अरुणाचल के लोगों का दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन; अधिकारों के रक्षा की मांग

पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल में छह दशक से ज्यादा समय से रहने वाले चकमा और हाजोंग समुदाय के लोग अपने आवासीय प्रमाण पत्र के रद्द करने के विरोध में आंदोलन की राह पर हैं।

पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में छह दशक से ज्यादा समय से रहने वाले चकमा और हाजोंग समुदाय के लोग सरकार द्वारा अपने रेसिडेंशियल प्रूफ सर्टिफिकेट (आरपीसी) यानी आवासीय प्रमाण पत्र के रद्द करने के विरोध में आंदोलन की राह पर हैं। रविवार, 8 जनवरी को इन समुदाय के सैकड़ों लोगों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया और केंद्र की मोदी सरकार से अपने अधिकारों के रक्षा की मांग की।

बता दें कि अरुणाचल प्रदेश में ये दोनों समुदाय बीते लंबे समय से अपने अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं। ऐसे में आवासीय प्रमाण पत्र ही एक मात्र इन समुदायों का आधिकारिक दस्तावोज है जो सरकारी संस्थानों और नौकरियों में इनकी उपस्थिति सुनिश्चित करता है। ऐसा कहा जा सकता है कि ये सर्टिफिकेट इनके पढ़ने और आगे बढ़ने का जरिया है। लेकिन बीते साल 31 जुलाई 2022 को अरुणाचल प्रदेश सरकार ने अपनी एक अधिसूचना में चांगलांग जिले में नए आवासीय प्रमाण पत्र जारी करने से इंकार कर दिया। इसके बाद सरकार ने इस समुदाय के आवासीय प्रमाण पत्र को पूरी तरह से रद्द कर दिया। जिसके खिलाफ ये लोग बीते कई महीनों से लगातार विरोध जता रहे हैं।

जंतर मंतर पर प्रदर्शन में शामिल चकमा और हाजोंग समुदाय के लोगों ने न्यूज़क्लिक को बताया कि सरकार का आरपीसी रद्द करने का फैसला अवैध है और सीधे-सीधे उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। अरुणाचल सरकार पर नस्लीय भेदभाव का आरोप लगाते हुए इन लोगों ने इस समुदाय की अलग से हो रही जनगणना का भी विरोध किया। यहां ज्ञात हो कि 2022 में आवासीय प्रमाण पत्र के निलंबन से पहले अरुणाचल सरकार ने अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ की मांग पर इन दो समुदायों की विशेष जनगणना की घोषणा की थी।

अरुणाचल प्रदेश चकमा स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष दृश्य मुनि चकमा ने जानकारी दी कि पिछले चार दशकों में सरकार ने इन दोनों समुदायों के मूल अधिकारों को छीनने का एक व्यवस्थित प्रयास किया है, जिससे सभी को बहुत परेशानी हुई है। फिलहाल ये आरपीसी कागज ही इन लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है, जिसे सरकार ने बहुसंख्यक तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के लिए निलंबित कर दिया है। दृश्य मुनि चकमा के मुताबिक राज्य की पेमा खांडू सरकार आपसू (अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ) के दबाव के आगे झुक गई।

ध्यान रहे कि अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ और राज्य के स्थानीय समूह अपनी संस्कृति और संसाधनों को बचाने का हवाला देकर चकमा और हाजोंग समुदाय को अवैध प्रवासी मानते हुए इन्हें नागरिकता देने का लगातार विरोध करते रहे हैं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1996 और 2015 में दो अलग-अलग आदेशों में इन दोनों समुदायों के सदस्यों को नागरिकता देने के पक्ष में फैसला सुनाया है। लेकिन राज्य में भारी विरोध के चलते आजतक सरकार इस फैसले को लागू नहीं करवा पाई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) भी चकमा और हाजोंग समुदाय के मानवाधिकारों को लेकर चिंता जता चुका है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कई प्रदर्शनकारियों ने बताया कि आरपीसी मुद्दे पर अरुणाचल प्रदेश सरकार की कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित सबका साथ सबका विकास का घोर उल्लंघन है। क्योंकि अगर चकमा और हाजोंग लोगों को आरपीसी से वंचित किया गया तो उनके लिए राज्य के बाहर उच्च शिक्षा के अलावा, केंद्र सरकार की नौकरियों, विशेष रूप से अर्धसैनिक और रक्षा बलों में आवेदन के रास्ते बंद हो जाएंगे, उनका विकास पूरी तरह से ठप हो जाएगा।

तेजांग चकमा के मुताबिक स्थानीय लोग और सरकार उन्हें बाहर का समझती है और इसलिए उन्हें न तो कोई राशन कार्ड दिए गए हैं और न ही सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए वो लोग योग्य हैं। वे बताते हैं कि जब चकमा और हाजोंग ने लगातार विरोध प्रदर्शन किए तो राज्य सरकार ने पिछले महीने दिसंबर में आवासीय प्रमाण प्रमाणपत्रों की जगह अस्थायी निपटान प्रमाणपत्रों की घोषणा की। लेकिन हम इससे संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि ये पूरे देश में अस्थाई तौर पर रहने वालों के लिए जारी किया जाता है और चकमा- हाजोंग अस्थाई निवासी नहीं हैं वो दशकों से यहां रह रहे हैं।

मालूम हो कि राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ ये समुदाय असहयोग आंदोलन भी कर चुका है। इसके तहत इस समुदाय के सैकड़ों छात्रों ने अपनी कक्षाओं का बहिष्कार किया था, चांगलांग में इस समुदाय द्वारा चलाए जा रहे बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी बंद रहे। हालांकि इस सबके बाद भी सरकार जब टस से मस नहीं हुई तो इन लोगों ने दिल्ली कूच किया और आगे आने वाले दिनों में इस समुदाय के लोग देशभर में अनिश्चितकालिन धरना प्रदर्शन करेंगे।

गौरतलब है कि अरुणाचल प्रदेश में चकमा और हाजोंग जनजाति के मुद्दे पर विवाद काफी पुराना है। चकमा-हाजोंग शरणार्थी वर्तमान बांग्लादेश की चटगांव पहाड़ियों के रहने वाले हैं, जो 1960 में कपताई बांध योजना में अपनी ज़मीनें खोने के बाद भारत आकर बस गए थे। उस समय वे मिज़ोरम के रास्ते भारत पहुंचे थे, जो उस समय असम का लुशाई हिल ज़िला हुआ करता था। चकमा लोग बौद्ध हैं जबकि हाजोंग हिंदू है। देश के विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में भी उनको धार्मिक आधार पर काफी अत्याचर सहना पड़ा था। साठ के दशक में चटगांव से भारत आने वालों में से महज दो हजार हाजोंग और बाकी चकमा थे। भारत सरकार ने ज्यादातर शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश में बसा दिया और इन लोगों को शरणार्थी का दर्जा दिया गया।

साल1972 में भारत और बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के साझा बयान के बाद केंद्र सरकार ने नागरिकता अधिनियम की धारा 5 (आई)(ए) के तहत इन सबको नागरिकता देने का फैसला किया। लेकिन तत्कालीन नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेशन (नेफा) सरकार ने इसका विरोध किया। बाद में यहां बने अरुणाचल प्रदेश की सरकार ने भी यही रवैया जारी रखा। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के जवाब में राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि वह बाहरी लोगों को अपने इलाके में बसने की अनुमति नहीं दे सकती क्योंकि इससे राज्य में आबादी का अनुपात प्रभावित होगा और सीमित संसाधनों पर बोझ बढ़ेगा।

साल 1964 से 1969 के दौरान राज्य में जहां इन दोनों तबके के 2,748 परिवारों के 14,888 शरणार्थी थे वहीं 1995 में यह तादाद तीन सौ फीसदी से भी ज्यादा बढ़ कर साठ हजार तक पहुंच गई। फिलहाल राज्य में इनकी आबादी करीब एक लाख तक पहुंच गई है। ऐसे में स्थानीय संगठनों को डर है कि इस तरह वो अपने ही प्रदेश में अल्पसंख्यक की श्रेणी में आ जाएंगे।

मालूम हो कि अरुणाचल प्रदेश के इलाके को वर्ष 1972 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था। वर्ष 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ (आप्सू) ने चकमा व हाजोंग समुदाय के लोगों को राज्य में बसाने की कवायद के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया। आप्सू का यह विरोध अब तक जारी है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद यह मुद्दा अब तक पूरी तरह सुलझ नहीं सका है। ऐसे में लाखों चकमा और हाजोंग लोगों की जिंदगियां बिना नागरिक अधिकारों के अधर में लटकी हैं और उन्हें अपना भविष्य भी अंधेरे में नज़र आ रहा है। इस समुदाय का एक ही सवाल है कि क्या 50-60 साल पहले विस्थापित हुए परिवार आज भी शरणार्थी ही कहे जाएंगे?

न्यूजक्लिक से साभार

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