अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस पर: आज का मज़दूर आंदोलन और मई दिवस

मई दिवस के नायकों ने अपने दौर के हिसाब से संघर्ष के रास्ते निकाले थे, आज के मज़दूर आन्दोलन को इस दौर की चुनौतियों के हिसाब से नयी राह बनानी होगी, संघर्ष के नये रास्ते पर आगे बढ़ना होगा!

मई दिवस मज़दूर आंदोलन की वो विरासत है जो मज़दूरों के संघर्ष का इतिहास बताता है, नये संघर्ष की प्रेरणा देता है। 1886 में अमेरिका के शिकागो शहर में मज़दूरों ने जो लड़ाई लड़ी वो किसी खास प्लांट या मज़दूरों के किसी खास हिस्से की माँग को लेकर नहीं अपितु मज़दूर वर्ग के लिए थी।

आठ घंटे काम की माँग मई दिवस के संघर्षों से उभरकर सामने आयी थी और आज 138 सालों बाद ये अधिकार मौजूदा दौर के मज़दूरों से पूँजीपतियों ने छीन लिया है।

4 मई 1886 यानी मई दिवस की घटना के पीछे सतत संघर्ष मौजूद था जिसने मालिकों और उनकी दलाल सरकारों के तमाम षडयंत्र और दमन शोषण का मुँह तोड़ जवाब देते हुए हार मानने से लगातार इंकार किया था।

मई दिवस तथाकथित न्यायपालिका का मजदूर विरोधी चरित्र भी उजागर करता है। आठ घण्टे काम की माँग करने पर मई दिवस के शहीदों को जिस प्रकार पूँजीपतियों के षड़यंत्र के मुताबिक अदालत ने फांसी की सजा सुनाई आज ठीक उसी प्रकार हक़ के लिए संघर्षरत मारुति, प्रिकॉल, गर्जियानों के मज़दूर अन्यायपूर्ण उम्र क़ैद झेल रहे हैं।

एक बार फिर मालिकों ने मज़दूरों को डराने के लिए अदालत का इस्तेमाल करते हुए ये बताना चाहा कि अगर मज़दूर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने आगे आएंगे तो फाँसी और उम्रकैद के जरिए उन्हें और उनके आंदोलन को कुचल दिया जाएगा।

यह जटिल दौर है

आज का मज़दूर मई दिवस के दौर से भी ज्यादा कठिन व जटिल दौर में है। वर्तमान भाजपा की निरंकुश सत्ता और पूँजीपतियों के नापाक गठबंधन पूरा मेहनतकश आवाम विकट हालात में है।

यह मार किन रूपों में है, आइए इसे देखते हैं।

बदलाव के नये रूप

तमाम उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए आज पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली में लगातार बदलाव हो रहा है। इसी के साथ शोषण की प्रक्रिया में अलग-अलग बदलाव हुए हैं। विश्व पूँजीवादी व्यवस्था ने जहाँ मुनाफे की रफ्तार तेज कर दी है, वहीं सामाजिक बंटवारे को भी तीखा कर दिया है। दूसरी तरफ राजकीय नियंत्रण को घटा कर निजीकरण को खुला रूप दे दिया है।

उदारीकरण के पिछले चौतीस साल में उत्पादन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ढांचागत बदलाव हुआ हैं। वे उच्च तकनीक से थोड़े से स्थाई और भारी पैमाने पर ठेका, ट्रेनी आधरित कम वेतन और कभी भी निकालने के अधिकार के साथ उत्पादन व भारी मुनाफा बटोरने में जुटे हैं। स्थाई की जगह फिक्स्ड टर्म नियुक्ति तो नीम ट्रेनी के बहाने फोक़ट के मज़दूरों की भर्ती। आज मज़दूर स्थाई-ठेका-ट्रेनी, मुख्य प्लाण्ट, वैण्डर, सब वैण्डर जैसे बहु संस्तरों में बंटा-बिखरा है।

अधिकारों को छीनने का दौर

मई दिवस की परम्परा में लम्बे संघर्षों के दौर में हासिल सीमित कानूनी अधिकारों को छीनने का यह दौर है। मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से ही इसे तेज कर दिया। एक-एक कर कानूनों को मालिकों के हित में बदलना उसका प्रमुख एजेण्डा है।

44 श्रम कानूनों को 4 संहिताओं में बदलना इस दिशा में मज़दूर आबादी के लिए उठे घातक क़दमों में सबसे महत्वपूर्ण है। जिसके मूल में है ‘हॉयर एण्ड फॅायर’, यानी जब चाहो काम पर रखो, जब चाहो निकाल दो। कम से कम वेतन पर ज्यादा से ज्यादा खटाओ।

नस्ल-धर्म आधरित बंटवारे तेज

आज पूरी दुनिया में मेहनतकश आवाम पर धर्म, नस्ल व जाति के आधार पर बंटवारे जुनूनी हद तक तेज हो गये हैं। पूरी दुनिया में नस्लवादी, फासीवादी मज़दूर विरोधी ताकतें जाति और धर्म की पहचान को उभारकर जनता को घृणा और उन्माद के जरिए लामबंद कर सत्ता में आ रही हैं।

देश के भीतर भाजपा-आरएसएस ने क़ौमी एकता को नष्ट कर नफरत की राजनीति को बेहद तीखा कर दिया है। जातीय व मज़हबी हमले और बंटवारे बेहद तीखे हो गये हैं। साथ ही, वाट्सऐप, फेसबुक जैसे सोसल मीडिया झूठ और भ्रम फैलाने के महत्वपूर्ण उपकरण बन गये हैं।

तात्कालिक के साथ दूरगामी संघर्ष का लक्ष्य ज़रूरी

इस कठिन दौर में मज़दूरों को स्थायी, कैजुअल, ठेका, ट्रेनी, या संगठित-असंगठित के बंटवारे की दीवार को तोड़कर व्यापक एकता बनानी होगी – जाति, धर्म, क्षेत्र की पहचान से परे समान काम-समान वेतन, सम्मानजनक वेतन व ठेका प्रथा के खात्मे जैसी तत्कालिक माँगों को लेकर ना सिर्फ प्लांट स्तर पर बल्कि इलाका स्तर पर एकजुट होकर संघर्ष करना होगा। श्रम क़ानूनों में मज़दूर विरोधी बदलावों के खिलाफ जुझारू संघर्ष खड़ा करने के लिए आगे आना होगा।

इन संघर्षो का नेतृत्व भी खुद मज़दूरों को करना होगा और जिस तरह संघर्ष आगे बढ़ेगा नेतृत्व करने वाले मज़दूर भी निकलकर आएंगे। लेकिन मौजूदा भ्रमपूर्ण स्थिति में मज़दूरों के सामने वैचारिक स्थिति भी साफ करना होगा।

मई दिवस की विरासत हमें बताती है कि जब तक उत्पादन और राज-काज पर मेहनतकश वर्ग का नियंत्रण नहीं होगा, तब तक मज़दूरों की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए मज़दूरों को अपने तात्कालिक माँगों के साथ अपनी मुक्ति के दीर्घकालिक मुद्दों पर भी सतत संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा।

नयी राह पर आगे बढ़ना होगा!

मई दिवस का रास्ता मजदूर वर्ग की मुक्ति की लड़ाई में ऐसा प्रेरणा स्रोत है जिसे हमें लगातार अपने सामने रखकर मजदूरों को संगठित करना होगा। आज वो दौर नहीं है कि लगातार बड़ी बड़ी हड़तालें हो रही हैं और मज़दूर खुद अपनी पहलकदमी से मालिकों को, उत्पादन को चुनौती दे रहा है। आज स्थिति ठीक विपरीत है।

वर्तमान हालात में मज़दूर आन्दोलन बिखरा हुआ है और लगातार पीछे जा रहा है। हालांकि बढ़ते शोषण के ख़िलाफ लगातार उठते स्वतःस्फूर्त आन्दोलन प्रतिरोध की स्थितियां भी बयां कर रहे हैं। जरूरत है वर्तमान चुनौतियों को समझकर एक वैचारिक दृष्टि के साथ इसे संगठित रूप देने की।

मई दिवस के नायकों ने अपने दौर के हिसाब से संघर्ष के रास्ते निकाले थे, आज के मज़दूर आन्दोलन को इस दौर की चुनौतियों के हिसाब से नयी राह बनानी होगी, संघर्ष के नये रास्ते पर आगे बढ़ना होगा!

मई दिवस का यही सबक है!

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