रुद्रपुर: प्रशासन की मनमानी; न्याय की जगह मज़दूर नेताओं पर गुंडा ऐक्ट, असल अपराधी बेखौफ

रुद्रपुर (उत्तराखंड)। उत्तराखंड की भाजपा सरकार अब बेखौफ होकर मालिकों को मनमानी और गैरक़ानूनी कृत्यों की खुली छूट दे रही है। वहीं हक़ के लिए संघर्षरत मज़दूरों के दमन और खौफ का माहौल बनाने के लिए पूरी तरह से सक्रिय है। संघर्ष का नाम लेते ही उसकी पुलिस और प्रशासन मज़दूरों पर फर्जी मुक़दमें थोपने के लिए तत्पर है।

ताजा घटना में श्रम कानूनों को लागू करने, मालिक के गुंडों के हमलों व दमन के खिलाफ लंबे समय से संघर्षरत डॉल्फिन मज़दूरों को न्याय देने की जगह डॉल्फिन कम्पनी की सह पर जिलाधिकारी उधमसिंह नगर ने मज़दूर नेताओं को गुंडा, किसी गिरोह का सदस्य या सरगना बताया है।

डीएम महोदय ने डॉल्फिन मजदूर नेता ललित कुमार, सोनू कुमार, वीरू सिंह, बब्लू सिंह और इनका मार्गदर्शन कर रहे इंकलाबी मजदूर केंद्र के पूर्व अध्यक्ष कैलाश भट्ट और राजेश सक्सेना को नोटिस जारी किया है।

जारी नोटिस के माध्यम से एसएसपी ऊधम सिंह नगर की कथित रिपोर्ट के आधार पर डीएम ने मज़दूर नेताओं को गुंडा व घोर आपराधिक कृत्यों में लिप्त बताकर जिला बदर करने की चेतावनी देते हुए 25 जून 2024 को एडीएम नजूल ऊधम सिंह नगर के समक्ष अपना पक्ष रखने का निर्देश जारी किया है।

एक मज़दूर नेता के लिए जारी नोटिस की घटिया भाषा देखें-

डीएम द्वारा जारी नोटिस में मज़दूरों के लिए लगातार संघर्षरत व समर्पित मज़दूर नेता के बारे में बेहद घटिया, अमर्यादित व आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया गया है। नोटिस में लिखा है कि-

“कैलाश भट्ट गुंडा है अर्थात व स्वयं या किसी गिरोह के सदस्य या सरगना के रूप में अभ्यस्ततः भारतीय दंड संहिता के अध्याय 16, 17 एवं 22 के अधीन दंडनीय अपराध करता है या करने का प्रयास करता है या करने के लिए दुष्प्रेरित करता है। इसकी सामान्य ख्याति दुःसाहसिक और समुदाय के लिए एक खतरनाक व्यक्ति होने की है।”

“थाना पंतनगर में उनकी गतिविधियां या कार्य व्यक्तियों की जान या संपत्ति के लिए संत्रास, संकट अपहानि करते हैं या करने के लिए आयोजित है ऐसा विश्वास करने का उचित कारण है कि वह जिले या उसके किसी भाग में भारतीय दंड संहिता के अध्याय 16, 17 एवं 22 की अधीन या द सप्रेशन आफ इम्पारल ट्रैफिक इन वीमेन एंड गर्ल्स एक्ट 1956 के अधीन या यूपी एक्साइज एक्ट 1910 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के करने में अथवा किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण में लगा है या लगने वाला है और साक्षीगण अपनी जान या संपत्ति के संबंध में अपनी आशंका के कारण उसके विरुद्ध साक्षी देने को तैयार नहीं है और सख्सीगढ़ अपनी जान या संपत्ति के संबंध में अपनी आशंका के कारण उसके विरुद्ध साक्ष्य देने को तैयार नहीं।”

नोटिस में यह भी लिखा है कि- “(उस) का आपराधिक इतिहास व जनता में आतंक होने के कारण उसका जनहित में आजाद रहना उचित नहीं है और उसे जनपद उधम सिंह नगर की सीमा से बाहर निष्कासित करने की (पुलिस अधीक्षक ने) संस्तुति की है।”

इसी तरह की भाषा अन्य मज़दूर नेताओं की नोटिस में भी दर्ज हैं।

पुलिस-प्रशासन सक्रिय: मज़दूरों पर लगातार फर्जी मुक़दमें

यह पहला मामला नहीं है। उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूर अपने हक़ के लिए जैसे ही आवाज उठाते हैं, मालिकों की चाहत से पुलिस मनगढ़ंत नोटिस तैयार करती है, जिसके आधार पर प्रशासन द्वारा आए दिन मजदूरों के लिए कथित शांति भंग का नोटिस जारी किया जाता है, मजदूरों और मजदूर नेताओं को प्रताड़ित किया जाता है और उन पर फर्जी मुक़दमें थोपे जाते हैं।

अभी हाल में नील ऑटो (जेबीएम), रॉकेट इंडिया, डॉल्फिन, ब्रिटानिया ठेका मज़दूरों से लेकर अलग-अलग संघर्षों के दौरान श्रमिक संयुक्त मोर्चा के नेताओं, इंटरार्क, लुकास टीवीएस, नेस्ले, वोल्टास, भगवती, सत्यम ऑटो, गुजरात अंबुजा आदि सहित तमाम कंपनियों के मज़दूर इस प्रताड़ना के शिकार होते आ रहे हैं। कथित शांतिभंग के तहत धारा 107, 116, 116(3) के तहत पाबंद हो रहे हैं।

स्थिति यह है कि 2019 के चुनाव के समय जिला प्रशासन इंटरार्क व भगवती के मज़दूरों को चुनाव में बाधा पहुँचने वाला खतरनाक अपराधी घोषित करके पाबंद करने का हास्यास्पद नोटिस जारी कर चुका है।

2017 के आंदोलन के दौरान महिंद्रा सीआईई के कई मज़दूर आज भी खतरनाक आपराधिक मुकदमे झेल रहे हैं। गुंडा ऐक्ट और जिला बदर का वर्तमान नोटिस इसी कड़ी का हिस्सा है।

डॉल्फिन मालिक बेलगाम, मज़दूरों पर फर्जी मुक़दमें

उल्लेखनीय है कि डॉल्फिन कम्पनी के मज़दूर क़ानूनन न्यूनतम वेतन व बोनस आदि देने तथा स्थाई मजदूरों को ठेकेदार के तहत नियोजित करने व मजदूरों को अवैध रूप से नौकरी से निकालने के खिलाफ लगातार संघर्ष कर रहे हैं।

जवाब में मालिक की खुली गुंडई जारी है, मज़दूरों पर 16 जून 2024, 5 जून और 5 मई 2024 को गुंडों के हमले, महिलाओं से छेड़छाड़ आदि की तमाम घटनाओं पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। इसके उलट प्रबंधन की फर्जी तहरीरों पर मज़दूरों और उनके समर्थकों पर मुक़दमें दर्ज होते रहे।

एसएसपी ने मोर्चा नेता को कहा गुंडा

यही नहीं इस अन्याय के खिलाफ 18 जून 2024 को श्रमिक संयुक्त मोर्चा उधमसिंह नगर का एक प्रतिनिधि मंडल एसएसपी महोदय से मिलने गया तो उन्होंने मोर्चा के कार्यकारी अध्यक्ष दलजीत सिंह को गुंडा कहकर जलील करते हुए अपने कार्यालय से बाहर निकाल दिया।

20 जून को श्रमिक संयुक्त मोर्चा का प्रतिनिधि मण्डल डीएम महोदय से मिला और उनके माध्यम से पुलिस महानिरीक्षक कुमाऊ क्षेत्र को ज्ञापन प्रेषित करके हस्तक्षेप करने की मांग की गई। उस समय डीएम महोदय ने भी अपने स्तर से कार्यवाही करने का अस्वासन दिया।

लेकिन इसके विपरीत सुनियोजित तरीके से डीएम महोदय द्वारा मज़दूर नेताओं को गुंडा घोषित कर जिला बदर करने की चेतावनी का नोटिस जारी कर दिया गया।

बेहद निंदनीय व क्षोभकारी घटना

प्रशासन के इस कृत्य पर मज़दूर सहयोग केन्द्र ने भर्त्सना करते हुए कहा कि निश्चित रूप से यह बेहद निंदनीय घटना है। क्षेत्र में बेलगाम आपराधिक घटनाओं पर आँखें मूँदे प्रशासन द्वारा हक़ की आवाज उठाने वालों को गुंडा घोषित करना शासन के चरित्र और निरंकुशता का एक नमूना है।

उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्र में मालिकों के खुले शोषण, अन्याय, अत्याचार को शासन-प्रशासन व भाजपा सरकार द्वारा बढ़ावा देने और पीड़ित मज़दूरों को दबाने की कोशिश व मज़दूर नेताओं पर गुंडा ऐक्ट थोपने से खौफ का माहौल बनाना राज्य में बढ़ते पुलिसिया राज का एक उदाहरण मात्र है। इसका हर तरीके से विरोध जरूरी है, ताकि इस निरंकुशता पर अंकुश लग सके।

मज़दूर सहयोग केन्द्र ने की मांग

  • इंक़लाबी मज़दूर केन्द्र के पूर्व अध्यक्ष कैलाश भट्ट व डॉल्फिन मज़दूरों पर गुंडा ऐक्ट सहित दर्ज सभी फर्जी मुक़दमें रद्द करो!
  • असल गुंडों पर कार्रवाई की जगह मजदूरों का दमन बंद करो!
  • सिडकुल प्रबंधन और पुलिस, प्रशासन की मिलीभगत द्वारा मजदूरों पर लगाये सभी मुकदमों की निष्पक्ष जांच हो!
  • मालिकों की सेवा बंद करो! मज़दूरों के शोषण-उत्पीड़न पर रोक लगाओ!
  • डॉल्फिन, लुकास टीवीएस, करोलिया लाइटिंग, इंटरार्क सहित सभी पीड़ित मज़दूरों को न्याय दो!

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