सिर्फ स्थाई मज़दूरों का वेतन समझौता क्यों? आख़िर कब तक!

प्लांट स्तर की गतिविधि से आगे बढ़कर अगर स्थाई मज़दूर व यूनियन इलाके के ठेका मज़दूरों के मुद्दे पर संघर्ष करते हुए इलाकाई स्तर पर एकता कायम नहीं करती हैं, तो उनके लिए खुद को प्लांट स्तर पर बचा पाना मुश्किल होगा।…

  • सुमित

आप किसी भी औद्योगिक क्षेत्र में चले जाएं वहां ठेका मज़दूरों और अन्य अस्थाई मज़दूरों का वेतन पिछले 5 से 10 सालों में उसी जगह पर खड़ा है जहां वह पहले था जबकि उत्पादन क्षमता में लगातार विकास हुआ है।

हम अगर बात करें औद्योगिक इलाकों की जहाँ संगठित क्षेत्र में ऑटोमोबाइल उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, स्टील सेक्टर में स्थाई मज़दूरों की बड़ी स्थापित ट्रेड यूनियने हैं, इन सभी सेक्टर में मदर प्लांट में परमानेंट मज़दूरों के वेतन और ठेका मज़दूरों के वेतन में बहुत ज्यादा अंतर है। वेंडर प्लांट में यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है।

प्लांट के अंदर 90 प्रतिशत संख्या ठेका मज़दूरों और अन्य श्रेणी के मजदूरों की संख्या है, सिर्फ 10 प्रतिशत मज़दूर स्थाई हैं। उत्पादन लाइन पर ठेका मज़दूर, ट्रेनी, एफटीसी ज्यादा संख्या में हैं जो स्थाई मज़दूरों के साथ काम करते हैं। इस प्रकार प्लांट के अंदर उत्पादन में ठेका और अस्थाई मज़दूर, स्थाई मज़दूरों के बराबर, बल्कि ज्यादा योगदान देते हैं।

प्लांट में कोई भी औद्योगिक विवाद होने पर स्थाई और ठेका मज़दूर एक साथ यूनियन के समर्थन में खड़े नज़र आते हैं। समझौते के लिए जब प्लांट में दबाव बनाना होता है तब स्थाई मजदूरों को अपने साथी ठेका मजदूरों के सहयोग की ज़रूरत पड़ती हैं क्योंकि उत्पादन लाइन पर इनका ही नियंत्रण होता है। मगर जब प्लांट में वास्तविक वेतन समझौते की बात आती है तो ठेका मजदूरों का मुद्दा स्थाई मज़दूरों के मुद्दे से अलग हो जाता है।

एक ही प्लांट में काम करने वाले 10 प्रतिशत स्थाई मज़दूरों का 3 या 4 वर्षीय वेतन समझौता होता है मगर 90 प्रतिशत संख्या वाले ठेका मज़दूर उस समझौते से बाहर रह जाते हैं। लंबे समय से साथ काम कर रहे ठेका और अस्थाई मज़दूरों के वेतन वृद्धि, पक्की नौकरी इत्यादि पर बात मांग पत्र में सिर्फ लिखी भर जाती है, उसको लेकर स्थाई मज़दूर और उनकी यूनियन प्रबंधन के साथ निर्णायक लड़ाई की दिशा में कभी आगे नहीं बढ़ते हैं जबकि ठेका मज़दूर ही प्लांट के अंदर यूनियन के संख्याबल को मजबूती प्रदान करते हुए, प्रबंधन के खिलाफ लड़ाई को धारदार और तीखा बनाता है।

कंपनी प्रबंधन वेतन समझौते के वक्त तो ठेका मज़दूरों को यूनियन का हिस्सा नहीं मानती मगर जब प्लांट में उत्पादन निकलवाना होता है तब यूनियन के जरिए ठेका मज़दूरों पर दबाव बनाया जाता है, वहीं यूनियन वेतन समझौता को पूरे प्लांट के लिए लागू नहीं करवा पाती है।

होंडा, हीरो जैसी वाहन निर्माता कंपनी हर साल छंटनी के तौर पर 10-15 साल से काम कर रहे हज़ारों पुराने ठेका श्रमिकों को नौकरी से निकाल कर, नए ठेका श्रमिक और एफटीसी और नीम ट्रेनी की भर्ती कर लेती हैं, मगर स्थाई मज़दूरों की यूनियन इसके खिलाफ संघर्ष नहीं करती हैं।

मारुति में औसतन 18-21 साल के युवा ठेका श्रमिकों को 3 साल के लिए भर्ती किया जाता है उसके बाद उसको निकाल दिया जाता है। नतीजा प्लांट के अंदर यूनियन की ताकत और कमज़ोर होती जा रही है, उत्पादन लाइन पर श्रमिकों का नियंत्रण लगभग ख़त्म हो चुका है।

ऐसी स्थिति में जब श्रम कानूनों में मज़दूर विरोधी संशोधन के जरिए स्थाई नौकरी को खत्म करके, प्लांट के अंदर यूनियन की भूमिका को ख़त्म करते हुए, यूनियन बनाने की प्रक्रिया को ही मुश्किल बना दिया गया है, और ठेका मज़दूरी को और संरक्षण प्रदान किया जा रहा है, ऐसे में प्लांट के अंदर ठेका मज़दूरों को छोड़कर, उनके मुद्दे को निर्णायक लड़ाई का हिस्सा बनाए बिना, स्थाई नौकरी को बचाए बिना स्थाई मज़दूरों की यूनियन को बनाए रखना और चलाना मुश्किल है और भविष्य में स्थाई श्रमिकों के वेतन समझौता टेढ़ी खीर साबित हो सकती है।

प्लांट स्तर की गतिविधि से आगे बढ़कर अगर स्थाई मज़दूर और उनकी यूनियन, इलाके के ठेका मज़दूरों के मुद्दे पर संघर्ष करते हुए इलाके के स्तर पर कोई एकता कायम नहीं करती हैं, तो उनके लिए खुद को प्लांट स्तर पर बचा पाना मुश्किल होगा।

कई बड़े ट्रेड यूनियनों और उनके नेताओं की पहली कोशिश होती है कि एक औद्योगिक इलाके में प्लांट स्तर पर उपजे संघर्ष को व्यापक बनाते हुए एक आंदोलन में तब्दील ना होने देना और वहीं प्लांट स्तर पर एक समझौते की शक्ल देकर उसे ख़त्म कर देना ख़ासकर जब संघर्ष यूनियन के सामूहिक नेतृत्व और एक बड़े हिस्से (ठेका मजदूरों और एफटीसी मज़दूरों) के स्थाई रोज़गार के सवाल से जुड़ा हो, इलाके की ज्वलंत समस्या से जुड़ा हो, इलाके में मज़दूर अधिकारों (यूनियन बनाने के अधिकारों और मज़दूरों की स्वतंत्र पहल) को स्थापित करने के सवाल से जुड़ा हो।

देश के मजदूरों की आबादी का 93% असंगठित क्षेत्र पहले ही सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर था और अब मौजूदा श्रम सुधारों के बाद संगठित क्षेत्र के मजदूर भी सामाजिक सुरक्षा से वंचित होने को मजबूर होंगे। बाजार के मुनाफे के आगे श्रम का कोई महत्व नहीं रह गया है, यह मनमानी शर्तों के अधीन हो गया।

तमाम नव उदारवादी हथकंडों और तथाकथित श्रम सुधारों का मक़सद बेरोजगारी में लगातार वृद्धि करते हुए उसको बनाए रखना है। वैश्वीकरण और नवउदारीकरण की व्यवस्था बाज़ार की मांग और खपत यानी बाजारू शक्तियों के मुनाफा चूसने पर टिकी हुई है जो कि लगातार श्रम के दोहन से उत्पन्न होता है जिसका मौजूदा तरीका है समाज में बेरोजगारी बनाए रखना और वास्तविक मजदूरी दर को लगातार नीचे गिराते जाना।

ऐसे परिदृश्य में संगठित क्षेत्र में स्थाई नौकरी को किया जा रहा है और स्थाई और अस्थाई मज़दूर के वेतन के अंतर को खत्म किया जा रहा है।

आज जब केन्द्र में मौजूद फासीवादी सरकार का असली एजेंडा साफ़ हो चुका है कि वे पूंजीपतियों के हित में मज़दूर-किसानों और मेहनतकश आवाम के ख़िलाफ़ किसी भी हद तक जा सकते हैं, ऐसे में प्रतिरोध के किसी भी संभावना को आगे बढ़ाना चाहिए उसे प्रोपेगैंडा के तौर पर जन आन्दोलन के रूप में विकसित करने का प्रयास करना चाहिए।

जिस तरह से श्रम कानूनों में संसोधन हुए और एक लम्बे संघर्ष के बाद हासिल हुए मज़दूर अधिकारों को खत्म किया गया है उसके बाद मज़दूर ट्रेड यूनियन और कानूनी लड़ाई के दायरे में अपनी लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं।

संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिकाअंक-47 (जुलाई-सितम्बर, 2022) में प्रकाशित

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