इतिहास में यूँ विकसित हुईं यूनियनें

आओ देश के मज़दूर इतिहास को जानें – 4

शोषण और दमन विद्रोह को जन्म देते हैं। भारत के मज़दूर आन्दोलन के इतिहास ने भी इसे साबित किया। 19वीं शताब्दी के अन्त में भारत के दमित-शोषित मज़दूरों ने संघर्षों के जिस सिलसिले की शुरुआत की थी, 20वीं सदी में उसने संगठित रूप अख्तियार करने लगा। तमाम चढ़ाव-उतार के दौरों से गुजरते हुए मज़दूर आन्दोलन नयी छलांगें ले रहा था…! इस सिलसिले की अगली कड़ी में यूनियनों-महासंघों की विकास यात्रा की झलक देखें…

धरावाहिक चौथी किस्त

पहली क़िस्त– आओ देश के मज़दूर इतिहास को जानें!

दूसरी क़िस्त – जब अमानवीयता की हदें भी पार हुईं

तीसरी क़िस्तमज़दूर इतिहास : मजदूरों ने ली शुरुआती अंगडाई

संघर्षों के साथ यूनियनों के बनने का दौर

निकले थे अकेले ही जानिबे मंजिल
लोग मिलते गये, कारवां बनता गया!

देश में मजदूर संघर्ष जैसे-जैसे आगे बढ़ते गये, संगठन बनाने के प्रयास भी तेज होते गये। 1905 में ‘कलकत्ता प्रिंटर्स यूनियन’ और 1906 में ‘ईस्ट इंडिया रेलवे इंपलाइज यूनियन’ के गठन शुरुआती महत्वपूर्ण सांगठनिक प्रयास के परिणाम थे। यह यूनियनें उस वक्त के संघर्षाें की देन थीं। हालांकि बी.पी. वाडिया के नेतृत्व में 1918 में ‘मद्रास लेबर यूनियन’/’मद्रास टैक्सटाइल वर्कर्स यूनियन’ बनी जिसे व्यवस्थित रूप से गठित पहली यूनियन के रूप में भी देखा जाता है। इसमें पहली बार नियमित सदस्यता व सदस्यता राशि देने की परम्परा शुरु हुई थी।

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दूसरी ओर 1918 में गाँधी माॅडल के रूप में ‘अहमदाबाद टैक्सटाइल लेबर एसोसिएशन’ की स्थापना हुई थी। इसमें पंच निर्णय के सिद्धांत की उत्पत्ति हुई जो कि एक जटिल प्रक्रिया और मुख्यतः मालिकों के रहमो-करम पर आधारित थी।

सोवियत क्रान्ति और नयी चेतना का विकास

सन 1920 आते-आते मजदूरों की सांगठनिक चेतना आगे बढ़ चुकी थी। 1917 में मज़दूर वर्ग की महान अक्टूबर क्रान्ति से सोवियत रूस में मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक सत्ता कायम हो चुकी थी। इसने पूरी दुनिया के मज़दूर वर्ग को मुक्तिकामी प्रेरणा प्रदान की। इससे पूरी दुनिया के मेहनतकशों की तरह भारत के मेहनतकश वर्ग के संघर्षों और सांगठनिक पहल भी तेज हुए।

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दूसरी तरफ प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 में गठित लीग ऑफ़ नेशन्स के एक हिस्से के तौर पर अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) बन चुकी थी। सोवियत क्रान्ति का एक दबाव और प्रभाव यहाँ भी काम कर रहा था। जहाँ सोवियत क्रान्ति पूरे मज़दूर वर्ग की मुक्ति की घोषणा थी, वहीं आईएलओ का घोषणा पत्र मानवता और सामाजिक न्याय पर आधारित था।

आईएलओ में भारत की भागेदारी

देश की बरतानवी सरकार ने अपने हित में आई.एल.ओ. में संस्थापक सदस्य के रूप में भारत को प्रवेश कराया और बी.पी. वाडिया को प्रतिनिधि नियुक्त किया। 1920 में आईएलओ के वाशिंगटन सम्मेलन हेतु बरतानवी सरकार ने एम.एन. जोशी को भारतीय प्रतिनिधि तथा लोकमान्य तिलक को सलाहकार नियुक्त किया। जबकि मजदूरों ने तिलक को अपना प्रतिनिधि चुना था। तिलक ने हुकूमत की इस बेईमानी की मुखालफत की और वाशिंगटन सम्मेलन में जाने से इनकार कर दिया।

मज़दूरों के पहले महासंघ एटक का गठन

इन्हीं हालात में सन 1920 में देश में मजदूरों का पहला महासंघ – आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) अस्तित्व में आया। तमाम स्थितियों से गुजरते हुए 7 जुलाई 1920 को मुंबई के परेल में आम सभा ने स्थापना सम्मेलन 22 अगस्त 1920 को कराने का प्रस्ताव पारित किया। लेकिन इसी बीच देश के स्वाधीनता आंदोलन व मजदूर संघर्ष को एक आघात लगा क्योंकि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया। लिहाजा सम्मेलन की तारीख स्थगित कर दी गई।

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गौरतलब है कि तिलक की एटक की स्थापना में प्रेरक भूमिका थी। अंततः 31 अक्टूबर से 2 नवंबर तक चले स्थापना सम्मेलन ने लाला लाजपत राय को अपना पहला अध्यक्ष, जोसेफ बपतिस्ता को उपाध्यक्ष व दीवान चमन लाल को महासचिव बनाया।

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में लाला लाजपत राय ने कहा कि ‘‘हमारे इस पुराने देश के इतिहास में यह अपने किस्म का पहला अनोखा अवसर है। … लेकिन (देश के) इतिहास में ऐसा कोई अभिलेख नहीं है जहाँ केवल मजदूरों के हित और कल्याण के लिए सभा/सम्मेलन बुलाया गया हो, जो न कि एक या दूसरे शहर के लिए हो, या किसी एक प्रांत के लिए हो बल्कि संपूर्ण भारत वर्ष के लिए हो।’’

यह भारतीय मजदूर आंदोलन के लिए महत्वपूर्ण मुकाम था। यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि एटक के इस स्थापना सम्मेलन में देश के लगभग सभी बड़े नेताओं के संदेश आये, लेकिन गांधी जी मौन रहे। यहाँ तक कि अहमदाबाद टैक्सटाइल एसोसिएशन ने भी न तो इसमें प्रतिनिधित्व किया और न ही कभी एटक से संबद्ध हुई।

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एटक के संघर्षों व चढ़ाव-उतार के दौर

1920 से 1947 तक एटक कई उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरता रहा, लेकिन मुख्यतः एकमात्र मजदूर महासंघ के रूप में कमोबेश कायम रहा। 1927 में गणेश शंकर विद्यार्थी की अध्यक्षता में संपन्न एटक के कानपुर सम्मेलन में साइमन कमीशन के बहिष्कार के निर्णय के साथ ही इसकी एक संविधान तैयारी का निर्णय बना।

1928 के झरिया सम्मेलन में भारत के मज़दूरों का समाजवादी गणराज्य बनाने का अहम प्रस्ताव पारित हुआ। सम्मेलन ने 1928 के अंत में कलकत्ता की सर्वदलीय सम्मेलन के लिए ‘उद्योगों और भूमि के राष्ट्रीयकरण, सभी वयस्कों को मताधिकार, हड़ताल करने का अधिकार व मज़दूर वर्ग के समाजवादी गणराज्य के सिद्धांत पर संविधान, सभी जागीरों, रियासतों और जमींदारों के उन्मूलन’ जैसी माँगें प्रस्तुत करने के लिए प्रतिनिधि मंडल बनाया।

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एटक में विभाजन और एकता का दौर

1929 के नागपुर सम्मेलन में एटक के भीतर सुधारवाद और क्रान्तिकारी मतों के बीच बहस अपने शीर्ष पर पहुँच गई। पं. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता वाले इस सम्मेलन में भारत के राॅयल कमीशन ऑन लेबर की नियुक्ति और इसके बहिष्कार तथा गिरनी कामगार यूनियन को कार्यकारिणी में शामिल करने का मुद्दा प्रमुख रूप से विवादित रहा।

अंततः एटक में पहला दुखद विभाजन हुआ और एम.एन. जोशी, चमन लाल आदि की पहल पर अलग से इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन बना। पुनः 1931 में सुभाष चंद्र बोस की अध्यक्षता में संपन्न कलकत्ता सम्मेलन में एटक में दूसरा विभाजन हुआ और क्रान्तिकारी विचारधारा से संबद्ध धड़े ने ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस का गठन किया।

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इन विभाजनों के बाद एकता के नये प्रयास शुरु हुए और 10 मई 1931 को ट्रेड यूनियन एकता समिति बनी। 1933 में ‘इंडियन ट्रेड यूनियन फेडरेशन’ व ‘नेशनल फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ की एकता से ‘नेशनल ट्रेड यूनियन फेडरेशन’ (एनटीयूएफ) बना।

इन्हीं प्रयासों के तौर पर 1935 के कलकत्ता सम्मेलन में एटक व रेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस की एकता से एटक पुनः मजबूत स्थिति में पहुँच गया। 1936 में एटक व एनटीयूएफ ने मिलकर संयुक्त मज़दूर बोर्ड बनाई। 1938 के दिल्ली सम्मेलन में एकता के प्रयास और तेज हुए और नागपुर की संयुक्त बैठक में एनटीयूएफ एटक से संबद्ध हुआ और 1940 में पूर्ण विलय हो गया।

मज़दूर आन्दोलन को बांटने का दुखद दौर

जब मज़दूर आन्दोलन उभार पर था, देश औपनिवेशिक गुलामी से मुक्ति की ओर बढ़ रहा था, तब एक बड़ा हमला मज़दूर आन्दोलन को कमजोर करने के लिए होने लगा और संगठन को तोड़ने के प्रयास भी तेज हो गये। सत्ता की नई बागडोर संभालने के ज़द्दोज़हद में लगे पूँजीपतियों के सेवकों को सबसे बड़ा ख़तरा मज़दूरों के संगठित ताक़त से लगने लगी थी।

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और बनने लगे पार्टी आधारित महासंघ

देश की आजादी से ठीक पूर्व दिसंबर 1946 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में कांग्रेसी संगठनों से कम्युनिस्टों को निकालने का फैसला हुआ। इसी आलोक में 3-4 मई 1947 को दिल्ली में कांग्रेस मजदूर सेवक संघ का सम्मेलन हुआ जिसमें एक अलग महासंघ के तौर पर ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (इंटक) का प्रस्ताव बना। इस प्रकार देश में पहली बार पार्टी आधारित मज़दूर महासंघ की परंपरा शुरु हुई।

1948 में कांग्रेस पार्टी के भीतरी धड़े ने ‘हिंद मजदूर पंचायत’ बनाया और उसी वर्ष कोलकता के सम्मेलन में हिंद मजदूर पंचायत व एम.एन. राय की ‘इंडियन फेडरेशन ऑफ़ लेबर’ का विलय करके एक नया महासंघ हिंद मजदूर सभा (एच.एम.एस.) अस्तित्वमान हुआ। लेकिन इसी वर्ष इससे एक हिस्सा अलग हो गया और उसने ट्रेड यूनियन कमेटी गठित की जो 1949 ‘यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ (यू.टी.यू.सी.) के नाम से सामने आयी। बाद में राजनीतिक दल रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (आरएसपीआई) के विभाजन से जब आरएसपीआई और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ़ इंडिया (एसयूसीआई) बना तो दो यूटीयूसी बन गये। इसी बीच एचएमएस में पुनः विभाजन से एचएमएस व ‘हिंद मजदूर पंचायत’ नाम से दो महासंघ बन गये।

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देश में हिन्दू कट्टरपंथ की लहर पर सवार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने जब राजनीतिक दल भारतीय जनसंघ बनाया तो उसी की प्रशाखा के रूप में 1955 में दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व में ‘भारतीय मजदूर संघ’ (बीएमएस) का गठन किया।

सन 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) तथा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) बनी तो मजदूर आंदोलन को एक और विभाजन की त्रासदी झेलनी पड़ी। एटक सीपीआई से संबद्ध रही लेकिन एक बड़े बंटवारे के बाद ‘सेंटर ऑफ़ इंडियन ट्रेड यूनियंस’ (सीटू) बनी जो सीपीआईएम से जुड़ी।

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देश में 1967 के नक्सलबाड़ी के मजदूर-किसान आंदोलन के उभार के बाद क्रान्तिकारियों का हिस्सा सीपीआई और सीपीआईएम से अलग हो गया और नयी पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) बनी और कई स्वतंत्र क्रन्तिकारी संगठन भी बने। 1970 के दशक में, टूट-फूट व एकत के दौर से गुजरते हुए कई क्रान्तिकारी संगठन बने। बाद के दिनों में इनमें से कुछ संगठनिक हिस्सों के प्रयास से मजदूरों के नये महासंघ ‘आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन्स’ (एक्टू), ‘ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियंस’ (इफ्टू), ‘ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इंडिया’ (टीयूसीआई) आदि अस्तित्व में आये।

संगठन बनने के साथ ही संघर्षों और हक़ हासिल करने का सिलसिला भी आगे बढ़ता गया…

(क्रमशः जारी. . .)

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