कोटा के जेके लोन अस्पताल में आख़िर क्यों गई मासूमों की जान?

जांच कमेटी ने अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर्स को दी क्लीन चिट

राजस्थान में एक ओर प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने एक साल पूरे होने पर राज्य में ‘निरोगी राजस्थान’ कार्यक्रम की शुरुआत की है तो वहीं दूसरी ओर कोटा में 28 दिनों में 91 बच्चों की मौत से हड़कंप मच गया है। इसमें 10 बच्चों की मौत तो केवल 23 और 24 दिसंबर के दिन ही हुई, इसके बाद 25 से 29 सितंबर के बीच कुल 14 बच्चों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। इस घटना पर विपक्ष ने राज्य सरकार पर तीखे प्रहार किए हैं, तो वहीं सरकार ने प्रतिपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रदेश सरकार ने एक जांच कमेटी का गठन किया। इस कमेटी में जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के एडिशनल प्रिंसिपल डॉक्टर अमरजीत मेहता और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ रामबाबू शर्मा शामिल थे। इस कमेटी ने सोमवार 30 दिसंबर को जांच के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट में अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर्स को इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई है।

कमेटी ने अपनी जांच में बच्चों के इलाज में कोई कमी नहीं पाई है। कमेटी का कहना है कि दो दिन में 10 बच्चों की मौत का कारण इलाज में कमी नहीं, बल्कि ठंड है। 10 में से 5 बच्चे एक माह से छोटे थे और भारी सर्दी में उनके पैरेंट्स जीप में रखकर उन्हें दूसरे अस्पतालों से रेफर करवाकर लाए थे। सर्दी के कारण गले में इंफेक्शन हो गया था। सांस रुकने जैसे हालात हो गए थे। इस वजह से उनकी मौत हुई। डॉक्टरों ने इलाज में कोताही नहीं की थी, कोई लापरवाही नहीं बरती।

हालांकि कमेटी ने ये बात भी कही कि आईसीयू में सिलेंडर के जरिए ऑक्सीजन मुहैया कराई जाती है, जबकि ऑक्सीजन पाइपलाइन के जरिए पहुंचाई जानी चाहिए। बाहर से सिलेंडर अंदर लाने से संक्रमण का खतरा बढ़ता है। साथ ही कमेटी ने ये भी कहा कि आईसीयू के 53 बिस्तरों पर 70 से ज्यादा बच्चों का इलाज किया जा रहा है, इससे भी संक्रमण हो सकता है।

राजस्थान के कोटा में जे.के. लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय एवं न्यू मेडिकल कॉलेज नाम का एक सरकारी अस्पताल है। अस्पताल बच्चों के इलाज में स्पेशियलिटी रखने का दावा करता है। इस अस्पताल में 23 और 24 दिसंबर के बीच 10 बच्चों की मौत हुई। इनमें से 5 बच्चे नवजात थे। एक से पांच दिन तक के और बाकी बच्चे दो साल से कम उम्र के थे।

मामले ने तब तूल पकड़ा जब 27 दिसंबर को कोटा से सांसद और लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने राजस्थान सरकार को टैग करते हुए ट्वीट किया और बच्चों की मौत पर गंभीरता से कार्रवाई करने की बात कही। ओम बिड़ला ने खुद रविवार 29 दिसंबर को अस्पताल का दौरा किया और हालात का जायज़ा लिया। इस दौरान उन्होंने अस्पताल में स्वास्थ्य उपकरणों की कमी की जानकारी ली और इस बारे में ज़रूरी हिदायत दी।

27 दिसंबर को ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हेल्थ सेक्रेटरी वैभव गलरिया को स्थिति का जायजा लेने के लिए भेजा। हेल्थ सेक्रेटरी को शुरुआती जांच में अस्पताल में कई खामियां भी मिलीं। अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में ऑक्सीजन की कमी थी, वार्ड्स में सफाई नहीं थी और जरूरी मेडिकल उपकरण भी अस्पताल में नहीं दिखे। हेल्थ सेक्रेटरी ने दौरे के बाद तीन मेंबर वाले एक जांच पैनल का गठन किया। 48 घंटे के अंदर जांच रिपोर्ट देने के लिए कहा गया साथ ही ज़िम्मेदार डॉक्टरों पर कार्रवाई का आश्वासन भी दिया गया।

हालांकि इस पूरे मामले में अस्पताल प्रशासन का कहना है कि बच्चों के इलाज में किसी तरह की कोताही नहीं बरती गई। डॉक्टर पूरे समय अस्पताल में मौजूद रहे। जेके लोन हॉस्पिटल के सुपरिटेंडेंट एचएल मीना ने मीडिया को बताया कि किसी भी बच्चे की मौत में अस्पताल की कोई गलती नहीं है।

बता दें कि अस्पताल में महीने भर से मौतों का सिलसिला जारी है। लेकिन जब एक साथ 10 बच्चों की मौत हुई तब राजस्थान के सीएम हरकत में आए और उन्होंने एक बयान दिया, जिसे विपक्ष के साथ ही सोशल मीडिया पर भी संवेदनहीन करार दिया गया। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा, ‘पिछले 6 सालों की तुलना में इस साल सबसे कम मौतें हुई हैं। वैसे एक बच्चे की भी मौत दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन बीते सालों में हर एक साल 1300-1500 मौतें हुई हैं, इस साल ये आंकड़ा 900 है। देश के हर एक अस्पताल में हर रोज कुछ मौतें होती रहती है। इसमें कुछ नया नहीं है।’

मुख्यमंत्री के इस बयान पर राज्य की पूर्व मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे ने प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘बच्चों की मौत तो होती रहती है, इसमें कोई नई बात नहीं है। प्रदेश के मुखिया का यह बयान सुनकर मन बहुत आहत हुआ। ये कथन उन मांओं के ज़ख्मों पर नमक है जिनकी कोख जेके लोन अस्पताल में सरकारी लापरवाही के कारण सूनी हुई।’

गौरतलब है कि जेके लोन हॉस्पिटल में आसपास के जिलों से रेफ़र किए गए बच्चों का इलाज किया जाता है। लेकिन अस्पताल का रिकॉर्ड बच्चों के इलाज के मामले में बहुत अच्छा नहीं दिखता। पिछले एक महीने का आंकड़ा देखें तो मरने वाले बच्चों की 91 की संख्या डराने वाली है। एक साल का आंकड़ा देखें तो 900 को पार है। राज्य की विपक्षी पार्टी बीजेपी इसे लेकर कांग्रेस कीे गहलोत सरकार पर लगातार हमला बोल रही है।

राज्य बीजेपी के अध्यक्ष सतीश पूनिया ने इस मामले में कांग्रेस सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, ‘इन मौतों के बाद भी सरकार का रवैया संवेदनहीन है, अमानवीय है। हमने दो पूर्व चिकित्सा मंत्रियों राजेंद्र राठौड़ और कालीचरण सर्राफ़ की सदस्यता वाली एक कमेटी गठित कर मामले की तह तक पहुंचा जाएगा।’

हालांकि सच्चाई यह है कि  इस अस्पताल में बच्चों की मौत की ये दर्दनाक तस्वीर सिर्फ़ कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद की नहीं है। ये सिलसिला 2014 से जारी है, हर साल इस अस्पताल में लगभग हज़ार बच्चों की मौत इलाज के दौरान हो जाती है। हॉस्पिटल में संबधित विभाग के प्रमुख डॉ. अमृत लाल बैरवा ने मीडिया को बताया, “हॉस्पिटल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं। इन सबके बीच हॉस्पिटल स्टाफ़ इलाज के लिए पहुंचते मरीज़ों की ठीक से देखभाल कर रहे हैं। हमारे प्रयासों से ऐसी मौतों में कमी आई है। अस्पतालों पर मुफ़्त जाँच और दवा योजना के बाद काफ़ी दबाव बढ़ा है। क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज काफ़ी महंगा है।”

डॉक्टर बैरवा ने इस संबंध में रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि अस्पताल में आने वाले मरीज़ों की संख्या हर साल बढ़ रही है मगर अनुपात में ऐसी मौतों में संख्या में कमी आ रही है। इसके अनुसार, ‘वर्ष 2014 में 15 हजार 719 मरीज दाखिल हुए, उसमें से 1198 की मौत हुई। 2015 में 17569 दाखिल हुए, जबकि 1260 की मृत्यु हुई। वर्ष 2016 में 17892 भर्ती हुए और 1193 की मृत्यु हुई। वर्ष 2017 में मरीजों की संख्या 17216 और मृत्यु 1027, वर्ष 2018 में 16436 के मुक़ाबले 1005 की मौत हुई। इस वर्ष ये संख्या 940 है।’

इस संबंध में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी एनसीपीसीआर ने राज्य सरकार को एक नोटिस जारी किया है। एनसीपीसीआर ने इस मामले में प्रदेश सरकार से तीन दिन में जवाब देने के लिए कहा है। इसके अलावा आयोग ने कोटा के सीएमओ बीएस तंवर को इस मामले पर जवाब देने के लिए 3 जनवरी को आयोग के कार्यालय में तलब किया है।

राज्य में जनस्वास्थ्य सुविधाओं पर काम करने वाले अजय पाटनी ने न्यूज़क्लिक से बातचीत में कहा, ‘इस समस्या को समझने के लिए सबसे पहले इसकी जड़ को समझना होगा। यहां प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा कमज़ोर है। दूर-दराज इलाकों में तो लोग अस्पताल ही नहीं जाते, कई मौतें घर पर ही हो जाती हैं। हालांकि बीते कुछ सालों में लोग अस्पताल तक धीरे-धीरे पहुंचने लगे हैं। अगर राज्य में ऐसी मौतें रोकनी है तो सबसे पहले ज़मीनी स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करवानी होंगी, क्योंकि अक्सर मरीज़ बड़े अस्पतालों तक देर में पहुंचते हैं। और इन अस्पतालों पर काफ़ी भार भी होता है।’

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