नये अपराधिक क़ानून : भारत की संप्रभुता, एकता, अखंडता, आर्थिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा

लोकसभा चुनाव पूर्व औपनिवेशिक क़ानून बताकर देश के तीन महत्वपूर्ण कानूनों को मोदी सरकार ने खत्म करके जो तीन नए आपराधिक कानून या भारतीय न्याय संहिता बनाई, उसे देश की जनता पर तानाशाहीपूर्ण तरीके से थोपते हुए 1 जुलाई 2024 से लागू कर दिया गया है।

दरअसल यह देश में बढ़ते पुलिसिया राज का एक बड़ा उदाहरण है।

1 जुलाई को दिल्ली में नए क़ानून के तहत जिस शख्स के खिलाफ पहला मामला दर्ज किया गया है, वह नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास पुल के नीचे आधी रात को पापी पेट के लिए रेहडी लगाकर पानी और गुटका बेच रहा था। साफ़ है कि अब गरीब रेहड़ी भी नहीं लगा सकते।

क्यों खतरनाक हैं नए क़ानून?

ज्ञात हो कि अभी तक प्रचलित आईपीसी (इंडियन पीनल कोड) की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस); सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) तथा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) बना है।

तानाशाही का आलम यह कि ये विधेयक 20 दिसंबर को लोकसभा में तब पारित किए गए, जब दोनों सदनों से 141 विपक्षी सांसदों को मोदी सरकार ने निलंबित कर दिया था। और अब देशव्यापी विरोधों के बीच उसे जबरिया लागू कर दिया गया।

ये नए क़ानून “औपनिवेशिक” गुलामी को खत्म करने के नाम पर लाया गया है। लेकिन ये क़ानून कहीं भी अंग्रेजी राज से मुक्त नहीं करता है, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त नहीं करता है। क्योंकि यह भारत नहीं ‘इंडिया’ है और तमाम औपनिवेशिक गुलामी उसी रूप में मौजूद है।

आप मुखौटा बदलकर कुकृत्य को छिपा नहीं सकते हैं। यह बढ़ते तानाशाही का पुख्ता हथियार है और दमन के हरबा-हथियार को और पैना बनाने वाला है। याद रहे कि औपनिवेशिक गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने जितना दमन किया था, काले अंग्रेजों की देशी सरकारों ने आज़ाद भारत में पिछले 75 सालों में उससे कई गुना ज्यादा दमन किए हैं।

यह पूरी तरह से क्रूर, निरंकुश, हिंसक व झूठा है और इसमें भारतीयता जैसी कोई चीज नहीं है। यह भारतीय संविधान के विरुद्ध जाता है।

भारत देश अलग-अलग राष्ट्रीयताओं का संघ है, अलग-अलग भाषा और बोलियां हैं और इसीलिए कोई भी कानून या शासनादेश अंग्रेजी और हिंदी दोनों में जारी होता है। लेकिन ये तीनों कानून हिंदी में बनाए गए हैं और जिसपर दक्षिण भारतीय राज्यों से लेकर बंगाल तक विरोध के स्वर मुखर हुए हैं।

गौरतलब है कि आमजन विरोधी नव उदारवादी नीतियाँ लागू होने और देश में मुनाफे की खुली लूट के साथ पुलिसिया राज बढ़ता गया है, जो अब फासीवादी हमलों के बीच बेलगाम हो चुका है।

सत्ता की हनक से कहीं भी बुलडोजर चला देना, मनमाने तरीके से किसी भी विरोधी को जेल में डालना, ‘इनकाउंटर’ के बहाने फर्जी मुठभेड़ में मार देना, मोदी राज में पहले से भयावह रूप रूप ले चुकी हैं। ये भारतीय न्याय संहिताएं उसी दमन तंत्र को मजबूत करने की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।

नए कानून को लागू करने की कई जटिलताएं

उधर मोदी सरकार चुनाव के पहले से इसको लागू करने की तैयारी करती रही, पुलिस को ट्रेनिंग देकर उनके डंडे को और मजबूत करती रही। लेकिन बगैर व्यापक तैयारी अब इन कानूनों के लागू होने से न्यायपालिका से लेकर वकीलों तक के लिए यह एक मुश्किल और जटिल कानून का जमावड़ा भी खड़ा हो गया है।

1 जुलाई के बाद दर्ज मामलों को नये कानूनों के तहत देखा जायेगा जबकि पुराने मुक़दमें पुराने कानूनों के तहत। इस तरह पुलिस-वकील-जज सबको अगले 15-20 वर्षों तक दोनों कानूनों को ध्यान में रखना होगा जब तक पुराने कानूनों के केसों का पूरी तरह निपटारा न हो जाए।

नया क़ानून: सड़क पर लगाया रेहड़ी, दर्ज हो गई एफआईआर

पारित तीन कानूनों में से एक भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के प्रावधानों के तहत सेंट्रल दिल्ली के कमला मार्किट थाने में नए कानून के हिसाब से सोमवार (1 जुलाई) को रेहड़ी-पटरी वाले के खिलाफ पहली एफआईआर दर्ज हुई है। यह मामला रात 1:30 बजे दर्ज किया गया।

यह एफआईआर मध्य दिल्ली के कमला मार्केट इलाके में एक सार्वजनिक रास्ते में बाधा डालने के आरोप में एक रेहड़ी-पटरी वाले के खिलाफ दर्ज की गई है। आरोप है कि पटना के मूल निवासी 23 वर्षीय पंकज कुमार को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास एक फुट ओवरब्रिज के नीचे एक ठेले पर पानी, बीड़ी और सिगरेट बेचते हुए पाया गया।

खबर के मुताबिक पुलिस ने रेहड़ी लगाकर बिक्री करने वाले शख्स से वहां से हटने को कहा, उसने अपनी मजबूरी बताई और वहां से चला गया। इसके बाद पुलिस ने उसका नाम-पता पूछकर नए कानून बीएनएस की धारा 285 के तहत एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। 

राहगीर नहीं बने गवाह; ई-प्रमाण ऐप गवाह!

एफआईआर में कहा गया है कि अधिकारी ने चार-पांच राहगीरों को भी गवाह बनने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। गश्ती अधिकारी ने जब्ती को रिकॉर्ड करने के लिए ई-प्रमाण ऐप का इस्तेमाल किया। दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा द्वारा संचालित यह ऐप आगे की जांच के लिए सीधे पुलिस रिकॉर्ड में सामग्री डाल देगा।

बीएनएस की धारा 285; आमजन के लिए एक खतरनाक प्रवधान

देर रात रेहड़ी लगाकर पेट पालने वाले पंकज पर एफआईआर बीएनएस की धारा 285 के तहत दर्ज की गई थी, वह आम लोगों के लिए बेहद खतरनाक स्थिति का संकेत मात्र है।

धारा 285 के तहत “जो कोई भी, किसी भी कार्य को करने या अपने कब्जे में या अपने प्रभार में किसी भी संपत्ति को व्यवस्थित करने में चूक करके, किसी भी सार्वजनिक मार्ग या सार्वजनिक परिवहन लाइन में किसी भी व्यक्ति को खतरा, बाधा या चोट पहुंचाता है, उसे 5,000 रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”

पंकज का मामला तो महज बानगी है। तय है कि लागू होने के साथ इन कानूनों का खूनी चेहरा उजागर होता जाएगा। हालांकि अभी तमाम कानूनविद इसके अध्ययन में जुटे हैं। तीनों नए कानूनों के पूरे अध्ययन के बाद और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता है। फिर भी कुछ तथ्यों पर गौर करें-

★ पुराने कानून की धाराओं को नए कानून में उलट-पलट दिया गया है, जो एक रूप में तो पुराने का नया रूप है। इससे वकीलों तक के लिए जटिलता बढ़ी है, वहीं पुलिस के हाथ ज्यादा मजबूत हुए हैं।

★ यह घोषित ‘उपनिवेशवाद-विमुक्ति’ से बहुत दूर है क्योंकि यह पुलिस को नागरिकों के अधिकारों को दबाने और औपनिवेशिक काल की तरह ‘पुलिस राज्य’ बनाने की शक्ति देता है।

★ यह पुलिस के अधिकारों को बढ़ाने व अभियुक्त के अधिकारों को कम करने वाली है। हिरासत में पुलिस की रिमांड जो पहले अधिकतम 15 दिनों की थी उसे 90 दिनों तक बढ़ा दिया गया है। यानी पुलिस किसी को भी पकड़ कर किश्तों में 90 दिन तक अपनी हिरासत में रख सकती है। इससे अभियुक्त की जमानत अब अधिक कठिन हो जायेगी।

★ संज्ञेय अपराध (तीन से सात साल की सजा) में एफआईआर दर्ज करने के लिए प्राथमिक जांच का हथौड़ा पुलिस को थमा दिया गया है और 15 दिनों तक यह दर्ज नहीं हो सकती है। पुलिस द्वारा जिस पर मामला दर्ज हो रहा है वह मजिस्ट्रेट के पास नहीं जा सकता।

★ राजद्रोह अधिनियम (124-ए) को खत्म करने के दावे के बीच इसको और व्यापक बनाकर नए कानून में अधिक दमनकारी धाराएं जोड़ दी गई हैं, जो भारत की संप्रभुता, एकता, अखंडता, आर्थिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है। अब आजीवन क़ैद या 7 वर्ष कैद या जुर्माना लगेगा।

★ सत्ता की मनमर्जी से मामूली हिंसा पर भी यूएपीए थोपा जा सकता है। उच्च अधिकारी द्वारा जांच की जगह अब स्थानीय जांच अधिकारी (एसएचओ) को पूरी निरंकुश शक्ति मिल गई है। इसमें सरकार से भी इजाजत की जरूरत नहीं है।

★ आतंकवाद के दायरे को काफी व्यापक बना दिया गया है। कथित रूप से सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान को आतंक की श्रेणी में ले लिया गया है। अब कोई लेखक, भाषण देने वाला, कोई वीडियो, कोई सोशल मीडिया पोस्ट ही व्यक्ति पर आतंकवाद संदर्भी धारा चलाने के लिए काफी हो सकता है।

★ संगठित अपराध की एक नई धारा इसमें जोड़ी गयी है। इसके एजेण्डे पर व्यक्तियों के संगठित समूह की कार्यवाहियां भी अपराधिक श्रेणी में आ सकती हैं। इसके तहत एनजीओ, संगठन, समिति आदि की गतिविधियों को भी अपराध घोषित करने में मददगार होंगी।

★ नए कानून में ऐसी जमानत का प्रावधान समाप्त कर दिया गया है जिसमें उस आरोपी के लिए जमानत का प्रावधान था जिसने अपराध के लिए तय सजा की आधी अवधि हिरासत में बिता ली हो।

★ यह बाध्यकारी कर दिया गया है कि गिरफ्तार आरोपी का नाम, पता और अपराध की प्रकृति का हर पुलिस स्टेशन और जिला मुख्यालय पर भौतिक एवं डिजिटल प्रदर्शन प्रमुख रूप से किया जाये। यह प्रवाधान निजता के अधिकार और किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा के हनन के अलावा बिना औपचारिक दोषसिद्धि के ही व्यक्तियों को पुलिस द्वारा निशाना बनाए जाने को सुगम करता है।

★ नए कानून कई अपराधों में पुलिस को आरोपियों को हथकड़ी में बांधने की छूट देती है।

★ यह इलेक्ट्रोनिक रिकार्ड को साक्ष्य के बतौर मान्यता देता है। लेकिन जांच के दौरान रिकार्ड से छेड़छाड़ रोकने के कोई प्रावधान नहीं करता है। यानी पुलिस अब किसी आडियो-वीडियो को बतौर सबूत पेश कर सकती है।

यह नए तीन आपराधिक कानूनों की बानगी मात्र है। अभी इन्हें और गहराई से देखने की जरूरत है। लेकिन यह तय है कि जनता को लंबे संघर्षों के दौरान पहले से ही मिले सीमित जनवादी अधिकार, जो समय-समय पर और सीमित होते रहे हैं, अब बेहद संकुचित हो जाएंगे। देश की आम मेहनतकश जनता के लिए दुख-तकलीफ का नया दौर शुरू होगा।

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