मालिकों को मज़दूर बनाता है अरबपति

क्या काम देकर मालिक ने मज़दूर पर कृपा की है?

[अक्सर किसी कारखाने या दफ्तर में काम करने वाले वेतनभोगी मज़दूर से बात करो तो वे यह कहते हैं कि उन्हें काम देकर उनका मालिक उन पर कृपा करता है, क्योंकि अगर उन्हें काम न मिले तो उनका जीना मुश्किल हो जायेगा। समाज में सदियों से फैलायी गयी सोच और आजकल मीडिया के जरिये लगातार मालिकों कि भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किये जाने का ही नतीजा है कि मेहनतकश लोग अपने शोषकों को ही अपना कृपानिधान मान लेते हैं। सवाल यह है कि मालिक मज़दूरों की परवरिश करता है या मज़दूर मालिकों को करोड़पति-अरबपति बनाते हैं?

इस सच्चाई को समझने में पौल लफार्ग द्वारा 1903 में लिखा यह वार्तालाप काफी मददगार है। इस वार्तालाप में शारीरिक श्रम और सीधे उत्पादन में लगे मज़दूरों का उदाहरण दिया गया है, लेकिन यह मानसिक श्रम करने वाले कर्मचारियों के मामले में भी लागू होती है।]

मज़दूर-प्रचारक संवाद

मज़दूर- यदि कोई मालिक नहीं होता, तो मुझे काम कौन देता?
प्रचारक- यह एक सवाल है जो अक्सर लोग हमसे पूछते हैं। इसे हमें अच्छी तरह समझना चाहिए। काम करने के लिये तीन चीजों की जरूरत होती है – कारखाना, मशीन और कच्चा माल।
मज़दूर- सही है।

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प्रचारक- कारखाना कौन बनाता है?
मज़दूर- राजमिस्त्री।

प्रचारक- मशीने कौन बनाता है?
मज़दूर- इंजीनियर।

प्रचारक- तुम जो कपड़ा बुनते हो, उसके लिये कपास कौन उगाता है? तुम्हारी पत्नी जिस ऊन को कातती है, उसे कौन पैदा करता है? तुम्हारा बेटा जो खनिज गलाता है उसे जमीन से खोद कर कौन निकालता है?
मज़दूर- किसान, गडरिया, खदान मज़दूर। वैसे ही मज़दूर जैसा मैं हूँ।

प्रचारक- हाँ, तभी तो तुम, तुम्हारी पत्नी और तुम्हारा बेटा काम कर पाते हैं? क्योंकि अलग-अलग तरह के मज़दूर तुम्हे पहले से ही इमारतें, मशीनें और कच्चा माल तैयार कर के दे रहे हैं।
मज़दूर- बिलकुल, मैं सूती कपड़ा बिना कपास और करघे के नहीं बुन सकता हूँ।

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प्रचारक- हाँ, और इससे पता चलता है कि तुम्हें कोई पूँजीपति या मालिक काम नहीं देता है, बल्कि यह किसी राजमिस्त्री, इंजीनियर और किसान की देन है। क्या तुम जानते हो कि तुम्हारा मालिक कैसे उन चीजों का इन्तजाम करता है जो तुम्हारे काम के लिये जरूरी हैं?
मज़दूर- वह इन्हें खरीदता है।

प्रचारक- उसे पैसे कौन देता है?
मज़दूर- मुझे क्या पता। शायद उसके पिता ने उसके लिये थोड़ा बहुत धन छोड़ा होगा और आज वह करोड़पति बन गया है।

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प्रचारक- क्या उसने यह पैसा मशीनों में काम करके और कपड़ा बुन के कमाया है?
मज़दूर- ऐसा तो नहीं है, जब हमने काम किया, तभी उसने करोड़ों कमाया।

प्रचारक- तब तो वह ऐसे ही बिना कुछ किये अमीर बन गया है। यही उसकी किस्मत चमकाने का एकमात्र रास्ता है- जो लोग काम करते हैं उन्हें तो केवल ज़िन्दा रहने भर के लिये मज़दूरी मिलती है। लेकिन मुझे बताओ कि यदि तुम और तुम्हारे मज़दूर साथी काम नहीं करें, तो क्या तुम्हारे मालिक की मशीनों में जंग नहीं लग जायेगा और उनके कपास को कीड़े नहीं खा जायेंगे?
मज़दूर- इसका मतलब यदि हम काम न करें, तो कारखाने का हर सामान बर्बाद और तबाह हो जायेगा।

प्रचारक- इसीलिये तुम काम करके मशीनों और कच्चे माल को बचा रहे हो जो कि तुम्हारे काम करने के लिये जरूरी है।
मज़दूर- यह बिल्कुल सही है, मैंने पहले कभी इस तरह नहीं सोचा।

प्रचारक- क्या तुम्हारा मालिक यह देखभाल करने आता है कि उसका कारोबार कैसा चल रहा है?
मज़दूर- बहुत ज्यादा नहीं, वह हर दिन एक चक्कर लगता है, हमारे काम को देखने के लिये। लेकिन अपने हाथों को गंदा होने के डर से वह उन्हें अपनी जेब में ही डाले रहता है। एक सूत कातने वाली मिल में, जहाँ मेरी पत्नी और बेटी काम करती हैं, उन्होंने अपने मालिक को कभी नहीं देखा है, जबकि वहाँ चार मालिक हैं। ढलाई कारखाने में भी कोई मालिक नहीं दिखता है जहाँ मेरा बेटा काम करता है। वहाँ के मालिक को तो न किसी ने देखा है और न ही कोई जानता है। यहाँ तक कि उसकी परछाई को भी किसी ने नहीं देखा है। वह एक लिमिटेड कम्पनी है जिसका अपना काम है। मान लो कि मेरे और तुम्हारे पास 500 फ्रांक कि बचत होती है, तो हम एक शेयर खरीद सकते हैं और हम भी उनमें से एक मालिक बन सकते हैं बिना उस कारखाने में पैर रखे।

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प्रचारक- तो फिर उस जगह पर काम कौन देखता है और कामकाज का संचालन कौन करता है, जहाँ से ये शेयर धरक मालिकाने का सम्बंध रखते हैं? तुम्हारी खुद कि कंपनी का मालिक भी जहाँ तुम काम करते हो वहाँ कभी दिखायी नहीं देता और कभी-कभार आ भी जाए तो वह गिनती में नहीं आता है।
मज़दूर- प्रबंधक और फोरमैन।

प्रचारक- लेकिन जिन्होंने कारखाना बनाया, मशीनें बनायीं व कच्चे माल को तैयार किया, वे भी मज़दूर ही हैं। जो मशीनों को चलाते हैं वे भी मज़दूर हैं। प्रबंधक और फोरमैन इस काम कि देख रेख करते हैं, तब मालिक क्या करते हैं?
मज़दूर- कुछ नहीं करते व्यर्थ समय गँवाते हैं।

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प्रचारक- अगर यहाँ से चाँद के लिये कोई रेलगाड़ी होती, तो हम वहाँ सारे मालिकों को बिना वापसी की टिकट दिये भेज देते और फिर भी तुम्हारी बुनाई तुम्हारी पत्नी कि कताई और तुम्हारे बेटे कि ढलाई का काम पहले जैसा ही चलता रहता। क्या तुम जानते हो कि पिछले साल तुम्हारे मालिक ने कितना मुनाफा कमाया था?
मज़दूर- हमने हिसाब लगाया था कि उसने कम से कम एक लाख फ्रांक कमाये थे।

प्रचारक- कितने मज़दूर उसके यहाँ काम करते हैं- औरत, मर्द और बच्चों को मिलाकर?
मज़दूर- एक सौ।

प्रचारक- वे कितनी मज़दूरी पाते हैं?
मज़दूर- प्रबंधक और फोरमैन के वेतन मिलाकर औसतन लगभग एक लाख फ्रांक सालाना।

प्रचारक- यानी की सौ मज़दूर सारे मिलकर एक लाख फ्रांक वेतन पाते हैं, जो सिर्फ उन्हें भूख से न मरने के लिये ही काफी होता है। जबकि तुम्हारे मालिक की जेब में एक लाख फ्रांक चले जाते हैं और वह भी बिना कुछ काम किये। वे एक लाख फ्रांक कहाँ से आते हैं?
मज़दूर- आसमान से तो नहीं आते हैं। मैंने कभी फ्रांक की बारिश होते तो देखी नहीं है।

प्रचारक- यह मज़दूर ही हैं जो उसकी कंपनी में एक लाख फ्रांक का उत्पादन करते हैं जिसे वे अपने वेतन के रूप में लेते हैं और मालिक जो एक लाख फ्रांक का मुनाफा पाते हैं जिसमें से कुछ फ्रांक वे नयी मशीने खरीदने में लगाता है वह भी मज़दूरों की ही कमाई है।
मज़दूर- इसे नाकारा नहीं जा सकता।

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प्रचारक- तब तो यह तय है कि मज़दूर ही उस पैसे का उत्पादन करता है, जिसे मालिक नयी मशीनें खरीदने में लगाता है। तुमसे काम करवाने वाले प्रबंधक और फोरमेंन भी तुम्हारी ही तरह वेतनभोगी गुलाम हैं जो इस उत्पादन की देख-रेख करते हैं। तब मालिक कि क्या जरूरत है? वह किस काम का है?

मज़दूर- मज़दूरों का शोषण करने के लिये।
प्रचारक- ऐसा कहो कि मज़दूरों को लूटने के लिये, यह कहीं ज्यादा साफ और ज्यादा सटीक है।

पौल लफार्ग द्वारा 1903 में लिखा वार्तालाप

-अनुवाद- स्वाति व शशि
(विकल्प मंच ब्लाग से साभार)
मेहनतकश, नवम्बर-दिसम्बर, 2015 में प्रकाशित

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