ऑटो उद्योग के अस्थायी मज़दूर : रोज़गार के नाम पर जवानी की लूट

Theka_mazdoor

आज उद्योगों में ठेका, कैजुअल, ट्रेनी, अपरेंटिस, नीम ट्रेनी, एफटीई (नियत अवधी के मज़दूर) आदि अस्थाई मज़दूरों की विभिन्न श्रेणियाँ हैं। अधिकार विहीन ये मज़दूर समाज का सबसे संकटग्रस्त हिस्सा है।

  • खुशीराम

रोज़गार की उम्मीद में भारत के नौजवानों की नज़र खींचने वाले सभी क्षेत्रों में से ऑटोमोबाइल उद्योग प्रमुख पंक्तियों में आता है। भारत ऑटोमोबाइल उत्पादन में दुनिया में 7 वें स्थान पर है। इस क्षेत्र में न केवल निर्यात के लिए गाड़ियाँ तैयार होती हैं बल्कि बड़ी मात्रा में विदेशी पूँजी भी निवेश की गयी है।

लेकिन अरबों में मुनाफ़ा कमाने वाले इस उद्योग में मज़दूरों का शोषण भी उतना ही तीव्र है। आज इस शोषण का सबसे बड़ा जरिया अस्थायी नौकरियां हैं जो मज़दूरों से पूरा काम ले कर भी उन्हें कोई भी अधिकार पाने में असमर्थ रखती है।  

मज़दूरों के संगठित संघर्ष को तोड़ने के लिए आज प्रबंधन ने मज़दूरों को विभिन्न श्रेणियों में बाँट दिया है। स्थायी और अस्थाई के विभिजन के बाद, अथाई मज़दूरों में भी कई विभाजन बना दिए हैं। इनमें से कुछ श्रमिक ठेकेदार के तहत काम करते हैं, कुछ कम्पनी कैजुअल हैं, कुछ कम्पनी ट्रेनी हैं, कुछ अपरेंटिस तो कुछ एफटीई यानी निश्चित अवधी पर रखे गए मज़दूर हैं।

एक ही क्षेत्र में विभिन्न कंपनियां अलग अलग श्रेणी में मज़दूरों को भर्ती करती हैं। इस तरह मौजूदा ठेका मज़दूर (संचालन एवं उन्मूलन) कानून 1970 के प्रावधानों से वह मज़दूरों के बड़े हिस्से को बाहर कर लेते हैं, जिससे कंपनी पर मज़दूरों के रोज़गार की सुरक्षा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं आती है।

मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से रोज़गार के निर्माण में अभूतपूर्व घोटाला कर रोज़गार की सुरक्षा को ख़तम करने में अपना पूरा योगदान दिया है। कौशल विकास के तहत अब कम्पनियों में स्टूडेंट ट्रेनी की श्रेणी में आने वाले मज़दूर भी पाए जाते हैं। कमाने और नौकरी ढूँढने के दबाव में रहने वाले गरीब मज़दूर किसान परिवारों के लड़के लड़कियों को 10वीं व 12वीं कक्षा के बाद कौशल विकास के नाम पर कंपनियों में भर्ती कर लिया जाता है।

उन्हें सीधा उत्पादन प्रक्रिया में डाल दिया जाता है जहाँ वह अपने पूरे कार्यकाल में एक ही काम में लगे रहते हैं और उत्पादन प्रक्रिया की भी पूरी जानकारी नहीं पाते। कौशल विकास के नाम पर उनकी सप्ताह में 1 दिन छुट्टी के बाद क्लास लगती है जहाँ भी कुछ खास नहीं सिखाया जाता। पूरा-पूरा काम देने के बावजूद उन्हें न तो न्यूनतम मज़दूरी मिलती है न ही ईएसआई-पीएफ जैसी सुविधाएं। उल्टा कंपनी को सरकार द्वारा प्रति मज़दूर 70% न्यूनतम मज़दूरी का खर्च मिलता है।

तीन साल एक ही कंपनी में उत्पादन देने के बाद उसे मात्र एक सर्टिफिकेट दे कर बाहर कर दिया जाता है। कुछ कम्पनियों में परीक्षा, इंटरव्यू आदि के बाद इनमें से एक बहुत छोटी संख्या को ट्रेनी रखा जाता है। संख्या का अंदाजा पाने के लिए मारुती मानेसर का उदाहरण देख सकते हैं जहाँ 6000 में से मात्र 27 स्टूडेंट ट्रेनी को ट्रेनी रूप के में लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में मज़दूरों को मिलने वाले मात्र एक सर्टिफिकेट के आधार पर उसे और कहीं रोज़गार नहीं मिल सकता।

इनमें से कई वर्कर अन्य कुछ साल अपरेंटिस, या कम्पनी कैजुअल या ठेकेदार के तहत कम्पनी में काम करने के बाद वापस अपने गाँव लौट कर वहीँ कुछ छोटा मोटा काम ढूँढने की कोशिश करते हैं।

अंततः 17-18 की उम्र से 24-25 की उम्र तक कंपनी में बेलगाम खून पसीना लगाने के बाद अपनी जिम्मेदारियां सँभालते मज़दूर युवा या युवती के पास न कौशल होता है, न कुछ पैसे होते हैं न ही कोई नौकरी। इस समय तक उनका अन्य कई सरकारी नौकरियों या सेना इत्यादि में लगने का समय भी ख़तम हो चुका होता है।

सरकार द्वारा दी गयी “नयी नौकरियों” के आकड़ों से छिपाई जा रही यह व्यापक बेरोजगारों की फ़ौज आज हमारे समाज का सबसे संकटग्रस्त हिस्सा है।

संघर्षरत मेहनतकश’ अंक-46 (जनवरी-मार्च, 2022) में प्रकाशित