चार साल बाद मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को सुप्रीम कोर्ट से मिली जमानत

2018 के भीमा कोरेगांव मामले में फंसे हैं नवलखा व अन्य। अदालत ने गौर किया कि वह पहले ही चार साल से अधिक समय से जेल में हैं और अभी तक उन पर आरोप भी तय नहीं हुआ है।
भीमा कोरेगांव एल्गार काउंसिल मामले में चार साल से क़ैद झेल रहे मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को अंततः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार 14 मई को जमानत दे दी। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि वह पहले ही चार साल से अधिक समय से जेल में हैं और अभी तक उन पर मुकदमा नहीं चल पाया है।
बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ नवलखा की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच ने कहा- हाईकोर्ट के जमानत के ऑर्डर पर स्टे की अवधि बढ़ाने का हमें कोई कारण नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश बहुत बड़ा और विस्तृत है। पूरे मामले की सुनवाई खत्म होने में तो कई साल बीत जाएंगे।
दरअसल, नवलखा पर 2017 में पुणे में एल्गार परिषद के आयोजित कार्यक्रम में भड़काऊ भाषण देने का आरोप है। इसके कारण ही भीमा-कोरेगांव में हिंसा हुई थी। हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हुई थी, जबकि कई घायल हुए थे।
इस मामले में नवलखा को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत दी थी, जिसके खिलाफ एनआईए ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर स्टे लगा दिया था।

बिना चर्चा के जमानत की सीमा और नहीं बढ़ा सकते
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा ‘हम रोक के आदेश को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं। क्योंकि बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश में नवलखा की जमानत को लेकर विस्तार से बताया गया है। इस मामले की सुनवाई पूरी होने में अभी कई साल लगेंगे। ऐसे में इस मामले पर डिटेल में बहस के बिना जमानत की समय सीमा और नहीं बढ़ाया जा सकता।’
नवलखा की वकील ने किया विरोध
सुनवाई के दौरान एनआईए की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने दावा किया कि नवलखा पर सुरक्षा के लिए बकाया वर्तमान में 1.75 करोड़ हो गया है। एएसजी के जवाब में जस्टिस सुंदरेश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नवलखा लंबे समय से जेल में बंद रहे। उन्होंने रोक को हटाने का सुझाव भी दिया था। वहीं नवलखा के वकील स्तुति राय और साथ में सीनियर वकील नित्या रामकृष्णन ने इस बिल का विरोध किया।
नजरबंद हैं गौतम नवलखा
महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हुए हिंसा मामले में मानवाधिकार कार्यकर्ता और पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (PUDR) के पूर्व सचिव को अगस्त 2018 में गिरफ्तार किया गया था। शुरुआती सालों में उनको जेल में रखा गया, हालांकि नवंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नवलखा को अधिक उम्र होने की याचिका को स्वीकार करते हुए उनके घर में ही नजरबंद कर दिया गया। वह तबसे नवी मुंबई स्थित अपने घर में नजरबंद हैं।
जमानत देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- पूरे मामले पर विस्तार से चर्चा किए बिना हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगाने का कोई औचित्य नहीं है। नवलखा को जमानत दी जाती है, लेकिन उन्हें हाउस अरेस्ट के दौरान मिली सुरक्षा के लिए 20 लाख रुपए चुकाने होंगे।
दरअसल, गिरफ्तारी के बाद हाउस अरेस्ट की मांग नवलखा ने ही की थी। इसलिए कोर्ट ने उन्हें ही इसका बिल भरने के लिए कहा है। एनआईए ने 9 अप्रैल को हुई पिछली सुनवाई में नवलखा से 1 करोड़ 64 लाख रुपए के भुगतान करने की मांग की थी।
क्या है भीमा-कोरेगांव का पूरा मामला

यह मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित एल्गार परिषद सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से जुड़ा है। इसके बारे में पुलिस का दावा है कि उस सम्मेलन के बाद कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा भड़क उठी थी।
2018 में चूंकि इस युद्ध की 200वीं वर्षगांठ थी लिहाज़ा बड़े पैमाने पर लोग जुटे और टकराव भी हुआ। जनवरी, 2018 में पुलिस ने गौतम नवालख सहित संस्कृतिकर्मी व वामपंथी कार्यकर्ता के पी. वरवर राव, मज़दूर नेता व अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, अरुण फ़रेरा और वरनो गोन्जाल्विस जैसे एक्टिविस्टों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया था। बाद में कई लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया था।
आरोप लगाया गया है कि इस सम्मेलन के बाद भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़की। हालांकि इनकी गिरफ़्तारी के बाद से ही कई लोग यह दावा कर रहे हैं कि इस मामले में इनको जानबूझ कर इसलिए फंसाया जा रहा है क्योंकि वे दलित समुदाय के अधिकारों की पैरवी करते हैं।
इस मामले में शिव प्रतिष्ठान हिंदुस्तान के अध्यक्ष संभाजी भिडे और समस्त हिंदू अघाड़ी के मिलिंद एकबोटे पर भी आरोप लगे कि उन्होंने मराठा समाज को भड़काया, जिसकी वजह से यह हिंसा हुई। भिडे, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक हैं और एकबोटे भारतीय जनता पार्टी के नेता और विधायक का चुनाव लड़ चुके हैं।
हिंसा के बाद दलित नेता प्रकाश आंबेडकर ने भिड़े व एकबोटे पर मुक़दमा दर्ज कर गिरफ़्तार करने की मांग की थी। आरएसएस-भाजपा सत्ता संरक्षण में इनका कुछ नहीं हुआ, लेकिन इस बीच कथित आरोप में पहले तो बड़ी संख्या में दलितों को गिरफ़्तार किया गया और बाद में सामाजिक कार्यकर्ताओं को।
मामले में गौतम नवलखा सहित सोलह एक्टिविस्टों को गिरफ्तार किया गया। इस मामले में शोमा सेन को पिछले महीने जमानत मिली थी। सुधा भारद्वाज को डिफ़ॉल्ट जमानत (2021) मिली, जबकि आनंद तेलतुम्बडे (2022), वर्नोन गोंसाल्वेस और अरुण फरेरा (2023) को योग्यता के आधार पर तो वरवरा राव को मेडिकल आधार पर जमानत मिल चुकी है। अब गौतम नवलखा भी नजरबंद से आज़ाद होंगे। एक अन्य आरोपी, फादर स्टेन स्वामी की जुलाई 2021 में हिरासत में मृत्यु हो गई।
जमानत का चलता रहा खेल
इसके पहले बाम्बे हाईकोर्ट के जस्टिस एएस गडकरी और जस्टिस शिवकुमार डिगे की खंडपीठ ने पिछले दिसंबर में नवलखा को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि यह अनुमान लगाने के लिए कोई सामग्री नहीं है कि नवलखा ने यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकवादी कृत्य किया था। हालांकि, एनआईए द्वारा इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के लिए समय मांगने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश पर 3 सप्ताह के लिए रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बार-बार इस रोक को बढ़ाया गया।
न्यायालय ने जमानत आदेश में यह स्पष्ट रूप से ध्यान देने के बाद इस अंतरिम रोक को हटा दिया कि नवलखा को चार साल से अधिक समय से जेल में रखा गया और मुकदमे को पूरा होने में “वर्षों और वर्षों और वर्षों” का समय लगेगा। न्यायालय ने संबंधित कारकों पर भी विचार किया, जिसमें यह भी शामिल है कि आरोप तय नहीं किए गए।
जमानत दीजिए… मुकदमे को पूरा होने में कई-कई साल लगेंगे
खंडपीठ ने कहा,”प्रथम दृष्टया हमारा विचार है कि रोक के अंतरिम आदेश को बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपीलकर्ता चार साल से अधिक समय से जेल में है और अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं। हाईकोर्ट ने विस्तृत आदेश द्वारा इसे प्रथम दृष्टया माना है। जमानत दीजिए… मुकदमे को पूरा होने में कई-कई साल लगेंगे। इस प्रकार संबंधित विवाद पर गौर किए बिना हम रोक को आगे बढ़ाने के इच्छुक नहीं हैं।”
नवलखा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नित्या रामकृष्णन ने लंबे समय तक कारावास के बिंदुओं पर बहस की और कहा कि अन्य सह-अभियुक्तों को जमानत पर रिहा कर दिया गया। उन्होंने हाउस अरेस्ट के लिए मांगी गई राशि को भी चुनौती दी और कहा कि यह टिकाऊ नहीं है। रामकृष्णन ने अपनी दलील इस तर्क पर रखी कि आरोपों में नवलखा की आय को ध्यान में नहीं रखा गया।
इसके विपरीत, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने तर्क दिया कि कुछ सह-अभियुक्तों को जमानत नहीं दी गई। आरोप गंभीर हैं और हाईकोर्ट ने जमानत देकर गलती की है।
जहां तक नजरबंदी का सवाल है तो कोर्ट ने नवलखा को अंतरिम चरण के तौर पर 20 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया। यह राशि हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत की पूर्व शर्त के रूप में चुकानी होगी।
इससे पहले, नवलखा की ओर से पेश सीनियर वकील नित्या रामकृष्णन ने अदालत को बताया कि मामले में 375 गवाह थे। इसके बाद न्यायालय ने मौखिक रूप से कहा कि मुकदमा “अगले दस वर्षों तक ख़त्म नहीं हो सकता।” रामकृष्णन ने यह भी चिंता व्यक्त की कि जमानत आदेश, जो हाईकोर्ट द्वारा योग्यता के आधार पर पारित किया गया, पार्टी को सुने बिना ही रोक दिया गया। तदनुसार, अदालत ने मामले को आज की सुनवाई के लिए पोस्ट कर दिया।
प्रासंगिक रूप से, मुंबई में हाउस अरेस्ट का स्थान बदलने की नवलखा की याचिका भी सूचीबद्ध है।
पहले की सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने भीमा कोरेगांव के आरोपी गौतम नवलखा के वकील शादान फरासत से मौखिक रूप से कहा कि अगर घर में गिरफ्तारी की मांग की गई तो एनआईए द्वारा किए गए निगरानी खर्च का भुगतान किया जाना चाहिए।
इसके बाद, गौतम नवलखा के वकील शादान फरासत ने डिवीजन बेंच को अवगत कराया कि खर्चों का भुगतान करने में कोई कठिनाई नहीं है और मुद्दा ऐसे खर्चों की गणना के बारे में था।