क्रांतिकारी शिव वर्मा की निधन-तिथि (10 जनवरी) पर याद : “मेरा शहर शिव वर्मा का दूसरा घर था”

शहीदे आज़म भगत सिंह के सहयात्री शिव वर्मा, जो ताउम्र मज़दूर वर्ग से जुड़े रहे, क्रांतिकारियों की जीवंत जीवनियों से परिचित कराया। उनकी स्मृति में सुधीर विद्यार्थी का एक संस्मरण….

[शिव वर्मा 1926 में क्रांतिकारी दल ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सदस्य और क्रान्ति के सिपाही बने, जेल गए। आज़ादी के बाद भी मज़दूर वर्ग की मुक्ति के लिए उनका संघर्ष जारी रहा। उन्होंने 1963 में क्रांतिकारी साथियों की कहानी के तौर पर ‘संस्मृतियाँ’ लिखीं। भारत में क्रांतिकारी आंदोलन पर अहम लेख सहित सरल भाषा में काफी कुछ लिखा। मज़दूर साथियों को मार्क्सवाद से परिचय कराने के उद्देश्य से ‘मार्क्सवादी परिचय माला’ की शृंखला बनाई।

उनके निधन-तिथि पर देश के तमाम नमी व अनाम क्रांतिकारियों की जीवनियां लिखने वाले, या यूँ कहें कि देश के क्रांतिकारियों के अर्काइब सुधीर विद्यार्थी का एक अहम संस्मरण मिला, जिसे हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं…. -संपादक]

जन्म- 9 फ़रवरी 1904 : निधन- 10 जनवरी 1997

“मेरा शहर शिव वर्मा का दूसरा घर था” -सुधीर विद्यार्थी

शिव दा! हम 20 वर्षों का संग-साथ भूले नहीं हैं। हमारा शहर शाहजहाँपुर तुम्हारा दूसरा घर था। यहाँ तुम्हारे बड़े भाई अध्यापक बुद्धिसागर वर्मा का आवास था और इसी नगर की आर्डनेंस क्लोदिंग फैक्टरी की मजदूर यूनियन का नेतृत्व तुम वर्षों तक करते रहे जिसमें तुम्हारे पुराने साथी रहे (प्रो.) माशूक अली खां के घर बैठकर हम संघर्ष के उस दौर की न जाने कितनी यादें साझा करते हुए ऊर्जावान होते रहे।

हम ‘संस्मृतियाँ’ पढ़ कर कितने आश्वस्त हुए थे इसे हम कभी बता नहीं पाए। फिर भी हम उसे यादनामा और रेखाचित्र का मिला-जुला रूप ही मानते रहे। तुम्हारे पास यादों की अनोखी बरात थी जो हर बार हमें बहा ले जाती थी। हमारे बीच दलीय राजनीति को लेकर मतभेद भी हो जाते रहे, पर उनका कोई अर्थ नहीं था। यह भी शायद इसलिए रहा आया था कि उन दिनों नक्सलवादी आंदोलन की ओर मेरा झुकाव हो चला था और तुम इससे कतई सहमत नहीं थे।

यही कारण था कि जब कानपुर में शिवकुमार मिश्र ने ऊटी-मद्रास के शहीदों की याद में जो आयोजन किया, उसमें तुम नहीं आये जबकि मैं मथुरा से प्रथम कम्युनिस्ट कांफ्रेंस (1925) के संयोजक सत्यभक्त को लेकर गया था और मुझे ही यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि मैं सूटरगंज जाकर तुम्हें वहाँ लेकर आऊँ। पर यह सम्भव नहीं हुआ जिसका मुझे आज भी पछतावा है।

एक जीवंत क्रांतिकारी के साथ….

हरदोई में जन्मे शिव दा ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ में काला पानी की सजा काटने के बाद भी फरारी की हालत में जब एक बार रामप्रसाद बिस्मिल के हमारे शहर में आकर शहीद की उस माँ के दुर्दिनों में उनसे मिले तब उन लम्हों की उस कठिन दास्तान ने ही हमें तब की अपनी इस कस्बानुमा बस्ती के उस चरित्र से भी परिचित कराया जो ‘बिस्मिल के उस ज़िंदा स्मारक’ (कोख) की देखभाल और संरक्षा नहीं कर सका, जिसके लिए मैं बार-बार लज्जित होता हूँ।

शिव दा, कानपुर में सूटरगंज के मकान के उस दुतल्ले पर तुम्हारे पास हम जब-जब ठहरे तब हमें यही लगता कि वह किसी क्रांतिकारी का नहीं, कलाकार की रिहायश हो। हर चीज करीने से रखी हुई। किताबें, कुर्सियाँ, मेज, टेबल लैम्प, कलमदान, बिस्तर यानी सब कुछ बहुत तरतीब से।

कई बार इसी घर में हमने योगेंद्र वर्मा (तुम्हारे भतीजे) का टिफिन में लाया खाना बाँट कर खाया और हम दोनों आधे पेट रह गए। यहीं भाई जनेश्वर वर्मा के साथ शतरंज खेलते हुए मैंने न जाने तुम्हारी कितनी तस्वीरें चुपके-से उतारीं जिन्हें समय ने पता नहीं कहाँ डुबो दिया है।

इस घर के नीचे के तल में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और पुस्तक-प्रेमियों के लिए भी ‘समाजवादी साहित्य सदन’ के नाम से सुपरिचित अनोखा केंद्र था जिसका ध्वस्त हो जाना हमारे लिए बहुत पीड़ादायक है।

हमें यह भी याद आता है कि लखनऊ के एक जलसे में तुमने मेरी मुलाकात प्रख्यात उर्दू शायर मजाज़ के भाई अंसार हरवानी और उनकी बहन हमीदा से करवायी थी जो मुझे फिर न जाने किधर खींच ले जाती रही। अंसार भाई जेल में तुम्हारे साथ रहे थे और उस रोज अपने वक्तव्य में उनकी तरफ देखते हुए तुमने यह भी कहा था, ‘आओ अंसार भाई, अभी बहुत काम पड़ा है करने को…क्रांतिकारी कभी बूढ़ा नहीं होता।’

शिव दा, स्मृतियों का एक दीर्घ सिलसिला है जिसे कागज पर उतारने का कभी अवकाश मिले तो यह जरूर दर्ज करूँगा कि दुर्गा भाभी के लखनऊ मान्टेसरी इंटर कालेज की इमारत के उन पाँच बड़े कमरों में तुमने ही अपने उद्योग से ‘स्वतंत्रता संग्राम शोध केंद्र’ को भाभी की इच्छानुसार एक खूबसूरत शक्ल सौंपी थी, जो इन दिनों अपने लिए किसी खास चिकित्सक की प्रतीक्षा कर रहा है।

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