मासा अभियान; एक अहम अनुभव: विभिन्न संगठनों के साझा प्रयासों से उत्पन्न हो रही नयी ऊर्जा

यह साझा प्रयास अभी एक अभियान तक सीमित रहा, लेकिन आपसी तालमेल, इंकलाबी प्यार और मैत्री को इसने मजबूती दी जो मज़दूर आंदोलन के भविष्य के लिए एक नई जमीन तैयार कर रही है।

कितना फलदाई होता है, जब कई संग्रामी संगठन किसी एक लक्ष्य के लिए एक साथ चल रहे हों! उससे भी सुखद और आशान्वित करने वाला यह होता है, जब विभिन्न मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ता संगठनबद्ध रूप से एकसाथ अभियान-आंदोलन में लगे हों! ऐसा ही कुछ अहम अनुभव मासा के 13 नवंबर मज़दूर आक्रोश रैली और उसके साझे अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं ने हासिल किए हैं।

आज एक ऐसा दौर है जब देश और दुनिया की पूंजीवादी लुटेरी जमात एकजुट और हमलावर है। वहीं दूसरी तरफ देश और दुनिया की संघर्षशील ताक़तें और पूरा मज़दूर जमात बटा हुआ है और बिखराव का शिकार है। संघर्ष भी अलग-अलग टुकड़े में हो रहे हैं।

जबकि आज देश और दुनिया के मेहनतकश वर्ग और उसकी संघर्षशील ताक़तों को एक साथ एक साझे लक्ष्य के लिए साझे संघर्ष की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत पहले से ज्यादा है।

ऐसे ही समय में मज़दूर वर्ग की देशव्यापी संघर्षशील ताक़तों का एक अहम हिस्सा ‘मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान’ (मासा) के बैनर तले पिछले 6 सालों से आम सहमति के बिंदुओं के साथ साझे संघर्ष की ओर आगे बढ़ रहा है और मज़दूर वर्ग के निरंतर जुझारू और निर्णायक संघर्ष के लिए ठोस प्रयास में जुटा है। यह एक महत्वपूर्ण पहल है।

मासा ने मज़दूर विरोधी 4 लेबर कोड रद्द करने, मज़दूरों के हक़ में कानूनों में संशोधन करने, देश की सरकारी सार्वजनिक संपत्तियों को निजी मुनाफाखोरों को बेचने के खिलाफ़ और मज़दूरों के अधिकार के लिए आगामी 13 नवंबर को मज़दूर आक्रोश रैली का आह्वान किया है।

इस साझा आह्वान और मज़दूर आक्रोश रैली की तैयारी में मासा के सभी घटक संगठन एक साथ आगे बढ़ रहे हैं और अलग-अलग भी तथा संयुक्त रूप से भी अभियान चला रहे हैं जो की बहुत ही महत्वपूर्ण पहल है।

इस अभियान के तहत देशभर में तीन हिस्सों को चिन्हित करके क्षेत्रीय कमेटियां बनाई गई हैं, जिसमें पूर्वी भारत, दक्षिण भारत और उत्तर भारत है। इन तीनों क्षेत्रों में मासा की ओर से ‘13 नवंबर दिल्ली चलो’ अभियान के तहत अलग-अलग तीन कन्वेंशन भी आयोजित हुए। 

इसका एक और महत्वपूर्ण तथा शानदार अनुभव इस रूप में भी सामने आया जब विभिन्न संगठन संयुक्त रूप से एक साथ एक साझे लक्ष्य के लिए अभियान चला रहे हैं।

देशभर में साझा अभियान के तहत पूर्वी भारत में स्ट्रगलिंग वर्कर्स कोऑर्डिनेशन सेंटर (एसडब्लूसीसी), लाल झंडा मज़दूर यूनियन (समन्यवय समिति), आइएफटीयू (सर्वहारा), टीयूसीआई, ग्रामीण मज़दूर यूनियन बिहार द्वारा संयुक्त अभियान चलाया गया। वहीं दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से आइएफटीयू, कर्नाटका श्रमिक शक्ति, सोशलिस्ट वर्कर्स सेंटर तमिलनाडु, एनडीएलएफ (स्टेट कोओर्डिनेशन कमिटी टीएन) अभियानों में जुटे रहे हैं।

उत्तर भारत में मज़दूर सहयोग केंद्र, इंकलाबी मज़दूर केंद्र, आइएफटीयू (सर्वहारा), जन संघर्ष मंच हरियाणा, मज़दूर सहायता समिति, ग्रामीण मज़दूर यूनियन बिहार, इंकलाबी मज़दूर केंद्र पंजाब, ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल, टीयूसीआई आदि घटक संगठन अलग-अलग और संयुक्त अभियान चलाया।

दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में क्रमशः 22-24 सितंबर, 10 से 16 अक्टूबर और 8 से 10 नवंबर तक सघन अभियान चलाया गया। इस साझा अभियान का कार्यकर्ताओं के बीच एक शानदार अनुभव रहा।

हर घटक संगठन के अपने काम करने की पद्धति होती है, सबके अपने-अपने अनुभव हैं, अपने-अपने संगठनों के स्तर पर सभी कुछ न कुछ बेहतर तरीके से कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह एक ऐसा अवसर था जब विभिन्न संगठन के कार्यकर्ता अपने अनुभव को एक दूसरे के साथ साझा कर रहे थे।

आम मेहनतकश मज़दूर आबादी तक व उसके विभिन्न तबकों तक, अपनी बात को, देश के आज के हालात को, मज़दूर वर्ग पर बढ़ते हमले और उसके खतरों को, इसके खिलाफ संग्रामी एकजुटता और निर्णायक संघर्ष की जरूरत को विभिन्न तरीकों से प्रस्तुत करने में काफी हद तक टीमें कामयाब रहीं। जनता के अनुभवों को भी साझे तौर पर कार्यकर्ताओं ने ग्रहण किया।

अभियान के दौरान साथियों ने यह सिद्दत के साथ महसूस किया कि छोटे-बड़े, अलग-अलग संगठन और उसके कार्यकर्ताओं का अनुभव जब एक साथ दर्जनों संगठन मिलकर ग्रहण करते हैं तो वास्तव में वह अनुभव ज्यादा सशक्त होता है और यह ताक़त ज्यादा बड़ी और मजबूत बनती है। इस बात का एहसास और गहरा हुआ है कि वास्तव में मेहनतकश जनता कितनी व्यापक है, उसकी एकताबद्ध ताक़त और संघर्ष की सही दिशा के सामने हमलावर लुटेरी जमात बौनी साबित होगी।

हालांकि इस साझे अनुभव का यह प्रयास अभी एक अभियान तक सीमित रहा है, लेकिन आपसी तालमेल, इंकलाबी प्यार और मैत्री को इसने मजबूती दी है। आज के कठिन, बिखराव व चुनौतीपूर्ण दौर में भविष्य के लिए यह एक नई जमीन तैयार कर रही है, जो संघर्षशील ताकतों की एकता को मजबूत करने में एक हद तक भी सफल हुई है तो भी वह महत्वपूर्ण है।

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका अंक-48 (नवम्बर-दिसंबर, 2022) में प्रकाशित

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