मारुति कांड : जज और जेलर तक उनके…

मारुति मजदूर आंदोलन : एक नजर मे – 7

नाइंसाफ़ी की हद : यूनियन बनाने और ठेका प्रथा के खात्मे के लिए संघर्ष करने पर मारुति यूनियन के 13 नेताओं को अन्यायपूर्ण ‘उम्र क़ैद’ की सजा सुना दी गई।

(अन्यायपूर्ण दमन के साथ अन्यायपूर्ण सजा को भोगते मारुति के संघर्षरत मज़दूरों के साथ असल में हुआ क्या… प्रोविजनल कमेटी के राम निवास की रिपोर्ट जारी…)

इस क्रम में अबतक धारावाहिक 6 किस्तें प्रकाशित हो चुकी हैं। लिंक देखें-

पहली क़िस्त-  मारुति मजदूर आंदोलन : एक नजर मे-1

दूसरी क़िस्त- संघर्ष, यूनियन गठन और झंडारोहण

तीसरी क़िस्त – दमन का वह भयावह दौर

चौथी क़िस्त-दमन के बीच आगे बढ़ता रहा मारुति आंदोलन

पांचवीं क़िस्त-रुकावटों को तोड़ व्यापक हुआ मारुति आंदोलन

छठीं क़िस्त-मारुति आंदोलन : अन्याय के ख़िलाफ़ वर्गीय एकता 

किन्हीं वजहों से प्रकाशन में विलम्ब हुआ। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए हम इस श्रृंखला की अगली क़िस्त दे रहे हैं…

सातवीं क़िस्त-

ना गवाह, ना सबूत, सुना दी अन्यायपूर्ण सजा

17 जुलाई, 2012 की दुखद घटना के बाद दमन के भयावह दौर में 148 मज़दूर बिना जमानत के जेल में चार साल तक रहे और 2500 मजदूरों को गैर कानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया और लगातार राज्यसत्ता के दमन का सामना करना पड़ा।

18 मार्च को गुड़गांव कोर्ट द्वारा 13 मज़दूरों, जिसमें यूनियन बॉडी के 12 सदस्य शामिल है, को हत्या के झूठे आरोप में उम्र कैद की सजा सुनायी गयी। 4 मजदूरों को 5 साल की सजा सुनाई गयी। 14 मजदूरों को 3 साल की सजा हई, मगर वो पहले ही जेल में 4 चार साल काट चुके थे इसलिए उन्हें रिहा करा दिया गया। इससे पहले 10 मार्च को 117 मजदूरों को बरी किया गया था जो तकीरबन 4 साल जेल में बिता चुके थे।

अभियोजन पक्ष का केस और अदालत का फ़ैसला दोनों बिना किसी सबूत के, झूठी गवाही और सिर्फ वर्ग द्वेष पर आधारित रहा। मज़दूर हितैषी प्रबंधक जिन्होंने यूनियन पंजीकृत कराने में मदद की थी, की अफ़सोसजनक मौत में मज़दूरों की कोई भूमिका नहीं है। इस बात को बचाव पक्ष द्वारा अंतिम रूप से साबित किया जा चुका है।

18 जुलाई, 2012 : असल में हुआ क्या?

एक सुपरवाइजर द्वारा एक दलित मज़दूर जियालाल (जिसे बाद में इस केस का मुख्य आरोपी बना दिया गया) के साथ जातिसूचक गाली गलौज और उसके निलंबन के बाद 18 जुलाई की घटना की शुरूआत हुई। यह पूरा मामला, यूनियन को खत्म करने के लिए प्रबंधन के षडयंत्र का हिस्सा है। यूनियन बनाने के अधिकार और उन माँगों पर, खासकर ठेका प्रथा के खात्मे का, जिसके लिए यूनियन आवाज उठा रही थी और मजदूर वर्ग के संघर्ष का प्रतीक बन चुकी थी पर यह हमला था।

कानूनी कार्यवाही को ऊपर से देखने से पता चलता है कि 18 जुलाई के बाद प्रबंधन और सरकार के गठजोड़ द्वारा पुलिस, प्रशासन और श्रम विभाग की मदद से किस प्रकार क्रूर दमनात्मक तरीके से हजारों मजदूरों को लगातार प्रताड़ित किया गया।

18 मार्च, 2017 का फैसला मज़दूर विरोधी था

यह फ़ैसला जिसको देते वक्त गुडगाँव और मानेसर को पुलिस छावनी में बदल दिया गया था, पूरी तरह से मजदूर विरोधी है। कंपनी प्रबंधन के हित में पूरे देश के खासकर हरियाणा और राजस्थान में गुड़गांव से नीमराना तक के मजदूरों में डर बैठाने के लिए दिया गया।

अभियोजन पक्ष की दलील से पक्षधरता साफ है !

अपनी अंतिम दलील में अभियोजन ने मजदूरों के लिए मौत की सजा मांगते हुए मई 2013 में चंडीगढ़ हाईकोर्ट द्वारा मजदूरों की जमानत खारिज करने के आदेश के पीछे दिए गए तर्क के सामान, पूँजी का भरोसा पुनः स्थापित करने और वैश्विक निवेशकों को आमंत्रित करने के प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम की दलील दी। इन विदेशी और देशी पूँजीपतियों का भरोसा सिर्फ एक चीज पर निर्भर करता है वो है सस्ता और आज्ञाकारी श्रम बल, इसलिए ना यूनियन हो ना  किसी अधिकार की माँग उठे।

क्रमशः जारी…

भूली-बिसरी ख़बरे

%d bloggers like this: