जनता मर रही है, लेकिन मोदी कैबिनेट की बैठक बैंक बेचने के लिए हुई

कैबिनेट ने कर दी आईडीबीआई के डिसइन्वेस्टमेंट की घोषणा

देश की जनता कोरोना, अस्पतालों की दुर्व्यवस्था, ऑक्सीजन की कमी से मर रही है और मोदी सरकार चुनावी उत्सव के बाद देश बेचो अभियान में जुट गई। पीएम मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने आईडीबीआई बैंक लिमिटेड में रणनीतिक विनिवेश को मंजूरी दे दी है। ये मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब करीब 5 साल बाद बैंक को मुनाफा हुआ है। ….क्या चल रहा है खेल, बता रहे हैं वरिष्ठ विश्लेषक गिरीश मालवीय….

कल शाम आईडीबीआई बैंक को बेचने पर मुहर लगा दी गयी। आईडीबीआई एक सरकारी बैंक था, जो 1964 में देश में बना था। …शेयर बाजार के मित्र बता रहे हैं कि जमकर इनसाइडर ट्रेडिंग हुई है। …कुछ लोगो को पहले से मालूम था कि आज आईडीबीआई के डिसइन्वेस्टमेंट की घोषणा होने वाली है। .…कल प्रधानमंत्री ने केबिनेट की बैठक की तो लगा कोरोना काल में जनता को राहत देने वाला कोई फैसला होगा तब ऐसा फैसला लिया है…।

एक बात बताइये, ये फैसला आपने दो साल पहले क्यों नही लिया? …जब आपने एलआईसी के सर पे बंदूक रख कर उससे 21000 करोड़ रुपये का निवेश करवाया था और उसे जबर्दस्ती 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने को मजबूर किया था? …तब ही बेच देते! …लेकिन तब कैसे बेचते? क्योंकि तब तो आईडीबीआई बैंक एनपीए के मामले में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला बैंक बन गया था।

उस वक्त आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 27.95% तक पहुंच गया था। जिसका मतलब है कि बैंक द्वारा लोन किए गए प्रत्येक 100 रुपये में से 28 रुपये एनपीए में बदल गया। ….तब आपने एलआईसी को आगे कर दिया कि इसे बचाओ नही तो बैंक डूबने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। …उसे लगातार चार सालों से घाटा हो रहा था और इस साल उसे सालो बाद फायदा होना शुरू हुआ तो झट से उसे बीच चौराहे पर बोली लगाने की वस्तु बना दिया गया।

एलआईसी से आईडीबीआई में हिस्सेदारी खरीदवाने के लिए भी खूब खेल खेले गए। दरअसल एलआईसी उस वक्त आईडीबीआई के शेयर नहीं खरीद सकती। उस पर किसी एक कंपनी में अधिकतम 15 फीसदी शेयर खरीदने की शर्त लागू थी और एलआईसी के पास आईडीबीआई के 10.82 प्रतिशत हिस्सेदारी पहले से ही थी। लेकिन सारे नियम बदल दिए गए। उसकी भागीदारी 51 प्रतिशत करवा दी गयी और उस से 21 हजार करोड़ डालने का दबाव बनाया गया।

ये पैसा आप और हम ही मिलकर के भरते हैं जब हम पॉलिसी का प्रीमियम चुकाते है। एलआईसी पॉलिसीधारकों के पैसे से ही खड़ा हुआ है और उस पैसे की सुरक्षा उसका प्राथमिक दायित्व हैं, तो एक डूबते हुए बैंक में नियंत्रण  की हिस्सेदारी खरीदना एक समझदारी भरा निर्णय नहीं हो सकता था। लेकिन उस वक़्त भी घाटे के सौदे मे हमारे खून पसीने की बचत को होम किया गया।

एलआईसी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में पहले से ही एक बड़ा निवेशक रहा है और भारत के 21 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से 16 में 9% से अधिक हिस्सेदारी रखता है। तो उसके बावजूद उसे सर्वाधिक एनपीए वाले बैंक में इतनी बड़ी हिस्सेदारी के लिए मजबूर किया गया?

जब एलआईसी के बड़ी हिस्सेदारी खरीदने पर सेबी के पूर्व चेयरमैन एम दामोदरन से पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि, इससे ना तो एलआईसी को फायदा होगा ना आईडीबीआई बैंक को। …आज उनकी बात सच निकली। पता नही लोग अब भी क्यो नही समझ पा रहे हैं…।

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