मारुति सुजुकी के एक दशक से अन्यायपूर्ण सजा झेलते मज़दूर नेता सोहन को भी मिली जमानत

18 जुलाई, 2012 की साजिशाना घटना के बाद ग़ैरमुंसिफ़ाना सजा झेलते 13 नेतृत्वकारी साथियों में से समस्त 11 साथियों को जमानत मिल गई, जबकि दो साथियों की दुखद मौत हो चुकी है।

चंडीगढ़। 10 साल से अन्यायपूर्ण उम्रक़ैद झेलते मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन मानेसर के एक और साथी सोहन कुमार को भी आज 20 सितंबर को पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायलय, चंडीगढ़ से कस्टडी आधार पर ज़मानत मिल गई है।

काफी संघर्षों के बाद जेल में बंद समस्त 11 साथियों को अब जमानत मिल चुकी है। जबकि न्याय की उम्मीद में दो साथियों- पवन दहिया व जिया लाल की बीते साल दुर्भाग्यपूर्ण दुखद मौत हो गई थी।

ज्ञात हो कि साथी रामबिलास को 24 नवंबर, 2021 को; साथी संदीप ढिल्लों और साथी सुरेश को बीते 19 जनवरी को; साथी योगेश यादव को 8 फरवरी को; पूर्व प्रधान साथी राममेहर, पूर्व महासचिव साथी सर्वजीत और और प्रदीप गुज्जर की 21 फरवरी को, साथी अजमेर को 23 मार्च को, साथी अमरजीत को 24 मार्च और साथी धनराज को बीते 19 अप्रैल को जमानत मिली थी।

सभी को कास्टडी (यानी जेल में बिताए दिनों) के आधार पर जमानत मिली है। कस्टडी आधार का मतलब जेल में बिताए दिन। जो क़ैदी जेल/सजा के दौरान जितना पैरोल पर घर रहते हैं, उतना दिन जेल अवधि से कम हो जाता है। इस प्रकार जेल में एक निश्चित अवधि बिताने के बाद जमानत देने की बाध्यता बढ़ जाती है।

उल्लेखनीय है कि मारुति सुजुकी, मानेसर के प्रबंधन द्वारा 18 जुलाई, 2012 को प्लांट में साजिशपूर्ण घटना के बाद से 13 साथी ग़ैरमुंसिफ़ाना सजा व अन्याय का दंश झेल रहे हैं। तबसे इनका संघर्ष जारी है। जबकि करीब ढाई हजार स्थाई व अस्थाई मज़दूर बर्खास्तगी के खिलाफ संघर्षरत हैं।

वह संघर्ष, जिसका दंड झेल रहे हैं मारुति मज़दूर

18 जुलाई, 2012 को मारुति सुजुकी, मानेसर प्लांट में हुई साजिशपूर्ण घटना में एक मैनेजर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत का सहारा लेकर कंपनी प्रबंधन व हरियाणा सरकार की मिलीभगत से 148 मज़दूरों को जेल के अंदर डाल दिया गया था।

घटना के बाद से मज़दूरों पर दमन चक्र निरंतर चल रहा था। घटना के बाद रात 12:00 बजे कराई गई एफआईआर के बाद अगले ही दिन से निर्दोष 148 मज़दूरों को जेल की यातनाएं सहनी पड़ी।

18 मार्च 2017 को सेशन कोर्ट गुडगांव द्वारा इस प्रकरण पर अपना फैसला सुनाया गया, जिसमें 117 मज़दूरों को बरी कर दिया गया, 13 अगुआ मज़दूर साथियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। इनमें से 2 साथी पवन दहिया व जिया लाल की इसी साल अकस्मात मृत्यु हो गई थी।

पवन दहिया की मौत लाकडाउन में पेरोल पर घर में खेत में पानी देने के दौरान करंट लगने से जबकि जिया लाल को कैंसर के असाध्य रोग से मौत हुई थी।

लंबे संघर्ष के बाद भी इन साथियों को कोई कानूनी राहत नहीं मिल पाई। उच्च व उच्चतम न्यायालय से भी लगातार जमानत याचिका खारिज होते जाने के बाद एक निराशा का दौर रहा।

इस निराशा में भी सभी मज़दूरों के वर्गीय भाईचारे ने जेल में बन्द साथियों को हताश नहीं होने दिया। मारुति सुजुकी मज़दूर संघ से जुड़ी यूनियनों के साथ साथ अन्य प्लांट के मज़दूरों ने इन साथियों की गैर मौजूदगी में अपना भाईचारे का फ़र्ज़ निभाते हुए इनके परिवारों की देखभाल की। इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले प्रोविजनल कमेटी के साथियों ने भी हर स्तर पर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कोरोना महामारी में मज़दूरों ने अपने 2 अहम साथियों को खोया, लेकिन उस दौरान अन्य सभी साथी भी पैरोल पर अपने परिजनों के साथ रहे। सवा दस साल से ये साथी न्याय की उम्मीद में आस लगाए हुए बिना किए अपराध के सजा काट रहे हैं।

अन्याय के बीच इंसाफ़ का संघर्ष जारी

पिछले एक दशक से देश व दुनिया की तमाम यूनियनों द्वारा एक निष्पक्ष न्यायिक जाँच की माँग पूंजीपतियों और सरकार के गठबंधन से दरकिनार होती रही और मज़दूरों का 10 वर्षों से संघर्ष जारी है। न्यायपालिका तक जमानत याचिका को खारिज करने का करण विदेशी पूँजीनिवेश प्रभावित होना बताती रही। यानी पूरा तंत्र मालिकों के पक्ष में खड़ा है।

काफी मशक्कत से जमानत मिलने के बावजूद अन्यायपूर्ण उम्र क़ैद झेलते इन सभी साथियों की बेगुनाही व बाइज्जत रिहाई के लिए क़ानूनी लड़ाई अभी जारी है। जबकि बर्खास्त मज़दूर आज भी कार्यबहाली व इंसाफ के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

मारुति संघर्ष गाथा: असल में क्या हुआ…

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