‘विकास’ के ढोल के बीच नौकरियां घटती रहीं, बेरोजगारी भयावह स्थिति में!

उदारीकरण-वैश्वीकरण की बयार के साथ “विकास” का जो माडल आगे बढ़ा, उसमें रोजगार घटते गए। स्वरोजगार का फंडा युवाओं के लिए धोखा साबित होता रहा। यह पूरा दौर रोजगार विहीन विकास का दौर है!…
उदारीकारण यानी मेहनतकश जनता की बर्बादी के तीन दशक –पाँचवीं किस्त
विकास मतलब रोजगार विहीन विकास का दौर
भारत में रोजगार, खास तौर पर संगठित/नियमित रोजगार तेजी से घटते हुए आज बेहद सीमित हो गया है। 1991 के बाद से कुल संगठित रोजगार का टोटा या बेरोजगारी का तांडव बदस्तूर जारी है। विदेशी पूँजी बड़ी मात्रा में भारत आई परंतु रोजगार घटता गया, खासतौर पर सार्वजनिक यानी सरकारी क्षेत्र में। फैक्ट्रियों की संख्या तो बढ़ती गई, लेकिन नौकरियां घटती रहीं।
1991 से 2014 तक के हालात की बानगी…
पिछले तीन दशक के दौरान रोजगार की हालत ज्यादा खस्ता हुई…
1983 से 1993 के मध्य के 10 वर्षो में रोजगार 2.1 फीसद की दर से बढ़ा था। इसके बाद के 10 वर्षो में यह वृद्धि दर घटकर 1,9 फीसद रह गई। खेती में श्रम-शक्ति का अनुपात घटकर 55 प्रतिशत के करीब आ गया है। आईटी और वित्तीय क्षेत्र ने 40 करोड़ से ज्यादा की श्रम-शक्ति में महज 60 लाख रोजगार मिला।
1991 में कुल संगठित रोजगार 50 करोड़ से ज्यादा था, किंतु देश की कुल श्रम शक्ति में महज 3.63 करोड़ था। 2001-02 में मामूली बढ़त के साथ श्रमशक्ति चार करोड़ हो गई। 2009-10 तक यह संख्या घटकर 3.88 करोड़ हो गई।
2014 के बाद – मोदी सरकार का दौर
कई दशकों में मोदी राज पहला ऐसा दौर है जब सबसे अधिक रोजगार खत्म हुए। नई भर्तियाँ लगभग बंद हैं, कोढ़ में खाज यह कि नौकरियों से लोग बड़े पैमाने पर निकाले गए। यहाँ तक कि सरकारी क्षेत्र में 30 साल की नौकरी या 50 साल उम्र पूरी करने वाले कर्मियों-अधिकारियों को जबरिया सेवानिवृत्ति योजना लागू करके छँटनी बढ़ गई है।
सरकारी क्षेत्र में छँटनी या रिटायरमेंट के साथ उक्त पद भी मृत (खत्म) हो रहा है। जबकि अधिकारी संवर्ग (ब्यूरोक्रेट) में भर्ती अब सीधे कॉर्पोरेट (निजी कंपनियों) से होने लगी है। ऐसे में निजी क्षेत्र में रोजगार की स्थिति और बुरी होनी ही है।
रोजगार की कमी तो पहले से थी लेकिन उसके अभूतपूर्व विनाश ने जबरदस्त मार की। भाजपा नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार और राज्य सरकारों का सारा ध्यान नौकरी देने कि बजाय इस ओर है कि कैसे आंकड़ों को छुपाया जाए। 2018 से मोदी सरकार ने बेरोजगारी के संबंध में आँकड़े देना ही बंद कर दिया।
कुछ आंकड़ों पर गौर करें-
★ देश में 2011-2012 और 2017-2018 के बीच छह साल के दौरान 90 लाख नौकरियां घटी -अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की रिपोर्ट।
★ 2017-18 में बेकारी की दर 6.1 फीसदी यानी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर- एनएएसओ (सरकारी एजेंसी)।
★ मोदी सरकार के तहत देश की औसत विकास दर 7.6 फीसद रही और बेकारी की दर 6.1 फीसदी, यानी बेरोजगारी की दर आर्थिक विकास दर के करीब है। हालांकि आंकड़े ताकीद करते हैं कि भारत में बेकारी की दर 15 से 20 फीसद तक हो सकती है।
★ फरवरी 2019 में बेकारी की दर 7.2 फीसदी के रिकॉर्ड स्तर पर – सीएमआइई (प्रतिष्ठित निजी एजेंसी)।
★ दूरसंचार क्षेत्र में अधिकांश कंपनियों ने कारोबार समेट लिया या विलय (आइडिया-वोडाफोन, भारती-टाटा टेली आदि) हुए, जिससे 2014 के बाद हर साल 20.25 फीसद लोगों की नौकरियां गईं, (करीब दो लाख रोजगार खत्म)।
★ बैंकों के विलय, बैंकिंग में मंदी, बकाया कर्ज में फंसे बैंकों के विस्तार पर रोक के बहाने रोजगार खत्म हुए (सरकारी क्षेत्र की बीएसएनएल व डाक विभागों की ताज़ा स्थिति सामने है।
★ पिछले पांच साल में भारी पैमाने पर उद्योगों में अधिग्रहण, मंदी और पुनर्गठन से रोजगारों में कटौती हुई है; जबकि नए दौर के रोजगार दाता रहे आईटी क्षेत्र व सॉफ्टवेयर उद्योग में बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म हुईं।
★ संगठित व असंगठित क्षेत्र में नोटबंदी और जीएसटी के कारण लाखों लोग बेरोजगार हुए।
नोटबंदी से बढ़ी बेकारी के कई नमूने हैं; मिसाल के तौर पर, मोबाइल फोन उद्योग के मुताबिक, नोटबंदी के बाद मोबाइल फोन बेचने वाली 60 हजार से ज्यादा दुकानें बंद हुईं; छोटे कारोबारों में 35 लाख (मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन सर्वे) और पूरी अर्थव्यवस्था में अक्टूबर, 2018 तक कुल 1.10 करोड़ रोजगार खत्म हुए हैं (सीएमआइई)।
★ पूरी अर्थव्यवस्था में अक्टूबर, 2018 तक कुल 1.10 करोड़ रोजगार खत्म हुए (सीएमआइई)।
★ साल 2016 में उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर 47.1 प्रतिशत थी। वहीं, 2017 में यह 42 प्रतिशत और 2018 में 55.1 प्रतिशत थी। 2019 में और खराब दौर रहा, उच्च शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी दर बढ़कर 60 फीसदी तक पहुंच गई।
★ ईपीएफओ यानी पीएफ अकाउंट के खुलने और बंद होने के आधार पर देखें तो दिसंबर 2019 में 67 लाख और दिसंबर 2020 में 70 लाख पीएफ अकाउंट बंद किए गए थे। आंकड़ा विशेषज्ञ बताते हैं कि सबसे ज्यादा नौकरी 20 से 29 साल के युवाओं की गई।
★ केंद्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों के आंकड़ों पर किये गए अध्ययन के अनुसार रिक्त पदों कि संख्या 60 लाख से अधिक है (2021)। बैंकों में दो लाख से अधिक क्लास-4, क्लास-3 और ऑफिसर कैडर के पद रिक्त हैं।
★ देश में बेरोजगारी की वजह से 2016 में 2,298 तो 2019 में 2,851 लोगों ने आत्महत्या की, यानी 2016 की तुलना में 2019 में आत्महत्या के मामले 24 फीसदी बढ़े -राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)।
कोरोना के दौर में बेरोजगारी भयावह-
कोरोना काल में बड़ी संख्या में लोगों की नौकरियां चली गईं। साल 2020 में 25 मार्च को देशभर में अनियोजित (मनमाना) लॉकडाउन लगने के बाद देश में अप्रैल महीने में 23.52 फीसदी की दर से रिकॉर्ड बेरोजगारी हुई। 20 फीसदी परिवारों की आमदनी अप्रैल-मई 2020 में पूरी तरह खत्म हो गई थी।
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2020 से भारत में लगाए गए सख्त लॉकडाउन ने करीब 10 करोड़ लोगों से रोजगार छीन लिया। इनमें 15 फीसदी को साल खत्म होने तक काम नहीं मिला। जबकि करीब 47 फीसदी महिलाएं पाबंदियां खत्म होने के बाद भी रोजगार हासिल नहीं कर पाईं।
कोरोना की दूसरी लहर में संकट पहले से और भयावह हो गया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआई) के अनुसार दूसरी लहर में एक करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। इस साल देशव्यापी बेरोजगारी दर अप्रैल में 8 प्रतिशत तो वहीं मई में 12 प्रतिशत रही। सीएमआईई के अनुसार अप्रैल 2021 में करीब 75 लाख नौकरियां गई हैं।
सीएमआईई के अनुसार कोरोना की पहली लहर में संगठित और असंगठित क्षेत्र मिलाकर करीब 12 करोड़ लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। युवाओं और महिलाओं को ज़्यादा बड़े स्तर पर बेरोज़गारी का सामना करना पड़ रहा है। 20 वर्ष से 24 वर्ष की आयु वाले शहरी युवाओं में 37.9 प्रतिशत बेरोज़गार हैं।
सीएमआईई की रिपोर्ट बताती है कि भारत में वेतनभोगी नौकरियों में 2020-21 में 9.8 मिलियन की कमी आयी। भारत में 2019-20 में कुल 85.9 मिलियन वेतनभोगी नौकरियां थीं, जो मार्च 2021 के अंत तक कम होकर 76.2 मिलियन हो गईं।
लॉकडाउन के दौरान ही होंडा मोटरसाइकिल, होंडा कार, हीरो मोटरसाइकिल, टोयोटा किर्लोस्कर मोटर, जनरल मोटर्स, टाटा मोटर्स, माइको बॉस, एचपी इंडिया आदि ने वीआरएस स्कीम के जरिए स्थाई कर्मचारियों की संख्या कम कर दी।
दूसरी लहर ने करोड़ों माध्यम वर्गीय परिवारों को गरीब परिवारों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। प्यू रिसर्च सेंटर के आंकड़ों के मुताबिक पहली लहर में तीन करोड़ 20 लाख मिडिल क्लास लोगों को भी गरीब बना दिया।
असंगठित क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित
लॉक डाउन के दौरान सबसे ज्यादा प्रभावित असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर हुए हैं।
कोविड 19 महामारी और पिछले लॉकडाउन के दौरान करीब 13 करोड लोगों की नौकरीयां गई थी। इनमें से करीब 75% लोग दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले थे या दूसरे असंगठित क्षेत्र में कार्यरत थे।
आंकडे… बोलते… हैं !
★ भारत में कुल 585 लाख कारोबारी प्रतिष्ठान हैं- जिनमें 95.5 फीसद में कर्मचारियों की संख्या पांच से कम है -छठी आर्थिक जनगणना 2014।
★ कुल 1,91,063 फैक्ट्री में से 75 फीसद में कामगारों की संख्या 50 से कम है – एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज (2015-16)।
रोजगार की भरमार है!
बेरोजगारों की इस रिजर्व फ़ौज को संघ-भाजपा ने ज़रूर रोजगार दिया है। आईटी सेल में भर्ती के साथ दैनिक भत्ते पर गोरक्षक बनकर, तो कहीं पार्कों में वैलेंटाइन डे मनाते जोड़ों के खिलाफ डंडा भाँजते फिर रहे युवा, सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों के लिए ट्रोलिंग कर विषवमन कर रहे ट्रोल्स, ये सब बेरोजगारों की बड़ी फौज के ही अंश हैं।
युवा हुए “स्टैन्ड अप”
विगत चार दशक में स्वरोजगार के झुनझुने की हकीकत और भी भयावह है। पीएम मोदी द्वारा ‘आत्मनिर्भर भारत’ का शिगूफा छोड़ने के बीच देश में मज़दूरों की छंटनी का दौर तेजी से बढ़ रहा है। ‘स्टार्टअप इण्डिया’ कम्पनियों में छंटनी की बयार के साथ 72 फीसदी एमएसएमई ने छंटनी का ऐलान किया।
जवाहर रोजगार योजना से स्टार्टअप तक
1980 के दशक से मोदी काल तक रोजगार की जगह स्वरोजगार का झुनझुना पकड़ाने का सिलसिला लगातार दिन दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से आगे बढ़ते हुए स्टार्टअप, स्टैंडअप, स्किलइण्डिया तक जा पहुँचा। 1980 से वैश्विक लूट के नए दौर की शुरुआत से अबतक देखें-
★ शिक्षित बेरोजगार योजना ★ राजीव गाँधी स्वावलंबन रोजगार योजना ★ जवाहर रोजगार योजना (1989) ★ प्रधानमंत्री रोजगार योजना (1993) ★ स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (1999) ★ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (2006) ★ राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन, 2011 ★ राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन, 2013।
मोदी सरकार के दौरान स्थाई रोजगार के रास्ते बंद करके एक तरफ फिक्स्ड टर्म, नीम ट्रेनी आ गया, तो दूसरी और कथित स्वरोजगार कार्यक्रमों की धुआंधार बारिश होती रही…
★ प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (2015) ★ स्टार्टप इण्डिया, स्टैंड अप इंडिया (2016) ★ प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (2016) ★ पहले ही फेल हो चुकी 1993 के प्रधानमंत्री रोजगार योजना की पुनः शुरुआत (2017)
मोदी सरकार ने मुद्रा लोन शुरू की। लोन पहले भी मिलते थे बस उनका नाम बदल कर मुद्रा लोन कर दिया गया है। यह लोन भी वही 26 से 27 हजार रुपये तक के हैं, जिनमें कितने रोजगारों का सृजन हो सकता है यह सहज सोचा जा सकता है।
उदारीकरण के इस दौर में जब तमाम कम्पनियां ध्वस्त हो रही हैं, बड़ी पूँजी अपने से छोटी पूँजी को निगल जा रही है, तब बेहद छोटी पूँजी के स्वरोजगार का हस्र क्या हो रहा है, उसके भी परिणाम सामने हैं! अधिकांश बड़े स्टार्टअप बंद हो चुके हैं या उनका अधिग्रहण हो गया है।
इस पूरे दौर में छंटनी-तालाबंदी-बंदी के साथ स्थाई रोजगार छिनते गए, सरकारी पद मृत होते गए। नोटबंदी व जीएसटी ने रही-सही कसर भी निकाल ली। और युवा वाकई “स्टैंड अप” हो गए।
क्रमशः जारी…
अगली किस्त में पढ़ें- उदारीकरण की जनविरोधी नीतियाँ लागू होने के साथ कैसे भ्रष्टाचार भी तेजी से बढ़ता गया, जर्मन पनडुब्बी, बोफोर्स दलाली से बैंक घोटाले, राफेल दलाली तक कैसे यह विकराल होता गया है…