नए आपराधिक क़ानून पर कार्यशाला: नए क़ानून कैसे देंगे पुलिस को असीमित अधिकार?

नाम बदलकर केवल भारतीयता का पुट डालने की कोशिश है। जनांदोलनों की कमर तोड़ने हेतु उसे संगठित अपराध के दायरे में लाना आसान होगा। गरीबों को मुकदमा दर्ज करवाना मुश्किल होगा।
रामनगर। साइंस फॉर सोसाइटी के तत्वाधान में रविवार को 1 जुलाई 2024 से लागू की गई भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम के आम जनता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर नगर पालिका के सभागार में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया।
उषा पटवाल के संचालन में आयोजित कार्यशाला में एडवोकेट मदन मेहता ने लागू की गई भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता व भारतीय साक्ष्य अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों पर विस्तार से रोशनी डालते हुए कहा कि नए कानूनों में पुलिस के लिए असीमित अधिकार होने के कारण आम जनता को न्याय पाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।

मुख्य अतिथि दिल्ली उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कमलेश कुमार ने नए कानूनों को पुराने कानूनों के नंबर में ही बदलाव बताते हुए कहा कि नाम बदलकर केवल भारतीयता का पुट डालने की कोशिश की गई है। इस कोशिश में दंडात्मक प्रक्रिया को न्यायिक प्रक्रिया में बदलने के जो दावे किए गए हैं, वह नहीं दिखते हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के अधिवक्ता कमलेश ने कहा कि मामूली अपराधों के लिए एक नई चीज कम्यूनिटी सर्विस नामक सजा का जिक्र है। लेकिन इसकी भी परिभाषा स्पष्ट नहीं है। जुर्माना राशि को असीमित किया गया है।
उन्होंने बताया कि जनांदोलनों की कमर तोड़ने के लिए उसे संगठित अपराध के दायरे में लाना आसान होगा। आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच रेगुलर पुलिस के निचले अधिकारियों के हाथ में होने के कारण इस कानून का व्यापक पैमाने पर दुरुपयोग होगा। संज्ञेय श्रेणी के अपराधों के एफआईआर पुलिस की मनमानी का शिकार बनेगी।
उन्होंने बताया कि तीन से सात वर्ष सजा के मुकदमें पुलिस थानों में आसानी से दर्ज नहीं किए जाएंगे। इन्हें दर्ज करने से पहले पुलिस अधिकारी मामले की 14 दिन जांच करने का समय दिया गया है। पुलिस की इस अड़ंगेबाजी के चलते प्रभावशाली तबका इसका लाभ उठाएगा। जबकि गरीबों को मुकदमा तक दर्ज करवाने के लिए अपनी एड़ियां घिसने पर मजबूर होना पड़ेगा।
नागरिक सुरक्षा संहिता में नागरिकों के अधिकार किस प्रकार सुरक्षित रहेंगे, यह भी स्पष्ट नहीं है। कुल मिलाकर नए कानून पुलिस राज्य की दस्तक प्रतीत होते हैं। जिनसे गरीबों को ही नुकसान उठाना पड़ेगा।
कार्यशाला के दौरान कमलेश ने मौजूद लोगों की कानूनी जिज्ञासाओं से जुड़े सवालों का भी जवाब दिए।
अंत में साइंस फॉर सोसाइटी यूनाइटेड के प्रवक्ता गिरीश चंद्र आर्य ने उपस्थित सभी लोगों का आभार जताया और कहा कि सोसाइटी द्वारा चलाए गए अभियान अंधविश्वास से नाता तोड़ो तर्क विज्ञान से नाता जोड़ो कार्यक्रम के तहत सोसाइटी सोसाइटी अंधविश्वास के खिलाफ अपना अभियान जारी रखेगी।
कार्यक्रम में एडवोकेट रवि मेहता, एडवोकेट प्रभात ध्यानी, एडवोकेट विक्रम मावड़ी भास्कर पपने, रजनी, लक्ष्मी ,ममता, मंजू नेगी, वीर सिंह, रेवि राम, हेम चंद्र आर्य, विद्यासागर ,अंजली जोशी , एडवोकेट वसीम, भूपेंद्र कुमार आदि लोगों द्वारा बड़ी संख्या में भागीदारी की गई।