यह ज़ुल्मतों का दौर है भाई!

जनविरोधी नीतियों से देश के बिगड़ते हालात, पूँजीपतियों को सौगात और आम जनता की तेजी से बढ़ती तबाही के बीच मोदी सरकार का दमन तंत्र और मजबूत होता जा रहा है। …सत्ता के विरोध के हर स्वर को तेजी से कुचला जा रहा है।

गजब का राज चल रहा है। आम जनता के जीने के समान छिन रहे हैं। लंबे संघर्षों से हासिल क़ानूनी अधिकारों पर डकैती बेलगाम है। जनता के खून-पसीने से खड़े सार्वजनिक-सरकारी उद्योग-संपत्तियाँ कौड़ियों के मोल बिक रही हैं और अडानियों-अंबानियों की संपत्तियाँ उछालें ले रही हैं और मेहनतकश जनता कंगाल हो रही है। महँगाई-बेरोजगारी सुरसा के मुहँ की तरह विकराल रूप ले चुकी है।

इसी के साथ दमन का पाटा तेजी से चल रहा है। बुलडोज़र से जनता के घर ही नहीं, सपने-आकांक्षाएं भी ध्वस्त हो रही हैं। सत्ता के विरोध के हर स्वर को तेजी से कुचला जा रहा है। मज़दूरों, मानवाधिकार कर्मियों, अल्प संख्यकों को फर्जी मुक़दमें व जेल मिल रही है, संसद में भी अभिव्यक्ति के हमले तेज हैं।

और यह सबकुछ भयानक सांप्रदायिक जुनून में उलझाकर, मदहोश कर हो रहा है। न्यायपालिका सहित सत्ता के सभी अंगों पर मोदी सरकार के एकाधिकार ने इसे और विकट बना दिया है।

जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार पर सुप्रीम कोर्ट ने पांच लाख का जुर्माना लगा दिया है। जुर्माना 13 साल पुरानी उस याचिका को खारिज करते हुए लगा है, जिसमें उन्होंने दंतेवाड़ा में साल 2009 में 17 आदिवासियों की हत्या के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के खिलाफ सीबीआई जांच की माँग की थी।

मानवाधिकार कार्यकर्ता व पत्रकार तीस्ता सीतलवाड़ और गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी आरबी श्रीकुमार को गुजरात एटीएस ने 25 जून को मुंबई से गिरफ्तार कर लिया। 24 जून को सुप्रीम कोर्ट ने तमाम सबूतों के बावजूद जाकिया जाफरी (गुजरात दंगों में मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की पत्नी) की वह याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें गुजरात दंगों की साजिश के आरोप में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मुक्त करने वाली एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट देते हुये उल्टे जाकिया जाफरी की मदद करने वाली तीस्ता सीतलवाड़ एवं आर बी श्रीकुमार को शिकार बना दिया।

सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार रूपेश कुमार सिंह के पूरे घर की तलाशी के बाद उन्हें 16 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया। वे पेगासस जासूसी का शिकार हैं और सुप्रीम कोर्ट में दर्ज इस मुकदमे में एक शिकायतकर्ता भी हैं।

ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ ताबड़तोड़ फर्जी मुक़दमें लद रहे हैं, ताकि जेल में ही पड़े रहें। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर व अन्य पर मुक़दमें लादे गए।

इलाहाबाद में 12 जुलाई को एक प्रिंटिंग प्रेस मालिक और कार्यक्रम आयोजक सहित पांच लोगों को प्रधान मंत्री के कैरिकेचर को प्रदर्शित करके ”राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक बयान“ बनाने के नाम पर गिरफ्तार किया गया है।

“अपराधियों” को सबक सिखाने या अवैध कब्जे/अतिक्रमण हटाने के बहाने लोगों के सपनों, मकानों-झोपड़ियों और रोजगार के साधनों को ‘‘बुलडोज़र’’ से रौंद कर जमींदोज किया जा रहा है।

धर्मिक उकसावे से माहौल बिगाडने वाली नुपूर शर्मा (जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया) की गिरफ्तारी की माँग को लेकर कई जगह विरोध प्रदर्शन और कुछ जगह हिंसा हुई। इस हिंसा के लिये मुख्यतः जिम्मेदार नुपुर पर मजबूरी में मुकदमा दर्ज हुआ लेकिन हिंसा के लिए मुस्लिमों को ही जिम्मेदार ठहराकर दमन तेज हुआ, मुकदमे दर्ज हुए, गिरफ्तारियां हुईं। साथ ही गैरकानूनी तरीके से बुलडोज़र से कइयों के मकान ध्वस्त कर दिये गये।

रामनवमी में दिल्ली में प्रायोजित दंगों के बाद जहांगीरपुरी इलाके में बुलडोजर चला। उत्तर प्रदेश से लेकर मध्य प्रदेश होते हुए अब कर्नाटक तक भी बुलडोजर की सनक पहुँच गई है।

मोदी सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान जुमलेबाज, शकुनी, जयचंद, लॉलीपॉप, चमचा, तानाशाह, तड़ीपार, पिठ्ठू जैसे शब्दों को असंसदीय व अमर्यादित आचरण घोषित कर दिया है।

यही नहीं, नए फरमान से अब संसद भवन परिसर में धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, अनशन आदि भी प्रतिबन्धित कर दिया गया है।

मोदी सरकार द्वारा देश की शीर्ष संस्था में दबंगई से जनतान्त्रिक अधिकारों को खत्म करने से स्पष्ट है कि सरकार के खिलाफ प्रतिरोध के सभी रास्तों को पूरे देश में खत्म करने की तैयारी है।

ये तो महज कुछ ताजा बानगी हैं। जनविरोधी नीतियों से देश के बिगड़ते हालात, पूँजीपतियों को सौगात और आम जनता की तेजी से बढ़ती तबाही के बीच मोदी सरकार का दमन तंत्र और मजबूत होता जा रहा है। निरंकुशता और साम्प्रदायिकता का घोड़ा बेलगाम दौड़ रहा है। घोषित आपातकाल के भयावह काले दौर से ज्यादा भयानक यह अघोषित आपातकाल का दौर है।

आज चुनौती ज्यादा विकट है। जनता में जुनूनी हद तक सनक पैदा करके असल मुद्दों को भटका दिया गया है। लूटेरी जमात की जगह धर्म के बहाने जनता को जनता का दुश्मन बना दिया गया है।

इससे बाहर निकलकर मेहनतकश जन की संग्रामी एकता के अपने बुलडोज़र से सरकारी व साम्प्रदायिक बुलडोज़र को ध्वस्त किया जा सकता है और करना पड़ेगा!

‘संघर्षरत मेहनतकश’ पत्रिकाअंक-47 (जुलाई-सितम्बर, 2022) की संपादकीय

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