बस्ती: जब किसानों ने जमींदारों को पानी पिलाया!

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आज़ादी से पहले बस्ती जिले में जमींदारों ने किसानों व मजदूरों को ‘सबक’ सिखाने के लिए यह कहकर कुंओं व तालाबों से पानी लेने पर रोक लगा दी कि उनसे पानी लेने का उनका कोई हक नहीं बनता. लेकिन किसानों ने इस रोक के विरुद्ध अप्रत्याशित रूप से नई रणनीति अपनाकर उलटे ज़मींदारों को ही पानी पिला दिया था.

जब भी वर्षांत आता है, अयोध्या (पहले फैजाबाद) जिले में किसी न किसी बहाने एक सौ चार साल पहले (1920 में 20-21 दिसम्बर को) तत्कालीन अन्यायी ब्रिटिश सरकार के किसान विरोधी कानूनों व नीतियों के खिलाफ अयोध्या शहर में सरयू नदी के किनारे अवध किसान सभा के बैनर पर हुए किसानों के ऐतिहासिक शक्ति प्रदर्शन की चर्चा होने लगती है.

जानकारों के अनुसार ब्रिटिश सरकार द्वारा उस सम्मेलन में शामिल होने से रोकने के लिए बहुविध उत्पीड़नों से जीना दूभर कर देने के बावजूद उसमें विभिन्न जिलों के कोई एक लाख किसानों ने भागीदारी की थी, जो पौष महीने की हड्डियां कंपाती ठंड और आवागमन के साधनों की बेइंतहा दुश्वारियों के लिहाज से एक बड़ी संख्या थी.

इस सम्मेलन के साथ फैजाबाद (अब आंबेडकरनगर) जिले के बिड़हर परगने के उस किसान विद्रोह को भी याद किया जाता है, जो पांच फरवरी, 1922 को गोरखपुर जिले में हुई चौरी-चौरा की ऐतिहासिक कार्रवाई से कोई साल भर पहले हुआ था. इस विद्रोह में किसानों ने कई अत्याचारी देसी तालुकेदारों व जमीनदारों की कोठियां व कोठार लूटकर उन्हें फूंक डाला था.

लेकिन जानें क्यों, किसी को भी पड़ोस में (तत्कालीन अवध सूबे की परिधि पर) स्थित बस्ती जिले में 1936 में शुरू हुए किसानों के उस ‘निजाई बोल’ आंदोलन की याद नहीं आती, जो किसी भी तरह बगावत से कम नहीं था और इस मायने में लासानी था कि उसने आजादी के बाद भी सामंतों, भूस्वामियों व जमींदारों की जान का दुश्मन बनकर उनकी नाक में दम किये रखा था.

निजाई बोल आंदोलन

इस ‘निजाई बोल’ आंदोलन को पूरी तरह स्वत: स्फूर्त कहना तो सही नहीं होगा, लेकिन उसके पीछे किसानों की कोई बड़ी सांगठनिक शक्ति नहीं थी. फिर भी अपनी जोत वाली कृषि भूमि के स्वामित्व के लिए तरस रहे किसान व खेत-मजदूर इस बैनर पर एकजुट होकर स्वामित्व की मांग करने लगे तो जमींदारों से उनका टकराव इतना बढ़ गया कि आगजनी व लूटमार जैसी वारदातों में बीच उन्होंने कई जमींदारों की हत्या कर दी. इस टकराव में कई किसानों व खेत-मजदूरों को भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. कई महिलाओं को इस सबकी कीमत अपने साथ बदसलूकी व बलात्कार से चुकानी पड़ी, सो अलग. ज़मींदार इसके बावजूद कभी आधी मजदूरी पर काम कराने और कभी बेगार लेने से बाज नहीं आए तो बात और बिगड़ गई.1939 आते-आते जमींदारों और बटाईदार किसानों के बीच लगान की दर को लेकर टक्कर में दोनों पक्षों में खेतों में ही लाठियां व बल्लम चलने और खून-खराबा होने लगा.

लेकिन जमींदारों ने जैसे न सुधरने की कसम खा रखी थी. उन्होंने किसानों से अन्य करों के अलावा हथियाही (जमींदार द्वारा हाथी खरीदने के लिए वसूला जाने वाला कर) और बियाहू (जमींदार द्बारा अपनी बेटी के विवाह के खर्च के लिए वसूला जाने वाला कर) की भी कड़ाई से वसूली शुरू कर दी. साथ ही किसानों व मजदूरों को ‘सबक’ सिखाने के लिए यह कहकर कुंओं व तालाबों से पानी लेने पर रोक लगा दी कि उनसे पानी लेने का उनका कोई हक नहीं बनता.

खून-खराबे का दौर

लेकिन किसानों ने इस रोक के विरुद्ध अप्रत्याशित रूप से नई रणनीति अपनाकर उलटे ज़मींदारों को ही पानी पिला दिया. एक जमींदार पर तो उनकी यह रणनीति बहुत भारी पड़ी. हुआ दरअसल यह कि अनेक किसान एकत्रित होकर जमींदार के एक तालाब के किनारे स्थित बाग में छिप गये जबकि कुछ अन्य तालाब से पानी लेने लगे. ज़मींदार को सूचना मिली तो उसने अपने कारिंदों के साथ वहां आकर उन्हें रोक दिया. इस पर उन्होंने पहले उससे हाथ जोड़कर चिरौरी की, फिर उसके पैर पकड़ लिये. उसके ही नहीं, कारिंदों के भी. तभी बाग में छिपे किसान अचानक निकले और जमींदार व उसके कारिंदों पर हमला बोल दिया. चूंकि चिरौरी करने वाले किसानों ने उनके पैर बहुत कसकर पकड़ रखे थे, वे उन्हें छुड़ा कर अपना बचाव भी नहीं कर सके. अंततः किसानों ने जमींदार व उसके कारिंदों को मारकर शव उसकी हवेली के गेट पर फेंक दिये. यह जिले के सारे जमींदारों को उनका ‘संदेश’ था कि अब वे जाग गये हैं और कोई जमींदार उनसे टक्कर लेने का साहस न करे. इन किसानों ने जमींदारों द्वारा साम्प्रदायिक व धार्मिक आधारों पर किसानों व मजदूरों के शोषण के खिलाफ भी मोर्चे खोले और हिंसक आंदोलन किए. यह आंदोलन कभी तेज तो कभी धीमा होता हुआ आजादी के बाद 1953 तक चलता रहा, जिसमें कभी जमींदार तो कभी किसान जानें गंवाते रहे.

भूमि हथियाओ आंदोलन

इसके 17 साल बाद 1970 में जिले में अचानक नये ढंग का ‘भूमि हथियाओ आंदोलन’ फूट पड़ा जिसमें चमार व मुस्लिम किसान एक होकर आगे आए. इस आंदोलन को उनके द्वारा आर्थिक लाभ व प्रतिष्ठा प्राप्त करने के संघर्ष के तौर पर भी देखा गया और कुछ दिनों तक यह अपने दुश्मनों के लिए बड़े सिरदर्द का कारण बना रहा. लेकिन आगे चलकर नेतृत्व की कमजोरी और कई अन्य कारणों से यह लम्बी उम्र नहीं पा सका.  दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल आफ सोशल वर्क में प्रोफेसर रहे राजेन्द्र सिंह ने अपने एक अध्ययन में (जो अंग्रेजी में पीजेंट मूवमेंट इन उत्तर प्रदेश : एक स्टडी इन पालिटिक्स आफ लैंड ऐंड लैंड कंट्रोल इन बस्ती डिस्ट्रिक्ट-1801-1970 शीर्षक से प्रकाशित है) इन आंदोलनों की बाबत विस्तार से लिखा है. उन्होंने इन आंदोलनों से पहले की किसानों, भूमिहीनों व खेतिहर मजदूरों की उस दुर्दशा का भी अध्ययन किया है, जिसके चलते ये आंदोलन पैदा हुए और दुर्दशा के खात्मे के उपक्रम बने.

प्रोफेसर सिंह के अनुसार इन आंदोलनों से पहले जिले में ऊंच-नीच पर आधारित प्रबल जातीय विभाजन का दौर था. सामंतों व जमींदारों की निगाह में किसान जातियां ‘शूद्र’ थीं तो खेत मजदूर ‘चमार’. इनमें चमारों का उत्पीड़न शूद्रों से भी ज्यादा असहनीय था. ‘ऊंची’ जातियों ने (ज़्यादातर सामंत व जमींदार इन्हीं जातियों से ताल्लुक रखते थे) चमारों को इस कदर अवांछनीय करार दिया था कि वे न सिर्फ अस्पृश्य बल्कि सिर छुपाने के लिए झोंपड़ी बनाने भर की भूमि के लिए भी उसके मालिकों यानी जमींदारों के मोहताज थे. झोंपड़ियों को बनाने में इस्तेमाल होने वाली लकड़ियां वगैरह भी उन्हें जमींदारों से ही मांगनी या उनके जंगलों व बागों से चोरी से काट लानी पड़ती थीं. इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि 1929 में जिले में जो भूमि बंदोबस्त हुआ, उसमें जिले भर में चमार जाति के लोगों के पास कुल 29 एकड़ ही भूमि थी, जबकि उनकी संख्या कुल जनसंख्या की 17 प्रतिशत थी यानी उच्च जातियों से मुकाबले कई गुनी.

असमानता की संस्कृति

इस कई गुनी जनसंख्या में शामिल लोगों के पेट की आधी-अधूरी आग बुझाने के लिए अनाज और प्यास बुझाने के लिए कुएं के पानी के बदले उनके सारे परिवार के श्रम पर तो जमींदारों का अधिकार था ही, उनके पढ़ने-लिखने, मंदिर जाने और पूजा-पाठ करने की इजाजत भी उनकी ‘कृपा’ पर ही निर्भर थी. इस हद तक कि जमींदार जब भी चाहें, अपनी भृकुटियां टेढ़ी कर उन्हें बेदखल यानी इस सबसे वंचित कर देते थे. कोई ‘रहमदिल’ मालिक उनकी किसी हुक्मउदूली से ख़फ़ा होकर उनकी बेदखली पर उतर आये तो उन्हें उसकी रहमदिली से मिली सहूलियतें भी समाप्त हो जाती थीं क्योंकि नया जमींदार उन्हें जारी रखना गवारा नहीं करता था. दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी स्थिति क्रीतदासों से भी बदतर थी. प्रोफेसर राजेंद्र सिंह ने अपने अध्ययन में इन्हें ‘असमानता की संस्कृति’ का शिकार और ‘हिंदू प्रतीकवाद’ का कैदी बताया है. ऐसे कैदी, 1930 से पहले जिनको सामाजिक न्याय अथवा मुक्ति दिलाने का एक भी प्रयास नहीं हुआ. इतना ही नहीं, खुद उनकी ओर से भी इस कैद का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ. कारण यह कि वे खुद भी अपनी दुर्दशा को दैवीय और इस या उस जन्म के कर्मों का फल मानने को अभिशप्त थे. उनका मानस ऐसा बना दिया गया था कि उनको यही ‘वे आफ लाइफ’ लगता था और अन्यायियों को इंगित करने तक से परहेज़ था. वह डर के चलते हो या बेबसी के. दूसरी ओर असमानता की संस्कृति भाषा तक में गहराई तक जड़ें जमाये हुए थी और उसने पशुओं व पेड़ पौधों को भी जातियों का प्रतीक बना रखा था. इसके तहत ब्राह्मण सांड़ थे, ब्राह्मणियां गाय और क्षत्रिय शेर जबकि चमार मेंहदी के झाड़.

यों बदले हालात

इस स्थिति में बदलाव के प्रयासों का पहला झोंका 1919 में आया, जब महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार बस्ती जिले का दौरा किया. इसके अगले साल जिले में कांग्रेस की कमेटी भी गठित हो गई, लेकिन अगले दस साल तक प्रयासों का झोंका बस झोंका ही बना रहा. इन प्रयासों को गति 1930 में मिली, जब बदलाव के आकांक्षी कुछ युवा कांग्रेस में आये और उसे नये सिरे से सक्रिय करने में लगे. फिर तो जो ‘चमार’ अब तक दीन-हीन बने हुए थे, शूद्रों से मिलकर संघर्ष पर उतर आए. अनंतर, 1935 में महात्मा गांधी फिर बस्ती आये और कांग्रेस की अछूतों, निम्न वर्गों व गरीबों की समर्थक छवि मजबूत कर गए. लेकिन इसके बाद किसानों व खेत-मजदूरों का आंदोलन शुरू हुआ तो उसकी लगाम कांग्रेस के हाथ नहीं रह गई. जल्दी ही उसने हिंसक होकर विद्रोह की शक्ल अख्तियार कर ली.

(लेखक कृष्ण प्रताप सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं.)

साभार : द वायर