सूडान : सैन्य तख़्तापलट के ख़िलाफ़ भारी दमन के बीच आन्दोलन तेज

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बड़े स्तर के प्रदर्शन, रैलियां और शासन द्वारा बैरिकेडिंग करने की घटनाएं सूडान के अलग-अलग राज्यों के 17 शहरों में दर्ज की गई हैं। उधर लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों की सुरक्षाबलों द्वारा हत्याएं भी जारी हैं।

उत्तर अफ्रीका के देश सूडान में 25 अक्टूबर 2021 को हुई सैन्य तख़्तापलट के बाद से 18वीं बार बड़े स्तर के विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस बीच 14 फरवरी को सूडान में सुरक्षाबलों ने दो और लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनकारियों की हत्या कर दी।

सीसीएसडी (सेंट्रल कमेटी ऑफ़ सूडानीज़ डॉक्टर्स) ने बताया कि तख़्ता पलट के विरोध में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़कर अब 81 हो चुकी है। कमेटी ने कुल 172 घायलों को दर्ज किया है, जिनमें 20 बंदूक की गोली और 14 रबर की गोलियों के जख़्म हैं।

वहीं 31 अन्य हो सिर में चोट आई है। यह चोट अवैधानिक ढंग से सुरक्षाबलों द्वारा सीधे प्रदर्शनकारियों के शरीर पर आंसू गैस के गोले गिराने आई हैं। कम से कम 10 लोगों का गैस के चलते गम घुटा है।

आंसू गैस के गोलों के सीधे लगने और इस गैस से दम घुटना ही, तख़्तापलट के बाद आईं कुल चोटों (2,400 से ज़्यादा) में से आधी (1024) से ज़्यादा इन्हीं से हैं। इसकी जानकारी ओमेगा रिसर्च फाउंडेशन द्वारा विश्लेषित एक रिपोर्ट से मिली है।

सुरक्षाबलों द्वारा पांच अन्य प्रदर्शनकारियों को गाड़ियों तले कुचल दिया गया। इनमें से एक को सिर में चोट आई थी, जिसके चलते उसे ब्रेन हेमरेज हो गया। 

ज़्यादातर चोटें खार्तूम राज्य में दर्ज की गई हैं। देश की राजधानी खार्तूम में अलग-अलग जगह से शुरू हुए प्रदर्शन, जो राष्ट्रपति भवन की तरफ जा रहे थे, उनके साथ बेइंतहां हिंसा की गई। राष्ट्रपति भवन में फिलहाल तख़्तापलट के नेता और सेना प्रमुख अब्दुल फतह अल-बुरहान का निवास है। पड़ोसी क्षेत्र खार्तूम उत्तर से भी लोग संसद की तरफ जाते प्रदर्शनकारियों के साथ आए। 

ईस्ट खार्तूम क्षेत्र प्रतिरोध समिति (आरसीएस) समन्वय द्वारा जारी एक वक्तव्य के मुताबिक़, “सुरक्षाबलों और तख्तापलट में शामिल रही एजेंसियों के भारी दमन के बावजूद, ओमडरमान में शांति के साथ जुलूस संसद की तरफ जा रहा था, लेकिन वहां गोली लगने के चलते क्रांतिकारी मुंथर अब्दुल रहीम शहीद हो गए और कई अन्य घायल हो गए।” 

5200 से ज़्यादा ऐसी प्रतिरोध समितियां पूरे देश में आयोजित की गईं, जो लोकतांत्रिक नागरिक शासन पाने के लिए सैन्य शासन का विरोध कर रही हैं।

बड़े स्तर के प्रदर्शन, रैलियां और शासन द्वारा बैरिकेडिंग करने की घटनाएं सूडान के अलग-अलग राज्यों के 17 शहरों में दर्ज की गई हैं। इन शहरों में नील, ब्लू नील, जज़िराह, अल कादारिफ़, कसाला, सेन्नार, उत्तरी कोर्दोफन, दक्षिणी दार्फूर और अन्य शहर शामिल हैं।

इजिप्ट के ख़िलाफ़ प्रदर्शनकारियों की कार्रवाई

सूडान के उत्तरी राज्यों में प्रदर्शनकारियों ने पड़ोसी देश इजिप्ट में माल ले जाने वाले ट्रकों की बैरिकेडिंग कर दी। दरअसल इजिप्ट की सरकार सूडान की सैन्य सरकार का समर्थन कर रही है।

अल हफ़ीर में लगाए गए प्रतिबंधों को सोमवार को फिर से लागू कर दिया गया। बता दें एक दिन पहले ही इन बैरिकेडों को सुरक्षाबलों ने हटाया था, जिसके बाद ऊंटों से भरे 40 ट्रक इजिप्ट की तरफ़ गए थे। इस कार्रवाई में 19 प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया था। यह जानकारी मुख्तर बैराम ने पीपल्स डिस्पैच को दी, जो राज्य की राजधानी डोंगोला की राजधानी में प्रतिरोध समिति के सदस्य हैं।

उन्होंने बताया कि दूसरे प्रदर्शनकारियों ने पुलिस स्टेशन को घेर लिया और रात तक सभी प्रदर्शनकारियों की रिहाई सुनिश्चित कराई, जिसके बाद सोमवार सुबह फिर से बैरिकेडिंग कर दी गई। अल हफीर के पूर्व में, नील नदी के पार अबरी में भी मजबूत बैरिकेडिंग की गई है।

आसपास के क्षेत्रों के लोगों ने सोर्तुद के बैरिकेड तक सोमवार को मार्च किया, ताकि आतेफ अली को श्रद्धांजलि दी जा सके। प्रतिरोधक समिति के सदस्य आतेफ अली की 11 फरवरी को मौत हो गई थी। उनकी मौत तब हुई थी, जब इजिप्ट के एक ट्रक ने बैरिकेडिंग से जबरदस्ती निकलते हुए उन्हें कुचल दिया था। 

दोनों देशों के बीच हो रहे व्यापार के विरोध के बारे में बैराम कहते हैं, “उत्तरी सूडान में लोग भूखे हैं। हम अपने जानवरों और फ़सलों को इजिप्ट निर्यात होते हुए देखते हैं, जबकि हम भुखमरी का शिकार हैं।”

आरोप है कि ज़्यादातर निर्यात सेना के स्वामित्व वाले उद्यमों द्वारा किया जा रहा है, जिनका अर्थव्यवस्था में प्रभुत्व किसानों और छोटे उत्पादकों को बाज़ार से बाहर कर रहा है। 

इस स्थिति के साथ इजिप्ट द्वारा तख़्ता पलट करने वाले जनरल को समर्थन देना, ब्लॉकेड की कार्रवाई की वज़ह बना। बता दें सेना के इस शासन को देश की खाद्य सुरक्षा के लिए ख़तरा माना जा रहा है।

बैराम ने कहा, “तो हम बैरिकेड लगाना जारी रखेंगे, तब तक, जब तक हमें पूर्ण नागरिक सरकार नहीं मिल जाती।” नीचे बनाया गया नक्शा 15 बैरिकेड की स्थितियां बताता है, जो दोनों देशों को जोड़ने वाली सड़कों पर लगाए गए हैं।

ईआरसी के ख़िलाफ़ सैन्य जुंटा

इस बीच सैन्य जुंटा तेजी से पूर्व तानाशाह ओमर-अल-बाशिर की इस्लामिस्ट नेशनल कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के सदस्यों को राज्य के ढांचे में दाखिल कर रही है, उधर सैन्य जुंटा ईआरसी (एंपॉवरमेंट रिमूवल कमेटी) के सदस्यों के खिलाफ़ हो गई है।

ईआरसी की स्थापना साझा नागरिक-सैन्य सरकार के तौर पर हुई थी। 2019 में दिसंबर क्रांति के बाद बाशिर को सत्ता से बेदखल करने के बाद इसकी स्थापना हुई थी। इसका काम एनसीपी के सदस्यों को राज्य के ढांचे से बाहर करना और गैर कानूनी ढंग से उनके द्वारा हासिल की हुई संपत्ति को जब्त करना था। 

ईआरसी द्वारा निलंबित किए गए सैकड़ों सदस्यों को फिर से नियुक्ति देकर और उनकी संपत्ति उन्हें वापस करने के बाद, सैन्य जुंटा ने ईआरसी के सदस्यों को गिरफ़्तार करना शुरू कर दिया है। 

समिति के उपाध्यक्ष मोहम्मद अल-फाकी सुलिमान को उनकी पार्टी यूनियनिस्ट अलायंस पार्टी के अन्य सदस्यों, माज अवाद करेंदिस को रविवार की शाम को गिरफ़्तार कर लिया गया। बता दें 13 फरवरी को हुई यह गिरफ़्तारियां, 9 फरवरी को ईआरसी के तीन अन्य सदस्यों की गिरफ़्तारी के बाद हुई हैं। उन गिरफ़्तारियों में सेक्रेटरी जनरल तैय्यब ओथमैन युसुफ की गिरफ़्तारी भी शामिल है।

प्रतिरोधक समितियां राज्यको प्रशासन से बेदखल कर सकती हैं

लेबर हब में सालेह मैमन लिखते हैं, “सूडान राज्य को अपहृत करने वाले कुलीन जनरलों का सूडान के लोग विरोध कर रहे हैं। इन जनरलों के पास हिंसा और सैनिकों का सहारा है। इसके ऊपर इन लोगों ने दबाव-दमन और लूट से आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर लिया है, जिससे उनके बेइंतहां संपदा ज़मा हो गई है।”

“लोकतांत्रिक क्रांति से जो हासिल हुआ था, उसे नष्ट करने के कूटनीतिक तरीकों में उनके साथ अमेरिका, ब्रिटेन और उनके साथियों सऊदी अरब और इजिप्ट का साथ भी है, जो लोकतंत्र के मित्र नहीं हैं। तत्कालीन अमेरिकी राजदूत ने जनरल से मुलाकात की थी, फिर नागरिकों समूहों से भी बातचीत की थी।”

संयुक्त राष्ट्र इंटिग्रेटेड ट्रांजिशन असिस्टेंस मिशन ने भी प्रभावी तौर पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन सैन्य जुंटा को दिया है। मिशन ने बातचीत का आह्वान किया है, “जो जनरलों के लिए एक आशा की तरह है, ताकि नागरिक आंदोलन को विभाजित किया जा सके।” लेकिन नागरिको का आंदोलन प्रतिरोधक समितियों के नेताओं के नेतृत्व में लगातार मजबूत हो रहा है। 

मैमन लिखते हैं, “प्रतिरोधक समितियां, सामाजिक शक्ति का नया तरीका है, जिसे सैन्य राज्य तंत्र से ज़्यादा वैधानिकता प्राप्त है। उनके पास स्वशासन की संभावना है और संमन्वय-संयोजन बनाने वाले उपकरण हैं, जो आर्थिक संकट से जूझते क्षेत्रों की जरूरत पूरा कर राज्य को प्रशासन से बाहर कर सकती हैं। उन्होंने पुराने ढर्रे से बाहर निकलने और नया भविष्य बनाने का साहस दिखाया है।

न्यूज़क्लिक से साभार