जन विरोधी नीतियों के खिलाफ SKM व CTU द्वारा 16 फरवरी को देशव्यापी बंद का आह्वान, मासा ने दिया समर्थन

संयुक्त किसान मोर्चा व केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच द्वारा 16 फरवरी को केंद्र व राज्य सरकारों की मजदूर, किसान और जन विरोधी विनाशकारी नीतियों के खिलाफ हड़ताल/बंद के समर्थन में मासा का बयान।

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों / फेडरेशनों / एसोसिएशनों के संयुक्त मंच द्वारा आगामी 16 फरवरी को केंद्र की मोदी सरकार व राज्य सरकारों की मजदूर, किसान विरोधी और जन विरोधी विनाशकारी नीतियों के खिलाफ औद्योगिक क्षेत्रीय हड़ताल और ग्रामीण बंद का समर्थन करते हुए बयान जारी किया है।

मासा द्वारा जारी बयान

मासा की केन्द्रीय समन्वय समिति द्वारा 25 जनवरी को जारी बयान लिखा है कि संयुक्त किसान मोर्चा और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों/फेडरेशनों/एसोसिएशनों के संयुक्त मंच ने 16 फरवरी 2024 को केंद्र की मोदी सरकार की मजदूर व किसान विरोधी और राष्ट्र विरोधी विनाशकारी नीतियों के खिलाफ औद्योगिक क्षेत्र में हड़ताल और ग्रामीण बंद के साथ-साथ बड़े पैमाने पर देशव्यापी लामबंदी का आह्वान किया है तथा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर मजदूर-किसान एकता मजबूत करने के लिए ट्रैक्टर परेड आयोजित करने का भी आह्वान किया है। 

इसी दौरान देश के विभिन्न संघर्षशील मजदूर संगठनों व यूनियनों के साझा मंच – मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) मौजूदा मोदी सरकार और राज्य सरकारों द्वारा देशी-विदेशी पूंजीपतियों (व अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट) के हित में बनाई गई मजदूर विरोधी श्रम संहिताओं को वापस लेने, शिक्षा-स्वास्थ्य सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों का निजीकरण बंद करने तथा बुनियादी क्षेत्र के उद्यमों व सेवाओं का राष्ट्रीयकरण करने, ठेका प्रथा के खात्मे, बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने, न्यूनतम वेतन ₹26000 मासिक, छटनी व तालाबंदी पर रोक और सभी मजदूरों को स्थायी व सुरक्षित सम्मानजनक रोजगार गारंटी देने जैसी मांगों के लिए संघर्ष तेज करने के साथ-साथ देश में बढ़ती फासीवादी सांप्रदायिक नफरत और उसे फैलाने वाली काली ताकतों के विरुद्ध अभियान चला रहा है।

मजदूरवर्ग व समस्त मेहनतकश जनता के लिए सम्मानजनक जीवन और वास्तविक लोकतंत्र हेतु निरंतर, निर्णायक व जुझारू संघर्ष खड़ा करने की दिशा में मासा मजदूर वर्ग की व्यापक एकता कायम करने के लिए प्रयासरत है। मासा द्वारा आगामी 8 फरवरी को देशव्यापी ‘मजदूर प्रतिरोध दिवस’ मनाने के लिए अभियान भी चलाया जा रहा है।

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) 26 जनवरी की ट्रेक्टर परेड और 16 फरवरी को औद्योगिक क्षेत्र में हड़ताल और ग्रामीण बंद का पुरजोर समर्थन करता है। मासा मानता है कि सन् 2014 से देश में फासिस्ट आरएसएस-भाजपा की सत्तारूढ मोदी सरकार एक ओर जहां एकाधिकारी पूंजी, देशी-विदेशी कॉरपोरेट के हित में नग्न होकर मजदूरों के कानूनी अधिकारों को छीनकर मजदूर विरोधी श्रम संहिताएं बनाकर हमला कर रही है, कॉरपोरेट पूंजी द्वारा किसानों की लूट तेज करने के लिए नीतियां बना रही है और वहीं दूसरी ओर दुनिया के कुख्यात तानाशाह हिटलर-मुसोलिनी के फासीवादी तानाशाही की ओर आगे बढ़ते हुए सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले संगठनों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों व विपक्षी नेताओं का दमन कर रही है। मजदूर वर्ग के लिए यह बहुत ही चिंता की बात है।

भारतीय संविधान के तहत मिले जनवादी अधिकारों पर हमला किया जा रहा है। लोकतंत्र में धर्म जहां व्यक्ति का निजी मामला होता है और सरकार व राज्य मशीनरी का चरित्र धर्मनिरपेक्ष होता है, वहां मोदी सरकार बहुसंख्यक सांप्रदायिक नफरत की राजनीति को आगे बढ़ाते हुए अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों के खिलाफ लगातार हिंसा व दमन का रास्ता अपनाए हुए है और इसके ज़रिए मज़दूर वर्ग की एकता और मेहनतकश जनता के बीच सद्भाव को नष्ट कर रही है।

बेशर्मी से जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे से बनाई गई सरकारी संपत्ति और उपक्रमों को मुट्ठी भर निजी कॉरपोरेटों को धड़ल्ले से सौंपा जा रहा है। लोकतांत्रिक संस्थानों को पंगु बना दिया गया है। संवैधानिक संस्थाओं का सांप्रदायिकरण करते हुए उन पर कब्जा किया जा रहा है। केंद्रीय प्राधिकारियों और एजेंसियों का पूरी तरह से दुरुपयोग करने की खतरनाक योजना जारी है। मुख्यधारा की मीडिया को पूरी तरह से पालतू बना दिया गया है और जनपक्षीय पत्रकारिता पर लगातार हमले हो रहे हैं। कठुआ, उन्नाव, बीएचयू, बृजभूषण (WFI) जैसे मामलों से यह भी स्पष्ट हो चुका है कि मोदी सरकार महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने के बजाए बलात्कार जैसे संगीन अपराधों में शामिल अपने ही लोगों को बेशर्मी से बचा रही है।

ऐसी विकट स्थिति में जहां पूर्णतः जन विरोधी सत्तारूढ़ फासिस्ट भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार के खिलाफ साझा संघर्ष तेज करने की सख्त जरूरत है, वहीं मजदूरों को यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि मोदी सरकार का आना और नग्न होकर पूंजीपक्षीय तथा दमनकारी नीतियां व कानून बनाना आजादी के बाद स्थापित हुई शोषणमूलक समाजव्यवस्था के तहत ही बनी विभिन्न सरकारों की जन विरोधी नीतियों की निरंतरता का ही परिणाम है। बड़े-बड़े पूंजीपतियों के हित में ही विदेशी लुटेरे कॉरपोरेट के साथ गठजोड़ किये जा रहे हैं। देशी विदेशी पूंजीवादी कंपनियां मिलकर हमारे देश के साझा प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और मजदूरों का निर्मम शोषण कर रही हैं।

काले कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष के दौरान किसानों के जेहन में यह सच्चाई काफी हद तक आ गई है कि हमारे दुश्मन पूंजीपति और साम्राज्यवादी नीतियाँ हैं, अडानी-अंबानी जैसे देशी विदेशी कॉरपोरेट हैं। परंतु उनमें से अधिकांश इसी शोषणमूलक व्यवस्था के रहते हुए एमएसपी पर फसलों की खरीद का कानून बन जाने, ऋण माफ़ी हो जाने आदि को ही समस्या का पूर्ण समाधान मानने का दिवास्वप्न देख रहे हैं।

हकीकत यह है कि देशी-विदेशी पूंजी के मुनाफाखोरी पर आधारित कृषि उत्पादन का परिणाम ही छोटे और गरीब किसानों की बढ़ती तबाही और बरबादी है। किसानों को मौजूदा समाज व्यवस्था में फसलों का उचित दाम अवश्य मिलना चाहिए, परंतु एक बात याद रखने की जरूरत है कि फसलों का दाम चाहे कितना ही अधिक क्यों न मिल जाए उससे भी मौजूदा शोषणमूलक व्यवस्था के रहते हुए छोटे व गरीब किसानों की तबाही और बरबादी नहीं रुकेगी।

देश की मेहनतकश जनता को शहीद भगत सिंह की सीख को याद रखने की जरूरत है कि मजदूर किसानों के असली दुश्मन पूंजीवाद-साम्राज्यवाद हैं। इसलिए आज जहां मजदूरों किसानों और जनवादी ताकतों को फासिस्ट भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष करने की जरूरत है, वहीं हमें मौजूदा शोषणमूलक समाज व्यवस्था और इसके दमनकारी राज्य तंत्र को भी उखाड़ फेंकने के लिए निरंतर, निर्णायक व जुझारू संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ने की भी सख्त जरूरत है।

मज़दूर वर्ग को केवल जहरीले सांपों को ही नहीं खत्म करना है बल्कि उन्हें जन्म देने वाली सांपों की मां को ही खत्म करना होगा ताकि भविष्य में सांपों का जन्म ही न हो सके। यानि फासीवाद को ध्वस्त करने के लिए अंततः मौजूदा शोषणमूलक समाज व्यवस्था को उखाड़ फेंकना आवश्यक है। तभी मेहनतकश जनता की खुशहाल जिंदगी होगी और वास्तविक लोकतंत्र आएगा जहां मजदूरों को पूंजीवादी शोषण से निजात मिलेगी और किसानों को पूंजी की लूट से आजादी मिलेगी।

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