देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फांसी की : भगतसिंह के जन्मदिन पर कविताएं !

भगतसिंह / नागार्जुन

अच्छा किया तुमने
भगतसिंह,
गुजर गये तुम्हारी शहादत के
वर्ष पचास
मगर बहुजन समाज की
अब तक पूरी हुई न आस
तुमने कितना भला चाहा था
तुमने किनका संग-साथ निबाहा था
क्या वे यही लोग थे—
गद्दार, जनद्वेषी अहसान फरामोश ?
हकूमत की पीनक में बदहोश ?
क्या वे यही लोग थे,
तुमने इन्हीं का भला चाहा था ?
भगतसिंह,
तुम्हारी वे कामरेड क्या लुच्चे थे, लवार थे ?
इन्हीं की तरह क्या वे आप पब्लिक की गर्दन पे सवार थे ?
अपनी कुर्सी बचाने की खातिर
अपनी जान माल की हिफाजत में
क्या तुम्हारे कामरेड
इन्हीं की तरह
कातिलों से समझौता करते ?
क्या वे इन्हीं की तरह
अपना थूक चाट-चाट कर मरते ?
हमने तुम्हारी वर्षगाँठ को भी
धंधा बना लिया है, भगतसिंह
हमने तुम्हारी प्रतिमा को भी
कुर्बानी का प्रमाण पत्र थामे रहने के लिए
भली भाँति मना लिया है !

भगतसिंह, दर-असल, हम बड़े पाजी हैं
तुम्हरी यादों के एक-एक निशान
हम तानाशाहों के हाथ बेचने को राजी हैं
दस-पाँच ही बुजुर्ग शेष बचे हैं
वे तुम्हारे नाम का कीर्तन करते हुए
यहाँ वहाँ दिखाई दे जाते हैं
वे उनके साथ शहीद स्मारक
समारोहों के अगल-बगल मंचस्थ
होते हैं उन्हीं के साथ
जिनकी जेलों के अन्दर हजार-हजार
तरुण विप्लवी नरक यातना भोग रहे हैं
और वे उनके साथ भी
शहीद-स्मारक-समारोहें में अगल-बगल
मंचस्थ होते हैं
जिनकी फैक्टरियों के अन्दर-बाहर
श्रमिकों का निरंतर बध होता है
भगतसिंह, क्या वे सचमुच तुम्हारे साथी थे ?
नहीं, नहीं, प्यारे भगतसिंह, यह झूठ है !
ऐसा हो ही नहीं सकता
कि तुम्हारा कोई साथी इन
मिनिस्टरों से, इन धनकुबेरों से
हाथ मिलाये !
दरअसल वे कोई और लोग हैं
उनरी जर्जर काया के अन्दर
निश्चय ही देश-द्रोही-जनद्रोही
दुष्टात्मा प्रवेश कर गयी है
भगतसिंह, अच्छा हुआ तुम न रहे !
अच्छा हुआ, फाँसी के फन्दे पर झूल गये तुम ?
ठीक वक्त पर शहीद हो गये,
अच्छा किया तुमने
बहोऽऽत अच्छा ! बहोऽऽत अच्छा ! !


भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की/ शंकर शैलेन्‍द्र

भगतसिंह, इस बार न लेना काया भारतवासी की,
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!

यदि जनता की बात करोगे, तुम गद्दार कहाओगे
बम्ब-सम्ब की छोड़ो, भाषण दिया तो पकडे जाओगे
निकला है क़ानून नया, चुटकी बजाते बांध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे मुक्ति पाओगे

कांग्रेस का हुक्म, जरूरत क्या वारंट तलाशी की!
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!

मत समझो पूजे जाओगे, क्योंकि लड़े थे दुश्मन से
रुत ऐसी है, अब दिल्ली की आँख लड़ी है लन्दन से
कामनवेल्थ कुटुंब देश को, खींच रहा है मंतर से
प्रेम विभोर हुए नेतागण, रस बरसा है अम्बर से

योगी हुए वियोगी, दुनिया बदल गयी बनवासी की!
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!

गढ़वाली, जिसने अंगरेजी शासन में विद्रोह किया
वीर क्रान्ति के दूत, जिन्होंने नहीं जान का मोह किया
अब भी जेलों में सड़ते हैं, न्यू माडल आज़ादी है
बैठ गए हैं काले, पर गोरे जुल्मों की गादी है

वही रीत है, वही नीत है, गोरे सत्यानाशी की!
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!

सत्य-अहिंसा का शासन है, रामराज्य फिर आया है
भेड़-भेड़िये एक घाट हैं, सब ईश्वर की माया है
दुश्मन ही जज अपना, टीपू जैसों का क्या करना है
शान्ति-सुरक्षा की खातिर, हर हिम्मतवर से डरना है

पहनेगी हथकड़ी, भवानी रानी लक्ष्मी झांसी की!
देशभक्ति के लिए आज भी, सज़ा मिलेगी फांसी की!



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