फैसला: सरकारी कर्मचारी ओवरटाइम भुगतान के हकदार नहीं -सुप्रीम कोर्ट

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अदालत ने कहा कि कारखाने और सरकारी सेवा में रोजगार के बीच अंतर है। कारखाने में कार्यरत श्रमिक शारीरिक काम करते हैं, और विशेष लाभ नहीं मिलता; सरकारी कर्मचारी विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं।

दिल्ली। एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी कारखाना अधिनियम के अनुसार दोहरे ओवरटाइम भत्ते का दावा नहीं कर सकते हैं, यदि सेवा नियम इसके लिए प्रदान नहीं करते हैं।

सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड व अन्य आदि बनाम विजय डी कस्बे व अन्य आदि मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्मचारी ओवरटाइम लाभ के लिए हकदार नहीं हैं और वे इस श्रेणी में नहीं आते हैं।

अदालत ने कहा कि ऐसा देखा जा रहा है कि संविदा कर्मचारियों के विपरीत सरकारी कर्मचारी कुछ अन्य विशेषाधिकारों के अलावा वेतन आयोग के संशोधन का लाभ उठाते हैं।

जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने इस मुद्दे पर 18 अप्रैल को सुनाए फैसले में कहा कि क्या सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (मुद्रा नोटों की ढलाई के लिए जिम्मेदार वित्त मंत्रालय के तहत एक कंपनी) में पर्यवेक्षकों के रूप में काम करने वाले कर्मचारी कारखाना अधिनियम 1948 के अध्याय VI के अनुसार डबल ओवरटाइम भत्ते के हकदार हैं।

देश की सर्वोच्च अदालत का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब मोदी सरकार मौजूदा 44 श्रम कानूनों को खत्म करके 4 लेबर कोड लागू करने वाली है। जिसके तहत काम के घंटे बढ़ाने के साथ ओवर टाइम भुगतान का पुराना ढांचा ध्वस्त होने वाला है।

बाम्बे हाईकोर्ट का फैसला हुआ रद्द

बॉम्बे हाईकोर्ट के एक फैसले को रद्द करते हुए, जिसमें कहा गया था कि कर्मचारी कारखाना अधिनियम के अनुसार ओवरटाइम लाभ के हकदार थे, पीठ ने स्पष्ट किया कि या तो सिविल पद पर या संघ या राज्य की सिविल सेवाओं में नियुक्ति, इनमें से एक स्टेटस है और यह कि यह सेवा के अनुबंध द्वारा या केवल श्रम कल्याण कानूनों द्वारा कड़ाई से शासित रोजगार नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना था कि निगम के कर्मचारियों को भी ओवरटाइम भत्ता मिलना चाहिए था। खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा पारित आदेशों को रद्द कर दिया है।

पीठ ने कहा कि सरकारी कर्मचारी कई विशेष विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं जो कारखाना अधिनियम के तहत आने वाले मजदूरों के लिए उपलब्ध नहीं हैं, जैसे आवधिक वेतन प्रावधान। इसलिए, कारखाना अधिनियम के तहत लाभ के लिए सरकारी कर्मचारियों के दावों की जांच की जानी चाहिए कि “क्या यह दोनों दुनिया के सर्वश्रेष्ठ प्राप्त करने का प्रयास है।”

ओवरटाइम भुगतान की नहीं कर सकते हैं मांग 

खंडपीठ ने कहा कि कारखानों और औद्योगिकी क्षेत्र में कार्यकरत लोगों के विपरित सिविल पदों, राज्यों के सिविल और किसी भी सरकारी संस्थान में कार्य करने वाले कर्मचारियों को नियमों के अनुसार सरकार के नियंत्रण में रहना चाहिए। ये कर्मचारी ओवरटाइम भत्ता के लिए मांग नहीं कर सकते हैं। 

खंडपीठ ने कहा कि ये कहने की आवश्यकता नहीं है कि वैधानिक नियमों का उल्लंघन करने वाले किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी लाभ का दावा नहीं किया जा सकता है। दुर्भाग्य से केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण पूरी तरह से उन नियमों को भूल गया। कहा कि एक कारखाने में रोजगार और सरकारी सेवा में रोजगार के बीच का अंतर है। अदालत ने कहा कि कॉपोरेट सेक्टर के कर्मचारी शारीरिक काम करते हैं, जिसके लिए उन्हें ओवरटाइम भुगतान की आवश्यकता है।

शीर्ष अदालत ने क्या कहा?

“व्यक्ति जो सिविल पदों के धारक नहीं हैं और न ही राज्य की सिविल सेवाओं में हैं, लेकिन जो केवल (कारखाना अधिनियम) 1948 अधिनियम द्वारा शासित हैं, उन्हें सप्ताह में छह दिनों के लिए काम करने के लिए कुछ सीमाओं के साथ साप्ताहिक घंटों के तहत काम करने के लिए बनाया जा सकता है। धारा 51, धारा 52 के तहत साप्ताहिक अवकाश, धारा 54 के तहत दैनिक घंटे, आदि। कारखाना अधिनियम के तहत आने वाले श्रमिकों को सरकारी सेवा में आवधिक वेतन आयोगों के माध्यम से स्वचालित वेतन संशोधन का लाभ नहीं मिलता है। सिविल पदों या सिविल सेवाओं में रहने वाले व्यक्ति राज्य के कुछ विशेषाधिकारों का आनंद लेते हैं और इसलिए, प्रतिवादियों द्वारा किए गए दावे का ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट द्वारा उचित परिप्रेक्ष्य में यह देखने के लिए परीक्षण किया जाना चाहिए कि क्या यह दोनों दुनिया का सर्वश्रेष्ठ पाने का प्रयास है।”

अदालत ने कहा कि प्रासंगिक सेवा नियमों के अनुसार, कारखानों और औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कार्यरत लोगों के विपरीत, सरकारी सेवा में कार्यरत व्यक्तियों को हर समय खुद को सरकार के अधीन रखना आवश्यक है।

पीठ ने कहा, “उपरोक्त नियम के आलोक में, वास्तव में प्रतिवादियों के लिए डबल ओवर टाइम भत्ते के भुगतान की मांग करने की कोई गुंजाइश नहीं थी। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी भी लाभ का दावा नहीं किया जा सकता है।”

यहां कर्मचारियों का दावा किसी सेवा नियम पर नहीं बल्कि कारखाना अधिनियम की धारा 59(1) पर आधारित था। चूंकि शासकीय सेवाओं के नियमों में किसी भी समय के बाद भत्ते का प्रावधान नहीं था, इसलिए उनके दावे को अमान्य ठहराया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल और साथ ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकारी सेवा और निजी सेवा में व्यक्तियों के बीच अंतर और प्रतिवादियों की सेवा की शर्तों पर वैधानिक नियमों के प्रभाव पर विचार नहीं किया, जिसमें उनके लिए अतिरिक्त घंटे काम करने का दायित्व भी शामिल है।

पीठ ने अपीलों को स्वीकार करते हुए अवलोकन किया, “किसी भी मामले में, प्रतिवादी, जो वर्ष 2006 तक सिविल पदों पर या राज्य की सिविल सेवाओं में थे, 1948 अधिनियम के अध्याय VI के प्रावधानों के लाभों का दावा नहीं कर सकते थे, सेवा नियमों का उल्लंघन करते हैं।”

सेवनिवृत व मृतक कर्मचारियों से वसूली नहीं

हालांकि, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि अपील के लंबित रहने के दौरान कुछ कर्मचारी पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं और कुछ अन्य का निधन हो गया है, न्यायालय ने उन लोगों से कोई वसूली ना करने का निर्देश दिया जिन्हें पहले ही भुगतान किया जा चुका है।