जुझारू तेवर के साथ कई प्रयोगों का गवाह कनोडिया जूट मिल आंदोलन

हावड़ा (पश्चिम बंगाल)। सन 1993-94 में हावड़ा जिले में स्थित कनोडिया जूट मिल आंदोलन उदारीकरण के शुरुआती दौर में बंद कारखानों के एक ऐतिहासिक आंदोलन के रूप में जाना जाता है। यहाँ पुरानी यूनियनों से त्रस्त मज़दूरों ने अपनी संग्रामी यूनियन बनाई, बंद मिल को खुलवाने के लिए एक साल लंबा जुझारू आन्दोलन चलाया।

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कनोडिया मिल का इतिहास

इस जूट मिल का मालिक पहले गगल भाई था, जिसकी कपड़े की मिलें थीं जिनकी पैकेजिंग के लिए उसने जूट मिल लगाई थी। इस मिल में महिला श्रमिकों सहित करीब चार हजार मज़दूर कार्यरत थे। यहाँ दो तरीके के जूट बनते थे – हैसियान (फाइन क्वालिटी) व सैकिंग (मोटा क्वालिटी)। बाद में इसको कनोडिया ने खरीद लिया और इसको कनोडिया जूट मिल के नाम से जाना जाने लगा। ’80 के दशक में जब देश में नए अर्थिक दौर की शुरुआत हुई, जूट मिलों को बंद करने की बारी आई, तब कनोडिया मिल भी बीआईएफआर के तहत बीमार घोषित हुआ। तब शिव शंकर पसारी ने यूनियनों से एक घटिया समझौता करके इस मिल को खरीदा था, जिसके तहत मजदूरों के वेतन से रोज 11 रुपये कटौती शुरू हुई। साथ ही मज़दूरों के तमाम बकाया बढ़ते चले गये।

बढ़ते अक्रोश से फूटा संघर्ष

बढ़ते संकट और लगातार कटौतियों के कारण मजदूरों में आक्रोश बढ़ रहा था। 1992 में मज़दूरों ने स्वतःस्फूर्त तरीके से जबरदस्त प्रदर्शन के साथ रेल रोका। मजदूरों में एक नए उत्साह का संचार हुआ। बाहर से कुछ लोगों ने मजदूरों को समर्थन दिया। इससे नई यूनियन बनाने की पहल आगे बढ़ी। मज़दूरों ने हस्ताक्षर अभियान शुरू किया। इससे कंपनी में और पुरानी यूनियनों में हड़कंप मच गया और पहल लेने वाले एक नेता बर जहांन पर प्राणघातक हमला कर घायल कर दिया। इसके बावजूद घायल बर जहांन ने गेट पर भाषण दिया और मजदूरों की 90 फ़ीसदी आबादी एकजुट हो गई। आम सभा में ‘कनोडिया जूट संग्रामी श्रमिक यूनियन’ बनाने का निर्णय बना और रजिस्ट्रेशन के लिए फाइल लगी। यूनियन में पूरी बॉडी मज़दूरों की ही बनी और एक सलाहकार समिति का गठन हुआ।

मिल बन्दी से नये तेवर में आन्दोलन

नवंबर 1993 में मालिक ने मिल को बंद कर दिया। इसके बाद कम्पनी गेट पर धरने के साथ जुझारू संघर्ष का नया दौर शुरू हुआ। मज़दूर ‘शिक्षा सेवक’ और गैर मज़दूर ‘सहयोगी बंधु’ का बैज लगाते थे। आंदोलन गेट से आसपास के गाँवों तक फैल गया था, क्योंकि ज्यादा मज़दूर निक़टवर्ती गाँव से ही थे। आंदोलन के क्रम में करीब 20 हजार लोगों के व्यापक जनउभार से रेल चक्का जाम हुआ। इस दबाव में तत्कालीन वामपंथी सरकार के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को वार्ता बुलानी पड़ी। वार्ता में मिल खोलने का तो निर्णय नहीं बना, लेकिन संग्रामी यूनियन को तत्काल पंजीकृत करने के आदेश के रूप में अहम सफलता मिली।

सामुदायिक रसोईघर : एक अहम प्रयोग

सामुदायिक रसोई इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। सबसे पहले गेट पर सामूहिक किचेन की शुरुआत हुई। बाद में इसका विस्तार गाँव तक हुआ और 54 गांव में सामुदायिक रसोईघर शुरू हुआ। जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सवर्ण, दलित सभी एक साथ खाना खाते थे, महिलाओं की भी पूरी भागीदारी थी। गौरतलब है कि इसके कुछ दिनों पूर्व निकटवर्ती बानी गाँव में हिंदू-मुस्लिम दंगा हुआ था। लेकिन आंदोलन ने उस कटुता को मिटा दिया। इस रसोई के लिए हावड़ा से लेकर कोलकाता, सियालदा तक अनाज से लेकर रुपया और दवाइयां तक चंदे में जुटाई जाती रहीं। इस दौरान तमाम स्वयंसेवकों ने बच्चों को पढ़ाने, हेल्थ चेक-अप व दवाइयों का वितरण करने आदि का भी काम बेहतरी से किया।

जब मज़दूरों ने खुद मिल चलाया

मज़दूरों ने निर्णय लिया कि मिल वे खुद चलाएंगे। मज़दूर ताला तोड़कर मिल के भीतर प्रवेश कर गये और अपना नियंत्रण कायम कर उत्पादन शुरू कर दिया। 15 दिनों तक मिल में जबरदस्त उत्पादन हुआ। कंपनी की परंपरा के अनुसार दो हफ्ते काम के बाद मजदूरों को वेतन देने का समय आया। यूनियन ने चंदा इकट्ठा करके मजदूरों को टोकन वेतन दिया और तैयार माल बेचने का निर्णय लिया। इससे मालिक और सरकार दोनों में हाहाकार मच गई। वामपंथी सरकार ने चारों तरफ पुलिस तैनात कर दिया। मज़दूरों की आमसभा हुई, जिसमें परिस्थिति को देखते हुए माल न बेचने का निर्णय बना। लेकिन मिल में अवैध प्रवेश के लिए मज़दूरों पर मुक़दमा हुआ। मज़दूरों की पैरवी के बाद कोर्ट ने फैसला दिया कि मज़दूर मिल में रह सकते हैं, लेकिन माल नहीं बेच सकते। इसके बाद मज़दूर मिल में बने रहे, लेकिन उत्पादन का कार्यक्रम स्थगित कर दिया।

महासंग्राम का आह्वान

इसके बाद मजदूरों ने महासंग्राम का आह्वान किया। एक साथ तीन कार्यक्रम बना- भूख हड़ताल और रेल व हाइवे अवरोध। सरकार ने चारों तरफ पुलिस तैनात कर दी। फिर भी मज़दूरों ने गोरिल्ला तरीके से रेल रोका, हाइवे अवरोध किया, पुलिस से मुठभेड़ भी हुई। मुक़दमें लगे, अनशनकारी प्रफुल्ल चक्रवर्ती सहित दो-ढाई सौ महिला-पुरुष की गिरफ्तारी हुई। लेकिन सरकार पर ज्यादा दबाव बना।

और संघर्ष रंग लाया खुल गया मिल

इस प्रकार एक साल तक यह पूरा आंदोलन चलता रहा। अंततः नवंबर 1994 में संग्रामी यूनियन के साथ समझौता हुआ और मिल खुला। सभी मज़दूरों को काम पर लिया गया, चाहे वह स्थाई मजदूर हों या फिर बदली। समझौते के तहत 11 रुपये प्रतिदिन की कटौती बंद हुई। बकाया किस्तों में देने का समझौता हुआ, जिसके तहत हर माह 5 लाख मिलना था। 15 दिन का बकाया वेतन मिला। यह आन्दोलन अपने जुझारूपन और संघर्ष के नए-नए तरीकों के लिए याद करने के साथ इस बात का भी उदाहरण है कि जब रोजगार और रोटी का संघर्ष आगे बढ़ता है, तो जाति व धर्म के फालतू झगड़े पीछे छूट जाते हैं।

(आन्दोलन के एक नेता अमृत पोईरा से बातचीत पर आधरित) (‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, जुलाई-अगस्त, 2019 से)

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