भगत सिंह की सहयात्री क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के लिखे लेख गायब हैं या गायब किये गए हैं?

सुधीर विद्यार्थी द्वारा प्रस्तुत दुर्गा भाभी के पत्र में क्या है?

आजादी की लड़ाई की क्रांतिकारी धारा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन (एचएसआरए) की योद्धा, शहीद भगवती चरण बोहरा की पत्नी व शहीदे आज़म भगत सिंह की सहयोगी क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के कुछ अहम दस्तावेज़ गायब हैं/गायब कर दिए गए हैं। इस पूरे प्रकरण पर वेबसाइट द लीडर’ हिन्दी में आशीष आनंद ने विस्तार से लिखा है।  

वैसे तो इतिहास में तमाम दस्तावेज गायब हैं या मिल नहीं सके हैं। शहीदे आज़म भगत सिंह द्वारा जेल में लिखी चार पुस्तकें आज तक नहीं मिलीं। …लेकिन यदि कोई किसी क्रांतिकारी से उसका कोई दस्तावेज माँगकर ले जाए और वापस ना करे तो उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? दुर्गा भाभी जैसी महान क्रांतिकारी को झूठा साबित करने वाले के साथ क्या किया जाना चाहिए? निश्चित ही यह गंभीर अपराध है और उसके खिलाफ एक मुहिम बनाना चाहिए। -मेहनतकश टीम

आइए, ‘द लीडर’ हिन्दी में प्रकाशित इस अहम प्रकरण को जानें-

कहां गए भगत सिंह की फांसी के बाद दुर्गा भाभी के लिखे लेख, जिनकी 36 साल बाद हो रही तलाश!

भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के ऐसे दस्तावेज, जो एक तरह से शहीदे आजम भगत सिंह की फांसी के बाद जीते-जागते साक्ष्य हैं, वे तथ्य जिनको शायद अभी तक कोई नहीं जानता। ये दस्तावेज बरसों से “गुम’ हैं, जिनकी तलाश अब शुरू हुई है। अभी साफतौर पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि ये गुम ही हैं या फिर इनको किसी ने छुपाने का अपराध किया है। अब तक सामने आए संकेतों से तो यही लगता है कि यह अपराध ही है।

भारत और पाकिस्तान में जिस तरह भगत सिंह और उनके दल के लिए निर्विवाद तरीके से साझी विरासत मानकर स्वीकार किया जाता है और करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा आज भी हैं, ऐसे में इन दस्तावेजों का सामने न आ पाना गंभीर विषय है। पाकिस्तान का एक समूह तो क्रांतिकारी नायक भगत सिंह पर चले मुकदमे को लेकर फिर से अदालत में चुनौती दे चुका है। ऐसे में भारत के लोगों और भारत सरकार का दायित्व बन जाता है कि “गायब’ दुर्लभ दस्तावेजों को खोजकर सामने लाए।

‘गुम दस्तावेज’ भारत की आजादी को चले क्रांतिकारी आंदोलन की मशहूर नायिका दुर्गा भाभी के लिखे लेख हैं, जिन्हें हासिल करने को वे देहांत से 14 साल पहले तक हाथ-पांव मारती रहीं। इतनी बेचैन रहीं कि उनको पाने के लिए टूटे हुए हाथ से पत्र लिखे, फिर भी मायूसी उनके हिस्से आई।

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गायब सामग्री में दुर्गा भाभी के 1938 में लिखे सात लेख के अलावा संस्था के इतिहास में हुए उतार-चढ़ाव और रफी अहमद किदवई पर लिखे एक-एक लेख हैं। यह लेख उतने ही ऐतिहासिक दस्तावेज हैं, जितने भगत सिंह या अन्य क्रांतिकारियों के लेख। ऐसे ही लेखों की बदौलत क्रांतिकारियों की सोच और ख्वाब दुनिया को पता चले।

दुर्गा भाभी का व्यक्तित्व किसी परिचय का मोहताज नहीं। वही दुर्गा भाभी, जिन्होंने सांडर्स वध के बाद भगत सिंह के हुलिया बदलकर गिरफ्त से निकलने के वक्त उनकी पत्नी का अभिनय कर लाहौर से कलकत्ता भेजने में भूमिका निभाई। क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी पूरे आंदोलन की साक्षी और सहभागी थीं। एक ऐसा किरदार, जिनसे शायद आज मौजूद लोगों को भी मिलने का मौका मिला या फिर तमाम लोग उनसे मिलने से महरूम रह गए।

दुर्गा भाभी 92 साल की लंबी उम्र जीकर 15 अक्टूबर 1999 में गुजरीं। क्रांतिकारी आंदोलन की उन आंखों ने असहयोग आंदोलन, साइमन कमीशन विरोधी आंदोलन, असेंबली बम केस, भगत सिंह-राजगुरु-सुखदेव की फांसी, चंद्रशेखर आजाद की शहादत, तमाम साथियों की गिरफ्तारी-हत्याएं, बाद में चले आंदोलन, फिर वह आजादी जो उनके सपनों का हिस्सा नहीं थी, आजादी के बाद भी वह सब देखा जो अंग्रेजों की हुकूमत में देखा, सांप्रदायिकता और जातिवाद से कुचले जाते लोग, फासिस्ट ताकतों का उभार भी देखा।

बुढ़ापे में उनके साथ एक धोखा हुआ, जिसका मलाल उन्हें अंतिम सांस तक रहा और उनकी कोई मदद भी नहीं कर सका। यह धोखा था उनके लिखे लेखों का सही हाथों तक न पहुंच पाने का। यही लेख अब तलाशे जा रहे हैं।

इस तरह सामने आया रहस्य

क्रांतिकारी आंदोलन पर विशिष्ट लेखन से चर्चित साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी की पुस्तक ‘समय संवाद’ इन दिनों चर्चा में है। पुस्तक में क्रांतिकारियों और साहित्यकारों के 848 ऐतिहासिक महत्व के पत्रों का संकलन है। बीते दिनों ‘इंडिया टुडे’ (11 मार्च 2020) में ‘रोशनी देते पत्र’ शीर्षक से समीक्षात्मक टिप्पणी में इस किताब का जिक्र हुआ और फिर हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अकार’ के 27वें अंक (मई 2021) में विख्यात आलोचक और चिंतक राजाराम भादू ने आठ पृष्ठों के आलेख ‘ब्रिटिश प्रतिरोध की क्रांतिकारी धारा : प्रभाव और परिणति’ में इसकी प्रासंगिकता को रेखांकित किया।

इस पुस्तक में दुर्गा भाभी का सुधीर विद्यार्थी के नाम लिखा एक ऐसा पत्र भी प्रकाशित हुआ है, जिसे पढ़कर कई लोगों के मन में सवाल उठे। यह अंतरदेशीय पत्र उन्होंने 30 अक्टूबर 1985 को भेजा था।

पत्र में उन्होंने बरेली के रणजीत सिंह का हवाला देते हुए लिखा कि रणजीत सिंह सुधीर विद्यार्थी का हवाला देकर उनसे मिले और ऐतिहासिक महत्व के कई दस्तावेज ले गए और उन्हें नकल कराकर वापस करने का वादा करने के बाद भी लौटाए नहीं।

दुर्गा भाभी के भेजे गए पत्र की मूल प्रति की फोटो, गौर से पढ़ें हर शब्द

दुर्गा भाभी ने इसके लिए रणजीत सिंह को दो पत्र उनके बरेली के पते पर लिखे, जिनका उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, न ही सामग्री लौटाई। विवश होकर दुर्गा भाभी ने सुधीर विद्यार्थी को उनके शाहजहांपुर के पते पर पत्र भेजा, ताकि सामग्री वापस मिल सके।

सुधीर विद्यार्थी की पत्रों की पुस्तक प्रकाशित होने के बाद दुर्गा भाभी द्वारा स्थापित और संचालित लखनऊ मांटेसरी इंटर कालेज में भाभी का बनाया ‘स्वतंत्रता संग्राम शोध केंद्र’ और उससे जुड़े सदस्यों के संज्ञान में जब यह आया कि दुर्गा भाभी के लिखे संस्मरण तथा अन्य दुर्लभ ऐतिहासिक सामग्री बरेली के श्री रणजीत सिंह के पास है, तब पूछताछ का सिलसिला शुरू हुआ।

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पता चला कि रणजीत सिंह अब “रणजीत पांचाले’ के नाम से जाने जाते हैं। यह वही रणजीत सिंह हैं, जो कभी नेता जी सुभाष चंद्र बोस के अनुयायी संगठन में सक्रिय रहे और लगभग दो दशक पहले उनकी एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है।

बहरहाल, प्रकरण की जानकारी मिलने पर काकोरी केस के क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री के बेटे उदय खत्री ने 27 मई को रणजीत पांचाले को फोन करके पूछताछ की। जिस पर रणजीत पांचाले ने न केवल ऐसी सामग्री अपने पास होने से साफ इन्कार किया बल्कि यह भी कहा कि दुर्गा भाभी से वे ऐसा कुछ नहीं लाए।

दुर्गा भाभी को साबित किया जा रहा झूठा

संयोग से इसी दिन ‘द लीडर हिंदी’ की ओर से अपरिचित साहित्यकार से पाठकों का परिचय कराने के लिए इंटरव्यू के लिए उनसे संपर्क किया गया। जिस पर रणजीत पांचाले ने कोई विशेष उपलब्धि न होने का हवाला देकर साक्षात्कार के लिए मना कर दिया। फिर इंटरव्यू के लिए जब सुधीर विद्यार्थी से संपर्क किया गया तो उन्होंने भी पारिवारिक समस्या के चलते समय मिलने की बात कहकर टाल दिया। इसी बातचीत के दौरान उनसे रणजीत पांचाले का जिक्र हुआ तो दुर्गा भाभी के पत्र का मामला जानकारी में आया।

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‘द लीडर हिंदी’ की ओर से मैसेज करके जब रणजीत पांचाले से इस बारे में पूछा गया तो उनकी कॉल आई, जिसमें उन्होंने वही बात दोहराई जो उदय खत्री से कही। साथ ही उन्होंने इस मामले को 40 साल बाद उठाने के लिए सुधीर विद्यार्थी और इस लेख के लेखक को भी अनाप-शनाप शब्दों का इस्तेमाल किया। फोन कॉल काटने से पहले नंबर ब्लॉक करने की बात कही और दोबारा कॉल न करने को कहा।

सुधीर विद्यार्थी ने इस प्रकरण पर कहा-

“दुर्गा भाभी का पत्र मिलने पर रणजीत सिंह को पत्र लिखा, लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। यह कोई आश्चर्य की बात भी नहीं है, क्योंकि जब दुर्गा भाभी के पत्रों का जवाब नहीं मिला तो मेरे पत्र का उत्तर कैसे मिलता। शाहजहांपुर से बरेली शिफ्ट होने के बाद जब एक समारोह में मिले तो उन्हें याद दिलाया गया। उसके बाद एक कार्यक्रम में उनको दुर्गा भाभी की भेजी चिट्ठी की फोटो कॉपी भी दी गई, लेकिन जवाब तब भी नहीं मिला। अब दुर्गा भाभी का पत्र पुस्तक में प्रकाशित हुआ तो कई लोगों की जानकारी में मामला आया है। दुर्गा भाभी की वह ऐतिहासिक सामग्री उनके द्वारा स्थापित लखनऊ के शोध केंद्र में रखी जानी चाहिए।”

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क्रांतिकारियों के परिजनों ने जताई नाराजगी

अब यह मामला क्रांतिकारियों के परिजनों और इस धारा से लगाव रखने वालों तक पहुंच गया है, जो इस प्रकरण को गंभीरता से ले रहे हैं। “द लीडर हिंदी’ ने इस मामले में भगतसिंह केस में कालापानी की सजा पर भेजे गए क्रांतिकारी डॉ. गया प्रसाद के बेटे क्रांति कुमार, काकाेरी केस के क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री के बेटे उदय खत्री और भगत सिंह के भांजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह से बात की तो उन्होंने रणजीत पांचाले के कृत्य को “अक्षम्य अपराध’ की संज्ञा दी।

तीनों ही लोगों ने तकरीबन एक सी ही बात कही। उन्होंने कहा-

“सुधीर विद्यार्थी और रणजीत पांचाले के बीच कोई निजी मतभेद हो सकता है, लेकिन इस प्रकरण से यह साफ जाहिर है कि रणजीत पांचाले महान क्रांतिकारिणी दुर्गा भाभी को झूठा बताने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्गा भाभी जब खुद ही पत्र लिखकर रणजीत का नाम लेकर दस्तावेजों के लिए ले जाने की बात कर रही हैं तो क्या वह झूठ बोल रही हैं? उनके पत्र किसी की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और ऐतिहासिक धरोहर हैं, जिनका सामने आना बहुत जरूरी है। इस संबंध में जो भी कार्रवाई करने की जरूरत होगी, जरूर की जाएगी।”

(‘द लीडर’ से साभार)

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