इस सप्ताह की कविताएं : मशाल उठाने पड़ते हैं !

नचिकेता / महेश पुनेठा

मैं सात-समुद्र पार की
बात नहीं कर रहा हूँ

एक तरफ थे-
हाथी-घोड़े
स्वर्ण मुद्राएं
सौ साल की उम्र
सुंदरियां
पृथ्वी पर राज
दूसरी तरफ थे-
प्रश्नों के उत्तर ।

नचिकेता!
तुमने चाहे
प्रश्नों के उत्तर
इसलिये तुम
हजारों साल बाद भी
जिन्दा हो
जब तक प्रश्न रहेंगे
तब तक तुम भी रहोगे।


मश्आल उठाने पड़ते हैं / आदित्य कमल

अन्धकार गहराये, तो मश्आल उठाने पड़ते हैं
दीये जलाने पड़ते हैं, अलाव बचाने पड़ते हैं।

ज़ुल्म-दमन बढ़ता जाए तो जुटते हैं प्रतिरोध के स्वर
कूड़ा-करकट जमा हुए तो यार, जलाने पड़ते हैं।

बहरों का शासन गर अपनी छाती तक चढ़ आता है
हंगामा करना पड़ता है, शोर मचाने पड़ते हैं।

घर में दुबके रहना भी जब नहीं सुरक्षित रह जाए
घर-बाहर के मुद्दे सब, सड़कों पे लाने पड़ते हैं।

खून का चस्का लिए भेड़िए खुलेआम गुर्राते हों
जत्थों में जुट करके तब, हाके भी लगाने पड़ते हैं।

आग लगाकर बस्ती में जब नीरो बंसी छेड़ता है
जलते लोगों को विद्रोही गाने, गाने पड़ते हैं।

रोज़ ही जगती है दुनिया कुछ नई-नई करवट लेती
रोज़ नया अंकुर उगता, कुछ रस्म पुराने पड़ते हैं।

ऐसे ही जब उथल-पुथल कर आता है बदलाव का मोड़
तख़्त गिराने पड़ते हैं, इतिहास बनाने पड़ते हैं।


नताशा / संदीप कुमार

मैं कभी माफ नहीं करूंगा
तुम्हारे पिता को
जो मेरे अजीज दोस्त भी हैं
कि उन्होंने क्यों तुम्हें
बराबरी का पाठ पढ़ाया?
तुम्हें क्यों बताया?
कि सच और न्याय के लिए
जान की बाजी लगा देना
इंसानियत का धर्म है।

मैं जरूर लडूंगा
साथी महावीर से
तुम्हें पितृसत्ता से मुक्त कर
क्यों पिंजरा तोड़ तक पहुंचने का रास्ता दिखाया?

तमाम गुस्से और झगडों के बाद
मैं अपने अजीज साथी को
गले से लगाकर पूछूंगा
तुममें इतना साहस कहां से आया कि
सच और न्याय के रास्तों की
तमाम कठिनाइयों को जानते हुए भी
अपने जिगर के टुकड़े को
इस तरह फौलाद कैसे बनाया?

यह सवाल पूछना
इसलिये भी लाजमी है
मेरी बहन नताशा
कि मैंने बड़े बड़े कामरेडों को
अपने बच्चों को
संघर्षों की अपेक्षा
नौकरियों की सलाह देते देखा है।



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