अन्यायपूर्ण सजा झेलते मारुति के एक मज़दूर साथी का निधन

जिंदगी-मौत से जूझते एक और मज़दूर साथी, लेकिन जमानत भी नहीं

मारुति सुजुकी मानेसर प्लांट में 18 जुलाई 2012 को हुई साजिशपूर्ण घटना के बाद से जेल की कालकोठरी में कैद और अन्यायपूर्ण सजा झेलते 13 मज़दूर साथियों में से एक साथी पवन दहिया के दुखद मौत की ख़बर  है। ज़िन्दगी-मौत से जूझते एक साथी सहित कुछ साथियों के हालात चिंताजनक हैं, लेकिन इस अन्यायी व्यवस्था में उन्हें जमानत भी नहीं मिल रही है।

नहीं रहे साथी पवन दहिया

एक मज़दूर साथी पवन दहिया हमारे बीच नहीं रहे। पवन दहिया मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन की पहली टीम के सचिव (सेक्रेट्री) रहे हैं। 18 जुलाई 2012 की साजिशपूर्ण घटना के बाद जिन 148 मज़दूरों को जेल की कालकोठरी में डाला गया और अंततः जिन 13 अगुआ मज़दूर साथियों को अन्यायपूर्ण आजीवन कारावास की सजा निचली अदालत द्वारा सुनाई गई, उन्हीं में से एक पवन दहिया भी है।

वे कोरोना फैलाव के विकट दौर में पिछले साल पैरोल पर घर आ गए थे। इस दौरान बीते 20 फरवरी 2021 को घर पर खेत में काम करते हुए बिजली के तार से करंट लगने से उनकी दर्दनाक मौत हो गई। मौत की खबर सुनते ही मारुति सहित गुड़गांव मानेसर क्षेत्र से तमाम मज़दूर साथी उनके घर पहुंच गए।

पवन दहिया बेहद शांत स्वभाव के मज़दूर नेता थे। वे एक साधारण परिवार से आते हैं। उनके पिताजी का देहांत बचपन में ही हो चुका था। वर्तमान में पवन की पत्नी, 9 साल का बेटा और माँ हैं, जिनका दारोमदार भी पवन के ऊपर था।

ज़िन्दगी-मौत के बीच जूझते साथी जिया लाल

अन्यायपूर्ण सजा झेलते मारुति के एक अन्य साथी जियालाल भी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। वे कैंसर के असाध्य रोग से पीड़ित हैं और फिलहाल पैरोल पर ही घर से इलाज करवा रहे हैं।

कैंसर का चौथा स्टेज है और हालत बेहद नाजुक है। लेकिन 9 साल बीत जाने के बावजूद उन्हें जमानत तक नहीं मिल सकी है। इसके विपरीत पुलिस आए दिन उनको घर पर आकर टॉर्चर कर रही है।

यह उल्लेखनीय है कि जियालाल को जेल के भीतर ही कैंसर हुआ था, लेकिन उनका इलाज ठीक से नहीं कराया गया। बाद में कोरोना फैलाव के कारण जब जेल के तमाम कैदियों के साथ जियालाल को भी घर पैरोल पर भेजा गया और यहां बिगड़ी हुए स्वास्थ्य की स्थिति में उन्हें इलाज के लिए ले जाया गया तब पता चला कि कैंसर का चौथा स्टेज है।

मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन के सहयोग से फिलहाल उनका इलाज जारी है, लेकिन स्थिति नाज़ुक बनी हुई है।

ब्रेन ट्यूमर से जूझते साथी अजमेर

यूनियन की पहली बॉडी के लीगल एडवाइजर और तेरह सजायाफ्ता साथियों में से एक अजमेर सिंह भी ब्रेन ट्यूमर के विकट दौर से गुजर रहे हैं। वर्ष 2019 में जेल में इलाज नहीं हुआ और पैरोल पर घर आने पर बाहर डॉक्टर को दिखाने पर इसकी गंभीरता के बारे में पता चला।

यूनियन के सहयोग से वे दो बड़े ऑपरेशनों के विकट दौर से गुजर चुके हैं और अभी तीसरा ऑपरेशन होना बाकी है।

9 साल में किसी साथी को जमानत नहीं

इन सबके बावजूद इनमें से किसी भी साथी को निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक जमानत भी नहीं मिल सकी है।

एक तरफ गुजरात अम्बुजा सितारगंज के प्रबंधन पर मज़दूरों के पीएफ व ईएसआई के घोटाले पर कोर्ट के आदेश से एफआईआर दर्ज होने के बावजूद गिरफ़्तारी नहीं हो रही है, वहीँ बेगुनाह मज़दूरों की बीमार हालत के बावजूद तेरह साल से जमानत भी नहीं हुई।

देश की जो सर्वोच्च अदालत दीपावली के अवकाश में गोदी मीडिया के बदनाम पत्रकार अर्णव गोस्वामी को बचाने के लिए बैठ सकती है और आनन-फानन में उसके पक्ष में फैसले सुना सकती है, वही अदालत मारुति के साथियों की जमानत के आवेदन को सुनना तो दूर, देखते ही उसे रद्दी की टोकरी में डाल देती है।

चंडीगढ़ उच्च न्यायालय के जज ने तो साफ़ कहा था कि जमानत देने से देश में विदेशी निवेश प्रभावित होगा!

इससे साफ दिखता है किस देश की न्यायपालिका है कहां खड़ी है किसके पक्ष में खड़ी हैं और मजदूर के हालात क्या है।

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मारुति संघर्ष गाथा- पहली क़िस्त

मारुति मज़दूरों के अन्याय की दास्तान

18 जुलाई,  2012 को मारुति सुजुकी, मानेसर प्लांट में हुई साजिशपूर्ण घटना में एक मैनेजर की मौत का सहारा लेकर कंपनी प्रबंधन व हरियाणा सरकार की मिलीभगत से 148 मज़दूरों को जेल के अंदर डाल दिया गया था।

लगभग 5 साल बाद 18 मार्च 2017 को सेशन कोर्ट गुडगांव ने 117 मज़दूरों को बाइज्जत बरी किया व 31 लोगों को दोषी करार दिया। जिनमें से 13 मज़दूर आज भी जेल की कालकोठरी में अन्यायपूर्ण उम्रक़ैद की सजा भुगत रहे हैं। क़रीब 2500 स्थाई व स्थाई मज़दूर अवैध बर्खास्तगी झेल रहे हैं।

इस मजदूर विरोधी फैसले का तमाम यूनियनों ने पुरजोर विरोध किया था और एक निष्पक्ष न्यायिक जाँच की माँग की थी। लेकिन क़रीब 9 साल बीत जाने के बावजूद अभी तक कोई न्यायिक जांच नहीं हुई। 13 मज़दूरों की रिहाई का संघर्ष जारी है। जबकि बर्खास्त मज़दूर आज भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

(‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, अप्रैल-जून,2021 में प्रकाशित)

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