जन्मदिवस, 31 जुलाई: प्रेमचंद का प्रासंगिक लेख- डंडा

अब ना कानून की जरूरत है, ना व्यवस्था की, कौंसिलें और एसम्बलियाँ सब व्यर्थ, अदालतें और महकमें सब फिजूल।… मज़दूरों की सभा मज़दूरी बढ़ाने का आंदोलन करती है- दो डंडा! किसानों की फसल मारी गई, कोई मुआवजा नहीं- दो डंडा! तान-तान कर, कस-कस कर।…

डंडा

  • प्रेमचंद

यूं तो इंग्लैंड ने पिछले सौ सालों में बड़ी-बड़ी अद्भुत चीजों का अविष्कार किया, बड़े-बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक तत्वों का निरूपण किया; लेकिन सबसे अद्भुत आविष्कार जो उसने हिंदुस्तानी नौकरशाही के सहयोग से किया है और जो अनंत काल तक उसके यश की ध्वजा को फहराता रखेगा, वह नीतिशास्त्र का यह चमत्कारपूर्ण, युगांतरकारी अविष्कार है, जिसे डंडा शास्त्र कहते हैं। यह बिल्कुल नया अविष्कार है और इसके लिए इंग्लैंड और भारत दोनों ही सरकारों की जितनी प्रशंसा की जाए, वह थोड़ी है।

इसने शासन विज्ञान को कितना सरल, कितना तरल बना दिया है, कि इस अविष्कार के सामने दंडवत करने की इच्छा होती है। अब ना कानून की जरूरत है, ना व्यवस्था की, कौंसिलें और एसम्बलियाँ सब व्यर्थ, अदालतें और महकमें सब फिजूल। डंडा क्या नहीं कर सकता- वह अजेय है, सर्वशक्तिमान है। बस डंडेबाजो का एक दल बना लो, पक्का, मजबूत, अटल दल। वह सारी मुश्किलों को हल कर देगा।

मज़दूरों की सभा मज़दूरी बढ़ाने का आंदोलन करती है- दो डंडा! किसानों की फसल मारी गई, वह लगान देने में असमर्थ हैं, कोई मुआवजा नहीं- दो डंडा! तान-तान कर, कस-कस कर। डंडा सर्वशक्तिमान है- रुपए निकलवा लेगा। कोई जरा भी सिर उठावे, जरा भी चूं करे- दो डंडा! वह युवक कपड़े की दुकान पर खड़ा है, खरीदारी कर रहा है- विलायती कपड़े ना खरीदो, दो डंडा! उसकी इतनी हिम्मत, कि इंग्लैंड की शान में ऐसी अनर्गल बात मुंह से निकाले, ऐसा मारो कि जवान ही बंद हो जाए।

वह देखना, एक स्वयंसेवक शराब-ताड़ी की दुकान पर जा पहुंचा। नशेबाजों को समझा रहा है- दो डंडा! देर ना करो, ताबड़तोड़ लगाओ, खूब कस-कस कर लगाओ। इन सिरफिरों की यही दवा है। जहां कहीं राष्ट्रीयता की, जागृति की, आत्मगौरव की झलक देखो, बस तुरंत डंडे से काम लो। इस मर्ज की यही अचूक दवा है, और इसका आविष्कार किया है- भारत सरकार और अंग्रेजी सरकार ने मिलकर।

कुछ ना पूछिए! कितनी ज़ाफिसनी और परेशानी के बाद यह अविष्कार हो पाया है। इसका पेटेंट करा लेना चाहिए, वरना शायद कोई दूसरी जाति इस पर अधिकार कर बैठे! हालांकि जहां तक हम समझते हैं, भारत के सिवा, जिसने अहिंसा का व्रत ले रखा है, संसार के और किसी भाग में यह अविष्कार उपयोगी सिद्ध न होगा; बल्कि उल्टे आविष्कारों के हक में ही घातक सिद्ध होगा।

आह हा! कितना सुंदर दृश्य है! वहां सड़क पर कई आदमी झंडा लिए, कौमी नारे लगाते चले आ रहे हैं। बच्चे भी हैं, स्त्रियां भी हैं, बूढ़े भी हैं। अपने देश से प्रेम करने के लिए उम्र की कैद नहीं है। इधर लट्ठबंद, भालेबंद और राइफलबंद पुलिस के जवान पैंतरे बदल रहे हैं, जैसे शिकारी कुत्ते शिकार को देखकर अधीर हो जाते हैं, कि कब छूटे और शिकार पर टूट पड़े। जंजीर खोलते-खोलते आफत आ जाती है। बिल्कुल यही हाल हमारे पुलिस के इन सुरवीरों का है। जिनमें अंग्रेजी सार्जेंट तो उबला पड़ता है, बहादुरी का जोश उसके दिल में आंधी की तरह उमड़ा आ रहा है।

हुक्म मिलता है- चार्ज! फिर देखिए इन सूरमाओं की बहादुरी। निहत्थे, सिर झुका कर बैठे हुए, जवान बंद रखने वाले आदमियों पर डंडों और भालों का वार शुरू हो जाता है। और अगर किसी तरफ से एक आद पत्थर आ गया, चाहे वह खुफिया पुलिस वालों ही ने क्यों ना फेंका हो, तो प्रलय हो गया। बस ‘फायर’ का हुक्म मिल गया। धड़ाधड़ बंदूके चलने लगी और लोग पड़ापड़ गिरने लगे और हमारे अफसर लोग, जो ऐसे अवसरों पर तमाशा देखने के लिए अवश्य आ जाया करते हैं, खुश हो-होकर तालियां बजाने लगे। वह क्या बहादुरी है, क्या डिसिप्लिन है, भारत के सिवा संसार में और कहां ऐसे वीर पैदा हो सकते हैं और इंग्लैंड के सिवा और कहां ऐसे जोशीले अफसर और नीतिज्ञ!

तो आजकल डंडे भगवान का राज है! सारे देश में शांति है!! आश्चर्य है, कि इस बीसवीं सदी में और सभ्यता के शिखर पर बैठने वालों के हाथों, भारतवासियों का यह हाल हो रहा है। कौन-सा ह्रदय है, जो आहत और दलित नहीं, कौन-सी आंख है, जो खून के आंसू नहीं रो रही है। शायद हमारे सर्वज्ञ और दयालु विधाता समझते हैं, कि लाठी से चोट नहीं लगती; मगर वास्तव में लाठी की चोट गोली के जख्मों से कहीं अधिक कष्ट साध्य होती है।

पिंडारों का हाल इतिहास में पढ़ा करते थे; पर आजकल जो अनीति हो रही है और प्रजा को जिस तरह कुचला जा रहा है, उस पर तो पिंडारे भी दांतो तले उंगली दबाते; पर अंग्रेजी सभ्यता का एक अंग यह भी है, कि अपनी बुराइयों पर तो पर्दा डाला जाए और दूसरों पर खूब कीचड़ फेंका जाए। घरसाना, वीरमगाम, विलीपार्ले, लखनऊ, मिदनापुर, मुंबई, दिल्ली, कहां तक गिनाएं। यह अंग्रेजी शौर्य और पराक्रम की एक अविश्रांत कथा है।

निहत्थों पर, स्त्रियों पर, बालकों पर, राह चलते पथिकों, पर घर में बैठे हुए प्राणियों पर डंडों का वार करना ऐसे ही, वीर जाति का काम है और अगर कोई इसकी यथार्थ रूप में बयान करने का साहस करे, तो उसके लिए पुलिस की दफ़ाएँ हैं, जेल है, डंडे हैं।

इतना ही नहीं, नीचे से ऊपर तक, पुलिस के छोटे अधिकारियों से लेकर वायसराय और सेक्रेटरी तक एक स्वर से पुकारते हैं- पुलिस का व्यवहार प्रशंसनीय था, उसने बड़े जब्त से काम लिया। फिर कोई लाख कहे, हमारे बड़े से बड़े नेता फरियाद करें, चारों ओर से यही आवाज आती है।

हमें तो इस पुलिस प्रेम में सरकार की दुर्बलता ही का प्रमाण मिलता है। वह पुलिस को हर एक प्रकार से, कायदे और न्याय की परवाह न करके, उसकी नीचता, मनोवृत्तियों को पोषित करके, उसकी पीठ ठोक कर अपने काबू में रखना चाहती है; क्योंकि वह खूब समझ रही है, यह हादसे गए और फिर सर्वनाश हुआ।

जो शक्तियां किराए के मनुष्यों पर अवलंबित होती हैं- जनता के विश्वास, प्रेम और सहयोग पर नहीं- उनका यही हाल होता है। उन क्रूर कथाओं की कल्पना करके रोमांच हो जाता है।…

जून, 1930

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिका, अंक-47 (जुलाई-सितम्बर, 2022) में प्रकाशित

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