नए आपराधिक क़ानून: जनवादी अधिकारों पर हमले का नया हथियार

BNS_Mehanatkash

मोदी सरकार द्वारा नए आपराधिक कानूनों को लाने (या यूं कहे पुराने कानूनों का नाम बदलने) का मकसद औपनिवेशिकता से छुटकारा पाना बताया गया। यह उसी सनातन काल में वापस लौटने की प्रक्रिया का हिस्सा थी जिसके ज़रिए शहरों और सड़कों के नाम बदले गए थे।

अंग्रेज और हिन्दुस्तानी आवाम का संबंध ओपनिवेशिक दासता का था और कानूनों का निर्माण और इस्तेमाल सत्ता की सुरक्षा और संचालन से हितबद्ध था। पूंजीवादी समाज में राज्य सत्ता के ज़रिए उत्पादन संबंधों में पूंजीपतियों के हित में होने वाले परिवर्तन को नियंत्रित करने, आवाम पर मर्ज़ी के मुताबिक़ शासन करने के लिए विभिन्न कानूनों को समय-समय पर लागू किया जाता रहा है।

अतः किसी भी कानून के निर्माण और विकास की प्रक्रिया बताती है कि उसको जनता के लिए कैसे इस्तेमाल किया जाएगा। मौजूदा राज्य सत्ता द्वारा तैयार किए गए ढांचे में अपने ही नागरिकों के प्रति इतना संदेह और अविश्वास देखा जाता है कि राज्य स्पष्टतः नागरिकों के विरोध में खड़ा दिखाई देता है।भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में आपराधिक कानून वर्ग विभाजन को और बढ़ाते हैं क्योंकि अमीर और साधन संपन्न लोगों को हाशिए पर पड़े और कमजोर लोगों की तुलना में न्याय तक बेहतर पहुंच मिलती है।

नए आपराधिक कानूनों में आपराधिक न्याय प्रणाली के दंडात्मक चरित्र को बरकरार रखा गया है और पुलिस को पहले से ज्यादा शक्तियां प्रदान की गई हैं। उदाहरण के लिए, बीएनएसएस, सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस हिरासत की अधिकतम सीमा को 15 दिनों से बढ़ाकर 60 दिन या 90 दिन (अपराध की प्रकृति के आधार पर) करता है।

मौजूदा कानून के तहत, पुलिस हिरासत 15 दिनों तक सीमित है। गिरफ्तार व्यक्तियों की सुरक्षा और लंबे समय तक हिरासत में रहने के बाद जबरन और गढ़े गए सबूतों के बढ़ते जोखिम को देखते हुए यह प्रावधान पुलिस के राजनीतिक इस्तेमाल और मनमानी को बढ़ावा देने जैसा है। बीएनएसएस के कुछ प्रावधान, जैसे कथित आतंकवादी कृत्य, पुलिस को ऐसी शक्तियाँ प्रदान करते हैं जो कठोर कानूनों, जैसे कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दी गई शक्तियों से भी कहीं अधिक व्यापक हैं।

पुलिस को यह तय करने की छूट दी गई है कि अपराध बीएनएस में बनेगा या यूएपीए में। गैर संज्ञेय अपराधों में मुकदमा चलने लायक है या नहीं यह तय करने का अधिकार भी न्यायपालिका के बजाय पुलिस को सौंप दिया गया है। पुलिस की मौजूदा शक्तियों में संसद द्वारा की गई वृद्धि, जिसमें अन्य कानून भी शामिल हैं, औपनिवेशिक शक्तियों को ही जारी रखने का प्रयास है – उन्हें खत्म करने का नहीं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिता की धारा 43(3) के अनुसार पुलिस विचाराधीन कैदी को गिरफ्तारी और कोर्ट में प्रस्तुत करने के समय हथकड़ी लगा सकती है, जबकि अपने न्यायिक दृष्टांतों में पुलिस के इस आचरण को सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय गरिमा के खिलाफ बताया था। यह वर्तमान कानून के दंडात्मक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

नए कानून में, प्राथमिकी दर्ज कराने और गिरफ़्तारी के संबंध में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा विभिन्न मामलों में अपने न्यायिक दृष्टांतों में स्थापित कुछ सकारात्मक प्रक्रियाओं को नजरअंदाज कर उसे तोड़ मरोड़कर निष्प्रभावी बनाने की कोशिश की गई है। वहीं विभिन्न लॉ कमिशन द्वारा दिए गए सुझाव को नजरअंदाज भी किया गया है, जैसे कि झूठे मामलों में पुलिस द्वारा फंसाए गए और गलत सजा पाए लोगों की क्षतिपूर्ति और दोषी पुलिस कर्मियों पर कार्यवाही के बारे में नई संहिता खामोश रहती है।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) में प्रावधान था कि पुलिस हिरासत में किसी की मृत्यु होने या गायब हो जाने पर इसकी न्यायिक जांच की जाएगी। मगर भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिता की धारा 196 के तहत अब उपरोक्त विषय में सिर्फ जांच की जाएगी, न्यायिक जांच नहीं, जोकि चिंताजनक है।

नए कानून (BNS) में कई जगह अपराधों की परिभाषा और श्रेणियां स्पष्ट नहीं है और कई प्रावधानों का दोहराव है, जोकि पुराने कानून को नए नाम से वापस लाने में भाजपा सरकार के हल्केपन और जल्दबाजी को दर्शाता है।

पुलिस रिफॉर्म और न्यायिक संरचनागत ढांचे के साथ-साथ औपनिवेशवादी और पुरुषवादी मानसिकता के बोझ से दबी न्यायिक प्रक्रिया में सुधार किए बैगर वर्तमान लोकतांत्रिक ढांचे मे भी इन संशोधनों का भारतीय नागरिक को कोई लाभ नहीं मिल सकता, बल्कि मुकदमों के बोझ से भरी अदालत न्याय देने में और विलंब करेगी।

कुल मिलाकर नए कानून, मौजूदा सरकार द्वारा जनता की निगरानी बढ़ाने और भारतीय नागरिक के जीवन पर राज्य सत्ता का नियंत्रण बढ़ाने से अधिक किसी भी तरीके से परिभाषित नहीं किए जा सकते हैं। स्पष्ट है कि जनविरोधी तीन आपराधिक क़ानून जनवादी आंदोलनों और अधिकारों पर फासीवादी हमले के एक नए हथियार के हिसाब से लाए गए हैं।

संघर्षरत मेहनतकश’ अंक-52,  दिसंबर 2024   में प्रकाशित

भूली-बिसरी ख़बरे