकशों के क्रान्तिकारी संघर्षों को रोकने या पीछे ढ़केलने का हथियार बनता रहा।

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कमोबेश यह स्थिति आज तक बरकरार है और मज़दूरों की एक आबादी आज भी इस हथियार का शिकार बनती है। बल्कि आज मज़दूर इसके सबसे अधिक शिकार हैं।

समय आदि का पालन न करना भी इसी पुरानी बीमारी के कारण है। यही नहीं उसे तरह-तरह के अंधविश्वासों में फंसाना आसान रहता है। इसरूप में हमारे मुल्क का मज़दूर यूरोप कस मज़दूर से भिन्न है।

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इन्हीं स्थितियों में भारत में कल-कारखानों के विकास के साथ आधुनिक दौर का मज़दूर पैदा हुआ। बेहद कठिन परिस्थितियों में कष्टप्रद संघर्षों से पराजय व जीतों के साथ एक-एक इंच अधिकारों को हसिल करते हुए आगे बढ़ा।

(क्रमशः जारी…)

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