इस सप्ताह : औरंगाबाद रेल हादसे पर कविताएं !

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हत्यारे अनुपस्थित हैं / रवि प्रकाश

हत्यारे अनुपस्थित हैं
इसलिए आप इसे हत्या न कहें
रोटियां उपस्थित हैं
इसलिए आप इन्हें भूखा भी न कहें
जिसे आप हत्या कह रहे हैं, हत्यारे वहां अनुपस्थित हैं
जिसे आप भूख कह रहे हैं
रोटियां वहाँ उपस्थित हैं
इसलिए यह हत्या नहीं
महज एक दुर्घटना है
आप इसे एक चेतावनी समझिये
कि बगैर हत्यारों के भी
उपस्थित हो सकती हैं हत्याएं…!!


हत्यारे / हूबनाथ

उन्हें पता था कि
सड़कों पर गाड़ियां
पटरियों पर रेलें
अब नहीं चल रहीं
उन्हें आदत थी
नंगी ज़मीन पर सोने की
सूखी रोटियां और प्याज
सिरहाने रखकर वे सो गए थे
रेल की पटरियों पर
पूरे देश की तरह
उन्हें भी नहीं था
दिशा का ज्ञान
भटकने के डर से
उन्होंने भी पकड़ी थी
पटरियां रेल की
लोहे रास्ता नहीं बदलते
वे सोए थे अपनी मर्जी से
पर वहां तक पहुंचे थे
किसी और के इशारे से
कोई तो था
जिसके जादू से खिंचे
वे लेट गए थे
रेल की पटरियों पर
इस यकीन से
कि इन पटरियों पर
अब नहीं दौड़ेंगी रेलें
रेल पटरियों पर होती
गाड़ियां सड़कों पर
या कोई एक हाथ
इनके सूखे हुए सिर पर
दो बूंद इनकी आंखों में
या नहीं मिला होता
देश-निकाला
नहीं मरी होती आस्था
बचा होता विश्वास
नहीं उखड़ी होती जड़
डाल टूटी न होती
नदी सूखी न होती
घर ढहा न होता
तो राह ज़िंदगी की
मुश्किल से मुश्किल
वे कभी न छोड़ते
सपने में भी न पकड़ते
लोहे की पटरियां
सोते तो बिल्कुल नहीं
काट चुके थे अनगिनत रातें
कड़ुवाई आंखों भूखे पेट
सूरज के साथ चलते
थके ज़रूर थे टूटे नहीं
कितनी उम्मीद से
पटरी के तकिए पर
हारा हुआ सिर रखे
जब फैलाए थे पैर
पटरी के पार निकल गए थे
एक फुट चौड़े
सिमेंट की जिस सतह पर
वे लेटे थे
उसे स्लीपर कहते हैं
यह उन्हें नहीं पता था
उन्हें यह भी नहीं पता था
जिसे लोग समझेंगे
सिर्फ एक दुर्घटना
वह है निर्मम हत्या
और कहीं कोई पता नहीं
हत्यारे का


मजदूर की रोटियां! / दीपक डोभाल

गोल रोटियां जो छोड़ गए मजदूर
वो अब सवाल पूछेंगी
आसमान के उस राजा से
जिसके बाजू लोहे के हैं
जो चमकदार रोशनी में
सूरज के साए में रहता है
जो निहारता रहता है अपलक
ब्रह्ममांड के रोशनी से भरे
पिडों को
जिसे ऊंचाई से दुनिया
देखने की आदत है
ताकी वो अच्छी, सुंदर
और रंगों से भरी लगे

गोल रोटियां जो छोड़ गए मजदूर
वो अब सवाल पूछेंगी
लोहे की भुजाओं वाले राजा से
कि क्या होता है
मजदूर और लोहे की गंध का रिश्ता
क्यों मजदूर को लोहे पर सिर
रखते ही आ जाती है नींद
क्या होती थकान
मजबूरी
डर
भूख
और किस दशा में पेट बांधकर
मजदूर चल पड़ता है धरती नापने

गोल रोटियां पूछेंगी
राजा के पटु दरबारियों से
कि क्या होता है काली रात से भी
घनघोर सुबह का रंग
बताओ
रेलगाड़ी से कुचलती हुई खोपड़ी के भीतर
मजदूर का आखिरी सपना क्या था?

गोल रोटियां जो छोड़ गए मजदूर
वो अब चांद बन कर रोज उग आएंगी
आसमान में
और लंबे और उन्मत्त राजा से
पूछेंगी
कि मजदूरों के बदन के हिस्सों की तरह
क्यों चुनकर लाए गए प्रश्न
कौन उठाएगा पटरी पर छूट गए
महीन चीथड़ों की तरह
मजदूर के हिस्से के सवाल!


शिनाख़्त / आदित्य कमल

चार रोटियाँ
एक पॉलीथिन का थैला
थैले में पाँच कपड़े –
एक लुंगी , एक बरमुडा
एक गंजी , एक पैंट , एक कमीज़
सब मैले – कुचैले , मुचड़ी हाल में ।
पानी की एक पुरानी पिचकी बोतल
एक ब्रश , जिब्भी ,
साबुन का एक घिसा टुकड़ा
तम्बाकू की डिबिया
एक कंघी , एक जोड़ा हवाई चप्पल
और …..
मानव शरीर का एक क्षत-विक्षत लोथड़ा ।

सर , दर्ज कर लिया , आगे ?
शिनाख्त करनी है न ??
लोथड़े की तलाशी लें…?
……………………….
कुछ नहीं है , एक आधार है सर
घिस गया है , किसी काम का नहीं
एक बीस का नोट है
पाँच और दो का एक-एक सिक्का ।

रख ले ,और पोस्टमार्टम को भेज
ऊपर खबर करता हूँ ।

सर , सर …सर !
जय हिन्द सर …सर !!
पागल हैं , किसी की नहीं सुन रहे
तांता लगा है सर , लाखों हैं
चले ही आ रहे हैं, चले ही जा रहे हैं
एक लाश है सर , रेलवे किनारे
मराही मोड़ पर …..नहीं सर…
कोई नाम , पता , ठिकाना नहीं
गाँव , जिला , मुलुक … कुछ नहीं सर
लावारिश ।
भेज दें सर ? … लोथड़ा है सर,लोथड़ा
…… सर , पलायन वाला ही लग रहा है सर
हाँ , हाँ सर , मज़दूर ही लग रहा है ।
ओके सर , जय हिन्द सर , जय हिन्द ।

नगरपालिका की गाड़ी बुला रे !!


वह मज़दूर था / लाल प्रकाश राही

पेट की भूख रोटी का व्यास
खीच ले गया उसे परदेश
वह मजदूर था।

देश का भाग्य विधाता थोड़े था।
कभी फुटपाथ तो कभी
गंदे नाले के किनारे बसी गंदी झुग्गियां
यही थे उसके लिए रात के ठांव
दिन में लोहा गलाने की भठ्ठियों में
गलाया उसने अपना हांड मास
तब जाकर बनी कही रेल की पटरियाँ
पर उसे क्या पता था? कि उसी रेल की पटरियों पर भूख की परिधि को भरने के लिए रोटी के व्यास की तलाश में
वहीं पटरियाँ उसे सदा के लिये निगल जायेगी
वह मजदूर था।

उसे फिक्र थी अपने बच्चों की माँ बाप की
उसे फिक्र थी
अपने पड़ोसियों की देश, समाज की,
पेट की भूख रोटी का व्यास
खीच ले गया उसे परदेश
वह मजदूर था।

उसने खड़ी की अपने खून पसीने के गारे से
गगन चुंबी इमारतें आलीशान महल
उसने सजाये जगमगाती लाइटों से बड़े – बड़े शहर
फिर भी वह तमाम उम्र सोता रहा अँधेरी झोपड़ियों में
क्योंकि वह मजदूर था?
देश का भाग्य विधाता थोड़े था।

उसने बिछाये सड़कों पर गर्म पिघला हुआ डामर
उन सड़कों पर दौड़ने के लिए बनाये
चमचमाती कारें बड़ी – बड़ी लारियाँ
फिर भी सैकड़ों मील पैदल चलने की
विवसता है क्योंकि?
वह मजदूर था
देश का भाग्य विधाता थोड़े था।


रोटी की रेलगाड़ी / चन्द्र

इस सदी में यह सरकार की सबसे बड़ी कमज़ोरी है
यह एक खतरनाक हिंसा खोरी है
और ऐसी महाक्रूर महामारी
दिहाड़ीदारों के लिए
सबसे अधिक हत्यारिन है।

पैदल चल-चल के हार-थक जाना
पाँवों के फटी बिवाईयों में से खून का बह जाना
एक अजीब आह-उफ से भर जाना
और जब चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा मिले
घने-जंगल,काँट-फूस
तो कहीं चुपचाप
प्यार के नंगी पटरियों पर घास की तरह लेट जाना
स्वभाविक है।

लेकिन यह रेलगाड़ी मज़दूरों की
देश-परदेश,राजधानी की सारी कंपनियाँ मज़दूरों की
यह खेत,खदान,कारखाने सब के सब की हिसाब-किताब मज़दूरों की
यहाँ तक कि रेल के इंजन में ईंधन बन गए खून-पसीने का समुंदर सब मज़दूरों की

इस पृथ्वी पर अंतहीन पसरी हुई रेल की पटरियाँ
यह पत्थर की बिछी हुई सीमाहीन गिट्टियाँ
सब मज़दूरों की हड्डियों से निर्मित है!

इसलिए
सरकारों!अब सावधान!
मनुष्य की तरह मज़दूर अभी काम पर हैं
और इन कुचली हुई रोटियों की कसम
अब हम कोई मरसिए न लिख कर
श्रम की महान वीरगाथा लिखेंगे
बहुत हद तक लड़ेंगे
बहुत दूर तक चीखेंगे
और भविष्य में हम एक ऐसी रोटी की रेलगाड़ी बनाएँगे
जिसमें एक ऐसे अदृश्य इंजन लगाएँगे
कि जिसमें सदियों से कत्ल हुए श्रम,शोषण और मौतों का उफनता हुआ दरिया सब सोख लेंगे

सावधान!
अब आपको इन रोटी के रेलगाड़ी के बोगियों में बिठा कर
बिना टिकट के चेकिंग के

सीधे ब्रह्मपुत्र के पुल पर से कहीं
बर्फ के निचाट मैदान में फेंक देंगे

हमेशा-हमेशा के लिए!


रोटी / महेन्द्र ‘आज़ाद’

हो सकता है
किताबों में पढ़ा हो
बेहतर अवसर की तलाश में निकलना पलायन है।

हो सकता है
किसी सेमीनार में वक्ता ने
अपनी कीमियागिरी दिखाते हुए
कहा होगा
सभ्यताओं के विकास में पलायन का अहम योगदान है।

हो सकता है
किसी अख़बार के पन्ने पर पढ़ा हो
बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए
लोग पलायन कर गए हैं।

हो सकता है
टेलीविजन के पर्दे पर
भेदभाव के चलते
असुरक्षित स्थान को छोड़ते हुए लोग दीखे हो।

पर रोटी
पलायन का पुख्ता प्रमाण है
ये ही है ‘पुश’ और ‘पुल्ल’ कारक
रोटी ही है वो चुम्बक
जो खींच ले जाती शहर की ओर
और धक्का मार पहुंचा देती
एक शहर से दूसरे शहर।

और एक दिन छूट जाती
अधूरे सफर में
फिर अवसर आकाश हो जाते
सभ्यता असभ्य ही रह जाती।