कोरोना वायरस: अमरीका में अचानक बढ़ी बेरोज़गारी, अर्थव्यवस्था संकट में

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सुपर पॉवर’ के ये हालत तो भारत का क्या होगा?

कोरोना संकट के कारण अमरीका में बेरोज़गारी में अचानक बेतहाशा बढ़ोतरी देखने को मिली है। 21 मार्च को समाप्त सप्ताह में अमेरिका में बेरोजगारी भत्ते का दावा करने वालों की संख्या पिछले सप्ताह के 2,82,000 से बढ़कर 32 लाख 80 हजार हो गई। यानी एक सप्ताह में लगभग 33 लाख लोग बेरोजगार हो गये। ध्यान रहे कि यह कुल बेरोजगारों की संख्या नहीं है क्योंकि यह भत्ता सिर्फ नये बेरोजगारों को 6 महीने तक मिलता है।

इससे पहले 1982 में बड़ी संख्या में बेरोज़गारों की संख्या बढ़ी थी। मगर उस दौरान 6 लाख 95 हज़ार लोगों ने ही बेरोज़गार के तौर पर अपना पंजीकरण करवाया था।

अमरीका में कोरोना संकट के कारण रेस्तरां, बार, सिनेमा, होटल और जिम वगैरह बंद कर दिए गए हैं। कार कंपनियों ने उत्पादन रोक दिया है और हवाई सेवा को सीमित कर दिया गया है।

ख़राब होते हालात

इस साल चार फ़रवरी को अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में कहा था, “नौकरियों में इज़ाफ़ा हो रहा है, ग़रीबी दूर हो रही है। अपराध दर में गिरावट आई है। लोगों में आत्मविश्वास जाग रहा और देश समृद्धि की ओर बढ़ रहा है।”

ट्र्ंप अमरीका की 21.44 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को लेकर काफ़ी उत्साहित नज़र आ रहे थे। अगर इसे चीन की 14.4 ट्रिलियन की जीडीपी, भारत की 2.8 ट्रिलियन की जीडीपी और पाकिस्तान की 320 अरब की जीडीपी के संदर्भ में देखें तो निश्चित तौर पर यह उत्साह बढ़ाने वाला है। लेकिन उस दौरान चीन में वायरस से मरने वालों की संख्या 500 तक पहुंच चुकी थी और हजारों लोग संक्रमण की चपेट में आ चुके थे और अमरीका में यह संकट तब तक उतने गंभीर स्तर तक नहीं पहुंचा था।

अभी ज़्यादा वक़्त नहीं गुजरा था जब अमरीकी शेयर मार्केट ने नई ऊंचाइयों को छुआ था। बेरोज़गारी दर 3.6 फीसदी के साथ 50 सालों के अपने न्यूनतम स्तर पर थी। अमरीका ने चीन के साथ अपने मुफ़ीद दो सौ अरब डॉलर का सौदा किया था और बौद्धिक संपदा कानून को मज़बूत किया था।

लेकिन इसके क़रीब डेढ़ महीने बाद जो हालात दिख रहे हैं वो बिल्कुल ही अलग हैं। अमरीका में 1050 से अधिक लोगों की मौत अब तक हो चुकी है और करीब 70000 कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों की पुष्टि हो चुकी है। यह आंकड़े लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं।

अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला असर काफ़ी भयानक?

व्यापार, स्कूल, खेल-कूद के आयोजन सभी कुछ बंद पड़े हुए हैं। आर्थिक गतिविधियों पर लगाम लग गई है। स्टॉक मार्केट का बुरा हाल हो रखा है। खाली पड़ी सड़कें, मॉल, उड़ानें और ट्रेन सब ठप हैं। ‘अर्थव्यवस्था का कबाड़ा’ निकल गया है या फिर ‘अर्थव्यवस्था धाराशायी हो गई’ है जैसी बातें हो रही हैं।

निवेशक रे डेलीयो ने सीएनबीसी के साथ एक इंटरव्यू में कहा है, “जो हो रहा है, वैसा हमारी ज़िंदगी में कभी नहीं हुआ था। यह संकट का समय है। रे डेलीयो के आकलन के मुताबिक कोरोना वायरस की वजह से अमरीका को करीब चार ट्रिलियन डॉलर का नुक़सान होने की आशंका है और बहुत सारे लोग बर्बाद होने वाले हैं।

जॉब वेबसाइट करियर बिल्डर के 2017 के सर्वे के मुताबिक़ 78 फ़ीसदी अमरीकी कामगार अपनी ज़रूरतों के लिए हर महीने मिलने वाले पे-चेक पर निर्भर रहते हैं। हर चार में से एक कामगार हर महीने किसी भी तरह की कोई बचत नहीं करता।

इस सर्वे के मुताबिक़, क़रीब हर चार में से तीन कामगार कर्ज़ में डूबे हुए हैं और आधे से ज़्यादा दिहाड़ी मज़दूर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए एक से ज़्यादा काम करते हैं। लेकिन अगर हम कुछ बड़े बैंकों और संस्थानों की मानें तो आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला संभावित असर काफी भयानक है।

डूब रही है अर्थव्यवस्था

गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्रियों ने मंदी का अनुमान लगाया है। पहली तिमाही की जीडीपी में छह फीसदी की गिरावट के बाद दूसरी तिमाही में 24 फीसदी की बड़ी गिरावट का अनुमान है। यह आकड़े काफी चौंकाने वाले हैं।

बैंकिंग सेक्टर की एक बड़ी कंपनी जेपी मॉर्गन ने अपने एक विश्लेषण में कहा है, “पहली तिमाही में चार फ़ीसदी के बाद दूसरी तिमाही में अमरीकी अर्थव्यवस्था में 14 फीसदी की गिरावट दर्ज होने का अनुमान है तो वहीं तीसरी तिमाही में यह आठ फीसदी और चौथी तिमाही में चार फीसदी की भारपाई करने में कामयाब मिलेगी।” जेपी मॉर्गन के मुख्य अर्थशास्त्री माइकल फेरोली के आकलन के मुताबिक, “आने वाले हफ्तों में अमरीका में नौकरी जाने वालों की शुरुआती संख्या चार लाख को पार करने वाली है।”

बैंक ऑफ अमरीका के अर्थशास्त्री मिशेल मेयेर ने लिखा है, “हम आधिकारिक तौर पर इस बात की घोषणा करते हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर में जा चुकी है और हम बाकी दुनिया के साथ उसी कतार में खड़े हो चुके हैं। हम गहरे संकट में जा चुके हैं।” आगे उन्होंने लिखा है, “नौकरियां नहीं रहेंगी। लोगों के पास पैसे नहीं रहेंगे और हताशा की स्थिति पैदा होगी।”

बैंक ऑफ अमरीका के अनुमान के मुताबिक दूसरी तिमाही में 12 फीसदी की गिरावट के साथ अर्थव्यवस्था ‘डूबने’ वाली है। पूरे साल की जीडीपी में 0.8 फीसदी की गिरावट आने वाली है।

हालांकि अर्थशास्त्री इस मुश्किल घड़ी के बाद अर्थव्यवस्था के संभलने की भी उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन हर पल बदलते हालात के बीच इस पर कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। किसी को भी अभी यह नहीं पता कि यह दौर कितना लंबा चलने वाला है।

स्विट्जरलैंड की निवेशक कंपनी यूबीएस के मुताबिक दूसरी तिमाही के दौरान अमरीकी अर्थव्यवस्था में ‘बड़ी गिरावट’ दर्ज होने वाली है तो वहीं कोरोना वायरस की वजह से पहली छमाही में गहरी मंदी का दौर रहने वाला है। स्विस बैंकिंग कंपनी टाइटन के मुताबिक अमरीकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पहली तिमाही के दौरान -2.1 फीसदी तक पहुंच जाएगी और दूसरी तिमाही में 10 फ़ीसदी की गिरावट होगी।

जाहिर तौर पर अर्थव्यवस्था में आई गिरावट का सीधा असर नौकरियों पर पड़ने वाला है। बैंक ऑफ अमरीका के अनुमान के मुताबिक बेरोजगारी दर दोगुना होने वाला है और हर महीने करीब दस लाख नौकरियां जाने वाली हैं। इस हिसाब से दूसरी तिमाही में करीब पैंतीस लाख नौकरियां जाने वाली हैं।

एनालिसिस कंपनी ऑक्सफोर्ड इकॉनॉमिक्स ने अनुमान लगाया है कि यात्राओं के रद्द होने की वजह से करीब 46 लाख नौकरियां जाएंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, “यात्राओं पर होने वाला 355 अरब डॉलर का खर्च इस साल यात्राओं के रद्द होने से नहीं हो पाएगा। नतीजतन अमरीकी अर्थव्यवस्था में इसकी वजह से 809 अरब डॉलर का नुकसान होगा। यह नुकसान 9/11 की घटना के बाद होने वाले इस मद के नुकसान से छह गुना ज्यादा है।”

रिपोर्ट में आगे लिखा है, “हम अमरीका की अर्थव्यवस्था में सिर्फ़ यात्राओं को होने वाले नुकसान के आधार पर मंदी के दौर में जाने की बात कह सकते हैं।” लेबर यूनियन ‘यूनाइट हेयर’ ने बयान जारी किया है, “हमारे तीन लाख सदस्यों में 80 से 90 फीसदी सदस्य कोविड-19 से जुड़ी बंदियों और पाबंदियों के कारण अनिश्चत समय के लिए बेकार हो गए हैं।”

अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा राहत पैकेज

बीते 25 मार्च की देर रात दो ट्रिलियन के आर्थिक सहायता पैकेज पर अमरीकी संसद के ऊपरी सदन सीनेट ने मुहर लगा दी है। यह अमरीकी इतिहास का सबसे बड़ा राहत पैकेज है।

एयरलाइन्स उद्योग से जुड़े ट्रेड संगठन एयरलाइन्स फॉर अमरीका ने रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों को लिखे एक पत्र में गुहार लगाई कि संसद में वित्तीय पैकेज पारित किया जाए ताकि साढ़े सात लाख नौकरियों को बचाया जा सके।

लेकिन जो बात साफ़ तौर पर नज़र आ रही है, वो यह है कि मौजूदा संकट से सबसे ज्यादा ग़रीब, कम आमदनी वाले और बेघर लोग प्रभावित होने वाले हैं। ये वो तबका है, जिसका न कोई बीमा हो रखा होता है, न किसी तरह की छुट्टी होती है इनके पास और अच्छी मेडिकल सुविधाएँ इनकी पहुँच से बाहर होती हैं।

2018 के एक आकलन के मुताबिक करीब पौने तीन करोड़ लोगों के पास अमरीका में कोई स्वास्थ्य बीमा नहीं हैं। यह तादाद पूरी आबादी का साढ़े आठ फीसदी है।

ऐसे हालात में नस्ल, लिंग और आप्रवास के आधार पर असुरक्षा की भावना और बढ़ जाती है।

कोरोना वायरस की वजह से ग़रीबों पर पड़ने वाले असर को लेकर तैयार की गई ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट में कहा गया है, “अमरीका में ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले चार करोड़ साठ लाख लोगों के पास इतनी बचत नहीं है कि वो आमदनी नहीं होने की स्थिति में अपना गुज़ारा कर सके। इसके अलावा खाने-पीने की चीजें इकट्ठा करने से भी आर्थिक दबाव पड़ने वाला है।”

इससे भी ज़्यादा बुरा दौर आएगा?

रिपोर्ट के मुताबिक “अमरीका में आर्थिक असमानता आमदनी और संपदा के नस्लीय बंटवारे के साथ जुड़ी हुई है। करीब 21 फ़ीसदी काले लोग और 18 फीसदी हिस्पैनिक लोग यहां ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हैं। वहीं ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले सिर्फ़ आठ फ़ीसदी गोरे लोग हैं।”

राष्ट्रपति ट्रंप ने वायरस को ‘अदृश्य शत्रु’ बताया है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि ईस्टर के मौके पर देश पूरी तरह से खुला रहेगा और हम पुराने अच्छे दिनों की तरफ लौटेंगे। अर्थव्यवस्था और नौकरियों पर पड़ने वाले बुरे असर को देखते हुए कई लोगों का मानना है कि पाबंदियों में छूट देनी चाहिए और नौजवान जिन्हें थोड़ा कम खतरा है, उन्हें काम पर लौटना शुरू करना चाहिए।

ज़्यादातर उम्रदराज लोग इस वायरस से प्रभावित हो रहे हैं लेकिन मृतकों और संक्रमित लोगों की संख्या में इजाफ़े को देखते हुए यह आसान फैसला नहीं होगा।

क्योंकि ऐसा भी माना जा रहा है कि अभी संक्रमण का और बुरा दौर आना बाकी है।

भारत में तो ऐसे आँकड़े आसानी से और सही वक्त पर नहीं मिलते पर अमरीकी आँकड़ों से यहाँ की स्थिति का भी अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।

विनीत खरे, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

बीबीसी हिंदी से सम्पादित व साभार