ग्राउंड रिपोर्ट: चौसा थर्मल पावर प्लांट पर आंदोलनरत किसानों का बर्बर पुलिसिया दमन क्यों?

बाजार रेट से मुआवजा, स्थानीय युवकों को रोजगार आदि मांग पर पॉवर प्लांट से प्रभावित किसानों का चुनाव आचार संहिता के बहाने पुलिस ने कई गांवों में जमकर तांडव मचाया।

चौसा/बक्सर। कोचस गांव के रास्ते चौसा की ओर जाने का रास्ता पूछे जाने पर वृद्ध महिला (70 वर्ष) पहले तो अचरज भरी नजरों से देखती हैं फिर हाथों की उंगलियों से आगे की ओर इशारा करते हुए आगे बढ़ जाती हैं। आवाज देने पर उनके कदम थम जाते हैं। कुछ कह पाता कि इसके पहले ही सवाल कर बैठती हैं “ए बचवा केने (कहां) जाए क बा? कवन गांव के हया, के-के हिया जाएं के बाय? वह अपनी बात को इत्मीनान से कह डालती हैं, मानों वह पूरी तरह से तस्दीक करना चाहती थी।

ख़ैर उन्हें बताया जाता है कि हम प्रेस से हैं, पत्रकार हैं तो थोड़ा सहमति में सिर हिला कर कहती हैं “अखबार वाला लोगन हय बचवा?” जी.. माता जी! चौसा जाना है, बताए जाने पर वह वृद्ध महिला बोल पड़ती हैं “ऐ बचवा कहवा, केकरा घरे जात बिया? कोई जवाब दे पाता कि वह कहे जा रहीं हैं “देखा केहूं मिलत हौ कि ना, सबे त भागल-परायल बा, पुलसियन (पुलिस) खोज ता, घरे दुआरे खोज-खोज के मारत-पीटत अऊर बंद करत बिया। तब का करिहें सब लुकाआत, भागत-फिरत हैं। ई साल त फगुओ नाही खेलल गयल, पुलिसियन मार मार खून बहाएं देहने है। का लईका-बच्चा, मरद-मेहरारू, बूढ़-पुरान केहूं के ना छोड़ले बाड़न। घरों-दुआर, चूल्हा-चऊका, बर्तनों के तोड़ कूंच देले हयन।”

वृद्ध महिला की बातों से साफ हो चला था कि सबकुछ ठीक-ठाक नहीं है। पुलिसिया प्रताड़ना का यह प्रारंभिक उदाहरण वस्तुस्थिति को साफ करने के लिए काफी था। जैसे-जैसे आगे की ओर क़दम बढ़ रहे थे वैसे-वैसे ही खामोशी का आलम गहरा होता जा रहा था। शांति ऐसी मानों कोई इधर रहता ही नहीं है। फिर मन में ख्याल आया कि होली का त्योहार बीता है लोग थके-मांदे होंगे सो आराम कर रहे होंगे?

यह सोचना हमारी भूल रही, दरअसल इस शान्ति के पीछे का बड़ा कारण पुलिसिया कार्रवाई का खौफ रहा है, जिसके कारण ग्रामीण गांव से पलायन करने के साथ ही डरे सहमे हुए हैं। होली पर्व के दूसरे दिन की खामोशी होली की खुमारी नहीं बल्कि पुलिसिया कार्रवाई के खौफ को लेकर बनी हुई थी। जिससे चौसा ही नहीं आस-पास के कई गांवों के लोग बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

पुलिसिया खौफ में बिना रंग खेले बीती होली

‘फगुआ’ यानी ‘होली’ यह पर्व उत्तर प्रदेश और बिहार में ख़ासा लोकप्रिय त्योहार है। हर कोई होली के रंगों में सराबोर हो अलमस्त नजर आता है। यूपी और बिहार के सरहदी इलाकों बिहार के बक्सर, चौसा और यूपी के गाजीपुर, बलिया में तो कई दिनों तक होली की खुमारी मिटती ही नहीं है। गंगा, घाघरा, कर्मनाशा नदियों का जिस प्रकार से संगम होता है ठीक उसी प्रकार से यहां के लोग भी फगुआ के रंगों में गोते लगाते हुए चट्टी-चौराहे से लेकर गांव के चौपाल, बाग बगीचे में दिखाई दे जाते हैं। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा, रीति-रिवाजों को मानो इस वर्ष पुलिस ने ग्रहण लगा दिया है। हंसी-ख़ुशी, उत्साह-उमंग भरे माहौल के स्थान पर डर-भय, खौफ-दहशत और दर्द कसक पीड़ा ने जगह ले लिया है। न कोई फाग-राग, ना ही कोई उत्साह उमंग हर तरफ सिर्फ खामोशी और भय भरा माहौल का आलम दूर-दूर तक नज़र आया है।

वज़ह जान रोम-रोम सिहर उठता है, जख्म देख कलेजा दहल जाता है। खौफ का आलम यह है कि ग्रामीण गांव में किसी भी अनजान आदमी के आने मात्र से सशंकित हो उठते हैं। किसी वाहन में लगे हुए हूटर के दूर से आते आवाज को सुनकर दूर तक नजरें गड़ा देते हैं सशंकित नज़रों से आस-पास से लेकर गांव की ओर आने वाले मार्ग पर नज़र गड़ा देते हैं कि कहीं कोई आ रहा है क्या?

कोई किसी से कुछ कहने बोलने से पहले पुरी तरह से तस्दीक कर लेना चाह रहा है कि वह भरोसे का व्यक्ति है या कहीं पुलिस प्रशासन का मुख़बिर तो नहीं है?

लाठी के बल पर किसानों को दबाने की कुचेष्टा

इस खौफ और दहशत के पीछे चौसा पावर प्लांट का वह प्रोजेक्ट है जिसको लेकर पिछले वर्षों से ही बक्सर प्रखंड अंतर्गत कई गांवों के किसान न्यायोचित मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं। जिन्हें विश्वास में लेने के बजाए शासन-प्रशासन पुलिसिया कार्रवाई के बल पर किसानों को दबाने की कुचेष्टा कर रहा है। पिछले वर्ष की कार्रवाई से सबक लेने की बजाए पुनः उसी की पुनरावृत्ति करते हुए इस बार पुलिस-प्रशासन ने किसानों को कहीं का भी नहीं छोड़ा है। ऐसा दर्द दिया है जिसे लोग शायद ही भूल पायेगें।

ठोस विकल्प के बजाए चतुराई और वैकल्पिक राह निकालना बना घातक

बिहार राज्य के जनपद बक्सर प्रखंड अंतर्गत चौसा में निर्माणाधीन 11 हजार करोड़ की लागत वाली 1320 मेगा वाट की जल विद्युत परियोजना का निर्माण कार्य जारी है। 660 मेगा वाट की दो यूनिट के लिए किसानों की 1058 एकड़ भूमि को मुख्य प्लांट के लिए अधिग्रहित किया गया है। जबकि किसानों की लगभग 225 एकड़ भूमि से चौसा थर्मल पॉवर प्लांट (एसटीपीएल) को बिजली उत्पादन के लिए रेल कॉरिडोर व वाटर कॉरिडोर बनना है। साल 2019 में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन इस परियोजना का शिलान्यास किया था। जून-जुलाई 2023 में उद्घाटन किया जाना था, लेकिन शुरू से ही यह परियोजना किसानों का दिल जीतने के बजाए जिम्मेदार अफसरों के हठधर्मिता, किसान विरोधी मंसूबों के चलते न केवल विवादों से घिरता आया है, बल्कि विरोध-प्रदर्शन के दौर से भी दो-चार होता आया है।

केन्द्र सरकार की महत्वपूर्ण इस परियोजना की परिकल्पना को पहले बिहार राज्य पावर डिस्ट्रीब्यूशन द्वारा किया जाना था, लेकिन कार्य प्रारंभ नहीं हो पाया था जबकि आपा-धापी में भूमि अधिग्रहण कर लिया गया था। बताया जाता है कि इस परियोजना के शिलान्यास बाद परियोजना के निर्माण कार्य के तहत रेल कॉरिडोर, वाटर पाइप लाइन का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया गया। इसमें कंपनी द्वारा लीज पर जमीन लेने का भी एग्रीमेंट किया गया, लेकिन जब अधिग्रहण का प्रयास किया गया तो किसानों ने बिना विश्वास में लिए मनमानी का आरोप लगाते हुए विरोध कर दिया तो कंपनी के लोगों ने चतुराई दिखाते हुए वैकल्पिक मार्ग निकालना शुरू कर दिया। बस यहीं से किसानों का आक्रोश बढ़ता ही गया। किसानों की माने तो उनकी मांगों को थर्मल पॉवर प्लांट के मुलाजिमों ने जायज़ तो ठहराया ज़रूर, लेकिन कभी भी सहानुभूति पूर्वक उनकी न्योचित मांगों को पूरा करने का रंच मात्र भी प्रयास नहीं किया है।

चौसा थर्मल पॉवर प्लांट को लेकर कई गांवों के किसान आंदोलित

भूमि अधिग्रहण से प्रभावित, विस्थापित हुए लोगों के हितों की रक्षा को समर्पित स्वयंसेवी संगठन ‘प्रभावित किसान-खेतिहर मजदूर मोर्चा चौसा (बक्सर)’ के बैनर तले 17 अक्टूबर 2022 से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे हुए हैं। जिसके समर्थन में चौसा, कोचस, बनारपुर, कोचडीह, मोहनपुरवा, न्यायीपुर सहित 22 प्रभावित गांवों के लोग हैं।

बक्सर के चौसा में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ 500 दिनों से भी ज्यादा समय से किसानों का सत्याग्रह जारी है। अचानक से 20 मार्च 2024 को बक्सर जिला प्रशासन ने बलपूर्वक आंदोलनकारियों को सत्याग्रह स्थल से हटा दिया। चुनाव आचार संहिता और हाईकोर्ट के आदेश का बहाना बना कर लाठीचार्ज किया। किसानों की माने तो चौसा के बनारपुर, मोहनपुरवा गांव के किसान आंदोलन के सक्रिय साथियों के घर में घुसकर महिलाओं, बच्चों, नमाजियों, खेत में काम कर रहे किसानों-मजदूरों तक को पुलिस ने बेरहमी पूर्वक लाठियों से पीटा है। 90 वर्ष के वृद्धजनों से लेकर 3 वर्ष की बच्ची को बुरी तरह जख्मी कर दिया गया है। पुलिसिया बर्बर कार्रवाई को लेकर इन गांवों में आतंक का माहौल व्याप्त है। पुलिस के खौफ से लोग घर छोड़कर भागे हुए हैं। 40 से अधिक किसानों को गिरफ्तार किया गया हैं। और लोगों की तलाश की जा रही है सभी पर झूठे केस दर्ज कराए गए हैं।

धनरूआ (पटना) के उमेश कहते हैं कि “नीतीश कुमार और मोदी की डबल इंजन की सरकार गैर कानूनी तरीके से पूरे बिहार के किसानों की जमीन कब्जा कर रखा है। उचित मुआवजा की मांग करने पर दमनात्मक कारवाई जारी है। यह सरासर नाइंसाफी है, एक टीम गठित कर अविलंब चौसा की घटना को जानने का प्रयास किया जाय तथा प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा के साथ उनको न्याय दिलाया जाए।”

बंदी अधिकार आंदोलन के संयोजक संतोष उपाध्याय “जनचौक” को बताते हैं कि “चौसा के बनारपुर में जो कुछ हुआ है उसे उचित नहीं कहा जा सकता है। बक्सर पुलिस प्रशासन पूरी तरह से चौसा थर्मल पॉवर प्लांट के इशारे पर काम कर रहा है। वह कहते हैं कि चौसा में किसानों के मांग को सकारात्मक रूप में वार्ता द्वारा सुलझाया जाना चाहिए और जिनकी जमीन प्लांट और थर्मल पावर के निर्माण में गई है उनको बाजार रेट से मुआवजा, प्लांट में स्थानीय युवकों को रोजगार आदि दिया जाना चाहिए। किसानों के मांग को दमन के रास्ते से मिटाना धमकाना कानून गलत है।”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का क्षेत्र है चौसा

बिहार राज्य का चौसा (बक्सर) का युद्ध भारतीय इतिहास में लड़े गये महत्त्वपूर्ण युद्धों में से एक माना जाता है। चौसा के लोगों की माने तो यह युद्ध 26 जून, 1539 ई. को मुग़ल बादशाह हुमायूं एवं शेरशाह की सेनाओं के मध्य गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित ‘चौसा’ नामक स्थान पर लड़ा गया था। चौसा का यह महत्त्वपूर्ण युद्ध हुमायूं अपनी कुछ ग़लतियों के कारण हार गया था।

न्यायालय का हवाला देकर पुलिस ने ढाया कहर

बक्सर जिला प्रशासन ने न्यायालय से दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के अंतर्गत निषेधाज्ञा जारी करवा कर आंदोलनकारियों को बलपूर्वक हटाया। किसानों का आरोप है कि “वह 20 मार्च को भी शांतिपूर्ण ढंग से प्लांट गेट के बाहर तिरपाल डाल कर अनशन पर बैठे हुए थे, अचानक से भारी संख्या में आए पुलिस अधिकारियों ने पहले धरने को समाप्त करने के लिए दबाव बनाया, किसान मानने को तैयार नहीं थे। जब-तक कि जिम्मेदार अधिकारी मौके पर आकर उनकी मांगों और मुआवजे पर सहमति की मुहर न लगा जातें।

जैसे ही लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी हुआ प्रशासन धारा 144 का हवाला देते मनमानी पर आमादा हो गया। इधर किसान जब-तक कुछ समझ पाते कि शांतिपूर्ण ढंग से अनशन पर बैठे किसानों को बलपूर्वक हटाया जाने लगा था जिसकी कानों कान खबर होते ही आसपास के गांवों से महिलाएं पुरुष मौके की ओर बढ़ने लगे थे। ग्रामीणों की बढ़ती भीड़ को देख पुलिस आपा खो बैठी और लाठी चार्ज के साथ आंसू गैस के गोले छोड़ने लगी थी। पुलिस प्रशासन की माने तो किसानों ने कई राउंड फायरिंग शुरू कर दिया था जिसके जवाब में पुलिस को भी हवाई फायरिंग करनी पड़ी है।

किसानों से भिन्न है पुलिस प्रशासन का तर्क

20 मार्च 2024 बुधवार को सुबह में सदर एसडीएम के नेतृत्व में एक पुलिस टीम विभिन्न मांगों को लेकर धरना दे रहे किसानों को आदर्श आचार संहिता के कारण हटाने के लिए पहुंचे थे। इस दौरान पुलिस और धरना दे रहे किसानों के बीच झड़प हो गई। कहा जा रहा है कि किसानों के धरना-प्रदर्शन स्थल पर कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा पुलिस पर पथराव और फायरिंग की घटना को अंजाम दिया गया। जिसके कारण कुछ पुलिसकर्मी चोटिल हो गए थे। इसके बाद पुलिस ने गांवों में जमकर तांडव मचाया। पुलिस ने ग्रामीणों को जमकर पीटा। वहीं कई लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक राज किशोर राजभर, सर्वा चौहान, बब्लू नट, संतोष नट, अनित नट, पवन नट, दिनेश नट, महेन्द्र राय, अभिमन्यू राय, अंबिका राय, मिटेल कुमार राजभर, सीमा देवी, लक्ष्मीना देवी, काशी सिंह, आशा देवी, माना देवी, सुबली देवी, नागेन्द्र तिवारी, रजनी सिंह, राजेन्द्र सिंह, मुद्रिका चौधरी, राजन कुमार सिंह, चंद्रभूषण तिवारी, प्रदीप तिवारी, ऋषिकेश उपाध्याय, संजय तिवारी और मोहन चंद्र चौधरी को गिरफ्तार किया गया है।

घरों में घुसकर पुलिस ने भांजी लाठियां

किसान रामसखा बताते हैं कि “सबकुछ आम दिनों की भांति चल रहा था। बक्सर प्रखंड के SDM और DSP ने किसानों की मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने के बजाए 24 घंटा समय दे रखा था। इन अधिकारियों की बातों से साफ हो चला था कि यह कभी भी कुछ भी कर सकते हैं, सो किसानों को एकजुट करने का आह्वान किया गया कि इसके पहले ही दमन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। पुलिस ने आंदोलनरत किसानों को थर्मल पावर प्लांट गेट से बलपूर्वक खदेड़ने के साथ ही उनके टेंट को उजाड़ दिया। किसानों को घरों में घुसकर बुरी तरह से मारा पीटा गया। घरों के खिड़की, दरवाजों को तोड़ कर चौका चूल्हा तक में तोड़फोड़ की गई। बचाव में चीखते-चिल्लाते बच्चों महिलाओं को भी नहीं छोड़ा गया।”

प्लांट के मुख्य गेट के पास चल रहे किसानों मजदूरों के आंदोलन की अध्यक्षता कर रहे जयमंगल पांडेय का कहना है कि “एक तरफ एसटीपीएल कंपनी के नए सीईओ द्वारा सकारात्मक वार्ता की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ एसडीएम तथा डीएसपी द्वारा कहा जा रहा है कि प्लांट के मुख्य गेट से बक्सर-कोचस मुख्य मार्ग तक धारा 144 लगाकर धरनारत किसान मजदूर बेरोजगार नौजवान पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। जिसके विरोध में पूर्व में सभी धरनार्थियों ने अर्धनग्न प्रदर्शन करते हुए विरोध जताते हुए कहा था कि जब तक उनकी 11 सूत्री मांगों का समाधान नहीं हो जाता तब तक उन लोगों का मुख्य गेट के पास आंदोलन चलता रहेगा। प्रशासन सिर्फ मुख्य गेट से किसानों को हटाने का ही कुत्सित प्रयास करता आया है जबकि उनकी न्योचित मांगों पर कभी भी विचार करना चाहा ही नहीं।”

इंटक के प्रदेश महासचिव रामप्रवेश सिंह यादव तथा प्रभावित किसान मजदूर यूनियन के संयोजक अशोक तिवारी कहते हैं “मोर्चा विगत 17 माह से अपनी विधि सम्मत मांग को लेकर शांतिपूर्ण धरना देता आ रहा है। परन्तु अपनी समस्याओं का समाधान न होता देख व स्थानीय सांसद का बयान, एसडीएम और डीएसपी की संदेहास्पद कार्यशैली से किसान क्षुब्ध हैं। फिर भी हम अनिश्चितकालीन शांतिपूर्ण तरीके से समस्याओं का समाधान होने तक अनशन पर बैठे हुए थे जिस पर पुलिस के दम पर बर्बर तरीके से कार्रवाई कर शासन-प्रशासन ने किसान विरोधी होने का उदाहरण दिया है।”

20 मार्च की घटना से दु:खी किसान एक स्वर में कहते हैं कि “अब जेल भरो आंदोलन ही एक मात्र रास्ता है, पुलिस की बर्बरता यह दिखाती है कि भोले-भाले शान्तिपूर्ण तरीके से लगभग 500 दिनों से ज्यादा समय से किसान धरने पर बैठे थे, लेकिन किसानों के घर में घुसकर बर्बर ढंग से क्रूरतापूर्वक महिलाओं, दुधमुंहे बच्चे, बूढ़े और बुजुर्गों को पीटा गया यह जलियांवाला हत्याकांड की तरह आज के भाजपा और जदयू ने मिलकर जनरल डायर की याद को ताजा कर दिया है। किसानों की हाय तौबा इन दोनों पार्टियों को जरूर लगेगी। किसान मानने वाले नहीं हैं अपनी भूमि का मुआवजा लेकर रहेंगे।”

नेताओं से ख़फ़ा हैं किसान

बक्सर के चौसा थर्मल पावर प्लांट मामले में पुलिस के द्वारा किसानों पर किए गए लाठीचार्ज मामले में लेकर बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “किसानों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया है। जिसकी उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी। एनडीए सरकार में किसी के हितों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है। बिहार की एक-एक जनता हमारे लिए वंदनीय है।”

भाजपा-जदयू की सरकार किसानों से माफी मांगे

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) बिहार, बक्सर के चौसा में अपनी जमीन के मुआवजे को लेकर धरना-प्रदर्शन कर रहे किसानों पर बर्बरता पूर्वक लाठी गोली चलाने, महिलाओं और किसानों को बेरहमी से पिटाई कर घायल करने, बड़ी संख्या में किसानों को गिरफ्तार करने की घटना की भर्त्सना करते हुए दोषी पुलिस कर्मियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही ऐसी घटना का अंजाम देने वाले बक्सर के डीएम और एसपी को तत्काल बर्खास्त करने और इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री से माफी मांगने की मांग की है।

घायल चोटिल किसानों को उपचार की है दरकार

अब इसे गिरफ्तारी का खौफ कहें या पुलिस का भय पुलिस की पिटाई से घायल हुए किसान अपना इलाज कराने के लिए नहीं जा पा रहे है। उन्हें भय है कि कहीं पुलिस गिरफ्तार न कर ले। ग्रामीण चोरी छुपे तौर पर अपना इलाज करा रहे हैं।

चौसा कांड की गूंज राजधानी पटना से लेकर दिल्ली तक

चौसा कांड की गूंज बिहार की राजधानी पटना से होते हुए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक होने लगी है। बिहार की राजधानी पटना में स्वामी सहजानंद सरस्वती आश्रम में 23 मार्च 2024, को संयुक्त किसान मोर्चा, बिहार की हुई बैठक में चौसा कांड की गूंज रही है। चौसा प्रखंड के बनारपुर, मोहनपुरवा और कोचाडीह गांवों में लोगों के घरों में घुसकर में 20 मार्च 2024 को जिला प्रशासन के नेतृत्व में हुए पुलिसिया तांडव एवं नंगा नाच को सुनियोजित करार दिया गया।

संयुक्त किसान मोर्चा ने किसान आंदोलन को कुचलने के लिए जिला प्रशासन द्वारा की गई इस कुकृत्य की घोर निंदा करते हुए कहा कि डबल इंजन की मोदी-नीतीश सरकार से हम मांग करते हैं कि अविलंब न्यायिक जांच कराकर दोषी पुलिस एवं पदाधिकारियों पर अविलंब कठोर कार्रवाई की जाए।

(चौसा से संतोष देव गिरी की ग्राउंड रिपोर्ट)

साभार: जन चौक

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