मारुति मजदूर आंदोलन : एक नजर मे-1

मारुति मानेसर प्लांट का मज़दूर आंदोलन, देश के मौजूदा दौर का एक अहम आंदोलन है। आज भी 13 मज़दूर नेता अन्यपूर्ण उम्र कैद की सजा झेल रहे हैं। क़रीब ढाई हजार स्थाई-अस्थाई मज़दूर बर्खास्तगी झेल रहे हैं।

मारुति के इस मज़दूर आंदोलन की पृष्ठभूमि, उसके अलग-अलग दौर को जानने-समझने के लिए मारुति प्रोविजन कमेटी के साथी राम निवास की रिपोर्ट हम यहाँ धारावाहिक प्रस्तुत कर रहे हैं…

पहली किस्त-

संघर्ष की पृष्ठभूमि

मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड ने अपनी नई इकाई मानेसर में वर्ष 2006 में प्रारंभ की । इस संयंत्र में जहां कंपनी प्रबंधन ने नई तकनीक की आधुनिक मशीनें व रोबोट का इस्तेमाल किया, वहीं उन्हीं मजदूरों को भर्ती किया गया जिनकी आयु 23 वर्ष से कम थी।

अर्थात कंपनी प्रबंधन नई युवा शक्ति व उनके जोश का अत्यधिक उत्पादन के लिए इस्तेमाल करना चाहती थी। ऐसे मजदूर जो इन आधुनिक मशीनों के साथ अपने शरीर का तालमेल बिठा पाए उन्हीं को काम पर रखा जाता था।

जो मजदूर मशीनों के साथ 1 सेकंड भी तालमेल बैठाने में असफल हो जाते कंपनी उन्हें काम से बाहर निकाल देती।

कठोर काम, कम वेतन, बुरी कार्यस्थितियाँ

एक और जहां सभी मजदूर अपने भविष्य की कामना करते हुए प्लांट में जी तोड़ मेहनत कर अपना सर्वोत्तम उत्पादन दे रहे थे, वही कंपनी कम से कम तनख्वाह देकर इनको फोकट के मजदूरों के रूप में इस्तेमाल कर रही थी।

मानेसर प्लांट में कुशल श्रमिकों को भी 3 वर्ष की ट्रेनिंग के लिए रखा गया और उन्हें मात्र 34 रुपए मासिक वेतन ही दिया जाता था। इसके अलावा मजदूरों को मानव शरीर की मूलभूत जरूरतों से भी वंचित रखा जाता था- जैसे शिफ्ट शुरू होने के बाद कोई भी मजदूर चाय के समय या खाने के समय के इलावा बाथरूम नहीं जा सकता था या पानी तक नहीं पी सकता था।

यदि कोई मजदूर बीमारी से ग्रस्त भी है तो भी उसे निरंतर काम करते रहना पड़ता था। जो मजदूर बीमारी या शारीरिक पीड़ा के कारण काम करने से मना कर देता तो कंपनी प्रबंधन उसे मेडिकल अनफिट करार देकर कंपनी से बाहर निकाल देती थी।

शोषण से पैदा हुआ संगठन बनाने का प्रयास

लगातार तीन साल की जी तोड़ मेहनत के बाद जब हमारा ट्रेनिंग का समय समाप्त हुआ और एक स्थाई मजदूर की श्रेणी में गिना जाने लगा तब हमने अपने आपको अन्य कम्पनियों के मजदूरों से कहीं पिछड़ा हुआ पाया।

जिन कंपनियों में स्थाई मजदूरों की यूनियने थी उन मजदूरों को बहुत सारी सुविधाएं दी जाती थी जो हमें नहीं मिलती थी। जैसे अच्छा खाना मेडिकल बस सुविधा इत्यादि। तब सभी मजदूरों ने सोचा कि क्यों ना हम सब मिलकर एक मजदूर यूनियन का गठन करें।

दमन के बीच पहली हड़ताल

जैसे ही यूनियन पंजीकरण की प्रिया प्रक्रिया शुरू हुई तभी मारुति प्रबंधन ने और ज्यादा दमन करना शुरू कर दिया। जिस दिन मारुति प्रबंधन को मजदूरों द्वारा पंजीकरण की बात का पता चला उसी दिन प्रबंधन ने मजदूरों से सादे कोरे कागजों पर जबरन हस्ताक्षर लेने शुरू कर दिए।

विरोध स्वरूप सभी मजदूर 4 जून 2011 को हड़ताल पर चले गए और प्लांट के अंदर ही कब्जा करके हड़ताल पर बैठ गए। कंपनी प्रबंधन ने मजदूरों की हड़ताल को तोड़ने के लिए बिजली, पानी, खाना व टॉयलेट आदि सभी कुछ बंद कर दिया।

दो दिनों तक सभी मजदूर लगातार भूखे प्यासे आंदोलन करते रहे। उसके बाद गुड़गांव औद्योगिक क्षेत्र की अन्य यूनियनों व ट्रेड यूनियनों ने संघर्षरत मजदूरों के लिए खाना भेजा।

जैसे-जैसे हड़ताल आगे बढ़ता गया, वैसे वैसे ही मजदूरों का मनोबल और हौसले भी बढ़ते गए। वही कंपनी प्रबंधन ने भी एक-एक करके कई अगुवा मजदूरों को सस्पेंड कर दिया।

यह हड़ताल लगातार 13 दिनों तक चलती रही। अंततः कंपनी प्रबंधन, श्रम विभाग और मजदूरों के बीच 16 जून 2011 को त्रिपक्षीय समझौता हुआ। कंपनी प्रबंधन ने मजदूरों की यूनियन पंजीकरण की प्रक्रिया में दखल ना देने का आश्वासन दिया और मजदूरों ने भी शांतिपूर्ण तरीके से उत्पादन जारी रखने का आश्वासन दिया।

मज़दूरों की पहली जीत, लेकिन प्रबन्धन के नए षडयंत्र

13 दिनों की हड़ताल के बाद सभी मजदूरों को अपनी वर्गीय चेतना और अपनी एकजुटता का एहसास हो चुका था। अब सभी को लगता था कि वह एक मनपसंद यूनियन बनाकर ही दम लेंगे। वही कंपनी प्रबंधन ने मजदूरों के बीच फूट डालने के लिए तरह-तरह के षडयन्त्र रचना शुरू कर दिया।

क्रमशः जारी…

भूली-बिसरी ख़बरे

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