काकोरी एक्शन शहादत श्रद्धांजलि सभा; क्रांतिकारियों की साझी विरासत आगे बढ़ाने का आह्वान

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ऐसे समय जब पूरे मुल्क को नफ़रत और धार्मिक हिंसा में डुबोया जा रहा है, तब अशफ़ाक-बिस्मिल की अजीम यारी से प्रेरणा लेकर अमन-चैन, भाई-चारा व इंसानियत का संकल्प बंधा।

रुद्रपुर(उत्तराखंड)। एक ऐसे कठिन वक़्त में, जब अशफ़ाक-बिस्मिल की अजीम यारी और साझी शहादत वाले मुल्क को आरएसएस-भाजपा सत्ताधारियों द्वारा नफ़रत और धार्मिक हिंसा बेहद तीखा कर दिया गया है। तब शहीदों से प्रेरणा लेकर अमन-चैन, भाई-चारा व इंसानियत की मुहिम के तहत काकोरी एक्शन के अमर शहीद याद किए गए।

इसी मुहिम के तहत 19 दिसंबर काकोरी एक्शन के शहीदों की याद में ‘काकोरी शहीद यादगार कमेटी’ के बैनर तले शहर के खेड़ा कालोनी स्थित अशफ़ाक उल्ला खां पार्क में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ।

स्थानीय जनता का साथ, अशफ़ाक उल्ला खाँ पार्क बना केन्द्र

इस आयोजन के लिए इंकलाबी मज़दूर केन्द्र, मज़दूर सहयोग केन्द्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन और स्थानीय अमन-पसंद जनता ने पहल ली। रुद्रपुर के खेड़ा स्थित शहीद अशफ़ाक उल्ला खाँ पार्क केन्द्र बना। ‘काकोरी शहीद यादगार कमेटी’ गठित हुई।

देखते ही देखते स्थानीय लोगों के प्रयास से दुर्दशा का शिकार यह पार्क रंग-रोगन और दीवारों पर नारों के साथ शहीद स्थली बन गया। विभिन्न टोलियों ने पूरे शहर में जोरदार प्रचार अभियान चलाया और जज्बे के साथ एक सफल आयोजन सम्पन्न किया।

माल्यार्पण से शुरू; जोरदार नारों व क्रांतिकारी गीतों से बाँधी समा

कार्यक्रम की शुरुआत अमर शहीदों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह, राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी की फोटो पर माल्यार्पण के साथ हुई।

आयोजन के दौरान जहाँ क्रांतिकारी गीतों ने समा बांधी, वहीं काकोरी के शहीद अमर रहें; बिस्मिल-अशफाक़ की यारी, साझी विरासत है हमारी; अमर शहीदों का पैगाम, जारी रखना है संग्राम; जाति-धर्म में नहीं बाटेंगे, अन्याय के खिलाफ एकजुट लड़ेंगे आदि नारों ने पूरी फिज़ा को गुंजायमान किया। वहीं अशफ़ाक उल्ला खाँ पर केंद्रित पुस्तिका प्रकाशित व वितरित हुई।

काकोरी के शहीदों की विरासत से परिचित हुए लोग

सभा के दौरान काकोरी के अमर शहीदों के विचारों और सपनों पर विस्तार से चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि अन्यायी-अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने वाले महान क्रांतिकारी योद्धाओं, काकोरी एक्शन के जांबाज युवा शहीद व हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के बहादुर सिपाहियों अशफ़ाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल व ठाकुर रोशन सिंह को 19 दिसम्बर को जबकि राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को 17 दिसंबर 1927 में अंग्रेजी सरकार ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था।

वक्ताओं ने बताया कि अशफ़ाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश हुकूमत की विभाजनकारी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीतियों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए कौमी एकता कायम कर एक नई मिसाल पेश की थी। अपने मजहब के साथ आर्यसमाजी बिस्मिल और मुस्लिम अशफ़ाक एक कमरे में रहकर देश की आजादी के एक ही मक़सद के लिए लड़े व एक साथ फांसी का फंदा चूम लिया। शहीद अशफ़ाक उल्ला व उनके साथी गोरे अंग्रेजों की ब्रिटिश हुकूमत से आज़ादी के साथ आज़ाद भारत में ऐसा शासन चाहते थे जिसमें अमीरी गरीबी जैसी गैरबराबरी न हो।

क्रांतिकारी नौजवानों के इस बलिदान ने अनेक नौजवानों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निर्णायक संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया। आगे चलकर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और उधम सिंह जैसे क्रांतिकारी नौजवानों ने अपने प्राणों की आहुति देकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला कर रख दिया। अन्ततः अंग्रेज भारत के लुटेरे शासको से समझौता कर 1947 में देश छोड़ने के लिए विवस हो गए।

विकट संकट का दौर, शहादत खतरे में

वक्ताओं ने कहा कि गोरे अंग्रेज लुटेरों के जाने के बाद काले अंग्रेज भारत के सत्ताधारी बने और पूँजीपतियों की दौलत व मुनाफे की अंधी लूट के लिए देश के मेहनतकश जनता के बड़े शोषक और गोरे अंग्रेजों से ज्यादा दमनकारी बन गए।

वक्ताओं ने बताया की साम्प्रदायिक के रथ पर सवार होकर केन्द्र की सत्ता में बैठी मोदी सरकार के पिछले 10 सालों के शासन में अडानी-अंबानी जैसे देशी-विदेशी पूँजीपतियों की लूट विकराल हुई है और आम मेहनतकश आवाम की तबाही बेलगाम हो गई।

दूसरी ओर देश के भीतर चौतरफा नफ़रत फैलाने का काम तेज हुआ है। मुस्लिम अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा बढ़ी है। इसी के साथ मजदूरों-किसानों-छात्रों और आम जनता के खिलाफ काले कानूनों का अंबार लग गया; मजदूरों को बंधुआ बनाने वाली 4 नई श्रम संहिताएं बनीं। किसानों के खिलाफ काले कानून बने, जिसे 13 महीने चले ऐतिहासिक किसान आन्दोलन ने वापस लेने को मजबूर किया था।

सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण तेज हुआ, शिक्षा, चिकित्सा तक बाजार के हवाले हो गई, महिलाओं के साथ हिंसा बढ़ गई। रोजगार एवं नागरिक अधिकारों पर हमले तेज हुए हैं।

शहीदों के सपनों को साकार करो!

वक्ताओं ने कहा कि आम जनता को उनके रोजी-रोटी जैसे बुनियादी हक़ के वास्तविक संघर्षों से भटकाने के लिए एक खतरनाक माहौल तैयार है। ऐसे में साम्प्रदायिक एकता की मिसाल शहीद अशफ़ाक़-बिस्मिल की साझी शहादत से प्रेरणा लेकर देश की मजदूर-मेहनतकश जनता को साम्प्रदायिक राजनीति करने वाली ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर अपने शहीदों के सपनों, एक समतामूलक, बराबरी और इंसान केंद्रित समाज निर्माण करने हेतु संघर्ष के लिए आगे आना होगा।

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दलगत राजनीति से इतर साझे संघर्ष पर बल

इस आयोजन में जहाँ तमाम क्रांतिकारी संगठनों की सक्रियता रही, वहीं कुछ चुनावी राजनीति से जुड़े लोग भी शामिल रहे। तमाम स्थानीय सक्रिय साथियों में कई विभिन्न राजनीतिक दलों से सम्बद्ध लोग भी थे। लेकिन यह आयोजन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर शहीदों को श्रद्धांजलि देने और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने पर ही केंद्रित रहा।

सभा को इंकलाबी मजदूर केन्द्र के सुरेंद्र, मजदूर सहयोग केन्द्र के मुकुल, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के शिवदेव सिंह, प्रगतिशील महिला एकता केन्द्र की रविन्द्र कौर, ठेका मजदूर कल्याण समिति पंतनगर से अभिलाख सिंह, सीपीआई के राजेन्द्र गुप्ता, भाकपा माले के ललित मटियाली आदि ने अपने विचार रखे।

वहीं किच्छा विधायक तिलक राज बेहड, पूर्व पालिकाध्यक्ष मीना शर्मा, पार्षद मोहम्मद अशफाक, मुहम्मद कुरैशी आदि ने भी संबोधित किया।

जबकि समाजसेवी साजिद खान, अजीज खान, उमर अली, डॉक्टर शाहिद रजा, अख्तर अली, शौकत आदि की सक्रिय भागीदारी रही।

इस दौरान इन्टरार्क मजदूर संगठन पंतनगर, यजाकि वर्कर यूनियन, इन्टरार्क मजदूर संगठन किच्छा, रॉकेट रिद्धि सिद्धि कर्मचारी संघ, सीआईई इंडिया श्रमिक संगठन, एडविक कर्मचारी संगठन, एडियंट कर्मकार यूनियन, नीलमेटल कामगार संगठन, एलजीबी वर्कर्स यूनियन, गुजरात अंबुजा कर्मकार यूनियन आदि यूनियनों के साथ सैकड़ों मजदूर मेहनतकश और स्थानीय जनता ने भागीदारी की।

https://mehnatkash.in/2023/12/18/this-verse-of-kakori-martyr-should-be-read-again-and-again/