‘लेबर कोड खारिज करो! निजीकरण रद्द करो!’ -मासा का मज़दूर कन्वेंशन 2 जुलाई को कोलकाता में

एक तरफ जब मोदी सरकार और उसकी मीडिया मज़दूर विरोधी 4 लेबर कोड लागू करने का माहौल बना रही है, तब मासा का यह कन्वेन्शन सरकारी मंसूबों के खिलाफ सशक्त आवाज़ है।

कोलकाता। मजदूर वर्ग के संग्रामी ताकत को एकजुट कर पूंजीवाद के खिलाफ निर्णायक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने कदम बढ़ाया है। इसी क्रम में मासा का पूर्वी भारत का मज़दूर कन्वेंशन 2 जुलाई, 2022 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के सुबर्ण बणिक समाज हाल में पूर्वांचलीय कन्वेंशन हो रहा है।

मासा ने मेहनतकश-मज़दूर आवाम को इस मज़दूर कन्वेन्शन में आमंत्रित किया है और इस जंग में कदम से कदम मिलाते हुए आवाज उठाने का आह्वान किया है।

मासा ने कहा कि मालिकों के हित में स्थाई की जगह फिक्स्ड टर्म नियुक्ति, बेरोकटोक ठेकाकरण, वाले लेबरकोड, मज़दूर आंदोलनों के दमन, बेरोकटोक सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण आदि मुद्दों पर सरकार द्वारा मेहनतकशों के खिलाफ जंग के विरुद्ध आवाज़ बुलंद करो!

पूर्वांचलीय मज़दूर कन्वेंशन के लिए जारी पर्चा

अरसे पहले/विगत तीन दशक से पूंजीपतियों की मांगों के अनुसार भारत सरकार ने श्रम कानूनों में सुधार करने का कदम उठाया था। बाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार द्वारा जारी सन 2002 की द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग की सिफारिशों को लगातार विरोधों के बाद आगे की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार कार्यान्वित नहीं कर पाई।

2014 में भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने सत्तासीन होते ही लगातार श्रम कानूनों में परिवर्तन करना तेज कर दिया। वह 2019 में 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को ही खारिज कर चार श्रम संहिताएं लागू करने के लिए आगे बढ़ी। अभी 4 श्रम संहिताएं कानून बन गई हैं। केंद्र व ज्यादातर राज्य सरकारों ने इसकी नियमावली (रूल्स) भी तैयार कर ली है। कुछ राज्यों में बनना अभी बाकी है और यह लागू होने की तैयारी में है।

श्रम संहिताओं के मुख्य बिंदु है-

  1. सरकार ने सभी श्रमजीवियों के लिए न्यूनतम मजदूरी की मांग खारिज कर दी है। ग्रामीण मजदूर, मनरेगा कर्मी, स्वनियुक्त कर्मी, स्कीम वर्कर आदि इसके दायरे में नहीं आएंगे। सरकार ने स्वयं न्यूनतम वेतन के लिए जिस कमेटी का गठन किया था उसी की सिफारिश (दैनिक ₹375) को खारिज कर 2019 में दैनिक ₹178 (सालाना ₹4628 प्रतिमाह) जमीनी स्तर पर न्यूनतम मजदूरी तय किया है।
  2. दैनिक 8 घंटे काम निर्दिष्ट न कर कोड में काम के घण्टे के लिए सरकार के हाथों में अधिकार प्रदान किया गया है तथा फैक्ट्री व संस्थाओं में सर्वोच्च काम का विस्तार साढ़े दस घंटे से बढ़ाकर 12 घंटा कर दिया गया है।
  3. सभी जगह बेरोकटोक ठेकाकरण लागू करने के लिए ठेकेदारों को ही नियोक्ता की स्वीकृति दी गई है। सभी स्थाई प्रकार के कामों पर नियत अवधि के लिए (फिक्स्ड टर्म नियुक्ति) को मान्यता दिया गया है।
  4. 100 के बजाय 300 से कम कर्मी वाले संस्थानों के नियोक्ताओं को काम का घंटा, मजदूरी की दर, अवकाश, अनुशासनात्मक कार्रवाई आदि से संबंधित ‘स्थाई आदेशों’ में छूट मिलेगी। इन संस्थाओं में छँटनी, ले-ऑफ, तालाबंदी के लिए भी सरकार से इजाजत नहीं लेनी पड़ेगी।
  5. बिजली इस्तेमाल करने वाले 20 (व अन्य में 40) से कम कर्मी वाली संस्थाएं फैक्ट्री कानून के दायरे से बाहर रहेंगी तथा मजदूरों के पेशे से संबंधित सुरक्षा व स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होगी। फैक्ट्री, खान, निर्माण, डाक आदि को छोड़कर 90 से कम कर्मी वाले संस्थानों में काम के दौरान मौत हो जाने पर भी सरकार को सूचित करना आवश्यक नहीं होगा।
  6. असंगठित श्रमिकों के सामाजिक सुरक्षा पर भारी भाषणबाजी के बावजूद निर्माण कर्मी, गिग व प्लेटफार्म कर्मी सहित अनौपचारिक क्षेत्रों के मजदूरों को पीएफ, ईएसआई जैसे अधिकारों को अनिवार्य नहीं माना गया है, उन्हें कर्मकार की परिभाषा में भी नहीं रखा गया है।
  7. सिर्फ आवश्यक सेवाओं में नहीं किसी भी संस्था में हड़ताल के 14 दिन पहले नोटिस नहीं देने पर वह गैरकानूनी करार दिए जाएंगे।
  8. अब किसी भी उद्योग में 10% या 100 कर्मी सदस्य बनने पर ही यूनियन पंजीकरण के लिए आवेदन किया जा सकता है।
  9. कोड की धाराओं का उल्लंघन करने पर मालिक पक्ष को सजा मिलना लगभग असंभव बना दिया गया है। ज्यादातर मामलों में नियुक्तियों के खिलाफ अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती है। जबकि मज़दूरों पर मुकदमें, दण्ड के प्रवधान खतरनाक स्तर पर बढ़ा दिए गए हैं।

साथियों, मौजूदा श्रम कानून रहते हुए पूंजीपति वर्ग द्वारा चरम शोषण से मेहनतकशों की दैनिक स्थिति जगजाहिर है। इसके बावजूद भी मजदूरों की नियुक्ति, मजदूरी, तालाबंदी, बेरोकटोक ठेकाकरण व मजदूर आंदोलन का दमन आदि मुद्दों पर मालिक वर्गों की मांगों को पूरा कर सरकार ने मेहनतकशों के खिलाफ जंग छेड़ दिया है।

दूसरी ओर देशभक्त सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा देते हुए कोयला, इस्पात, रेल, टेलीकॉम, विमान, बंदरगाह, बैंक, एलआईसी, रक्षा फैक्ट्री आदि तमाम राष्ट्रीयकृत उद्योगों को चंद मुट्ठी भर बड़े पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है। धर्म, वर्ण, जाति, भाषा आदि के आधार पर हिंसात्मक विभाजन पैदा कर पूंजीपति वर्ग के खिलाफ एकताबद्ध संघर्ष में रुकावट पैदा किया जा रहा है। इन चौतरफा हमलों के खिलाफ बड़े केंद्रीय ट्रेड यूनियन/फेडरेशन ने मजदूर आंदोलन को महज रस्म अदायगी तक सीमित रख दिया है।

अतः मजदूर वर्ग के संग्रामी ताकत को एकजुट कर पूंजीवाद के खिलाफ निर्णायक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) ने कदम बढ़ाया है। आप सभी कदम से कदम मिलाते हुए आवाज उठाएं!

  • श्रम संहिताएं/लेबर कोड खारिज करो! राष्ट्रीय उद्योगों का निजीकरण रद्द करो!
  • पूर्वी भारत के मज़दूर कन्वेंशन को सफल बनाओ!
  • 2 जुलाई, 2022 को, दिन में 1 बजे कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के सुबर्ण बणिक समाज हाल में एकजुटता प्रदर्शित करो!

संग्रामी अभिवादन के साथ,

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)

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