बड़ी जीत: आईटी सेक्टर के कर्मचारी भी औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत कर्मकार -लेबर कोर्ट

हाल ही में चेन्नई की एक लेबर कोर्ट ने टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज के सामूहिक छंटनी से जुड़े विवाद के मामले में एक वरिष्ठ कर्मचारी की सात साल की सेवा के बाद अवैध सेवा मुक्ति को ख़ारिज करते हुए पिछले वेतन सहित सेवा में बहाल करने का आदेश जारी किया है।

आईटी सेवा प्रदान करने वाली कंपनियों में कॉस्ट कटिंग के नाम पर मास ले ऑफ, परफॉर्मेंस के आधार पर अवैध सामूहिक छंटनी के मामलों में इस फ़ैसले से एक अहम प्रभाव पड़ेगा। यह एक प्रकार से पहला मामला है जब आईटी सेवा प्रदान कंपनी वाली कंपनी के किसी कर्मचारी को औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत “श्रमिक” की परिभाषा में माना गया है। इससे पहले कंपनियां बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नौकरी से निकाल देती थी और ये कर्मचारी अपनी सेवा मुक्ति के खिलाफ श्रम न्यायालय में औद्योगिक विभाग नहीं उठा सकते थे क्योंकि आईटी कंपनी के कर्मचारी श्रम कानूनों के दायरे से बाहर माने जाते थे।

चेन्नई के श्रम न्यायालय ने थिरुमलाई सेलवन शनमुगम बनाम टाटा कंसल्टेंसी सर्विस लिमिटेड, चेन्नई के मामले में आईडी संख्या 34/2016 के मामले में अपना अवॉर्ड/निर्णय दिया और आईटी क्षेत्र के कर्मचारियों के श्रम न्यायालय में याचिका दायर करने और अन्याय के खिलाफ राहत पाने के अधिकारों को बरकरार रखा।

अधिकांश आईटी कंपनियां बहुराष्ट्रीय हैं और वे भारी लाभ कमा रही हैं और अत्यधिक जानकारी रखने वाले कर्मचारी उनकी आय का प्रमुख स्रोत हैं। हालाँकि, बाहरी दुनिया केवल यह जानती है कि ये सभी बहुत अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारी हैं, लेकिन तथ्य कुछ अलग है। इन कर्मचारियों पर ” संगठन के रेशनलाइजेशन” “पुनर्गठन” “हल्के संगठन” आदि के नाम पर सभी प्रकार के शोषण किए जाते हैं। सरकार को और श्रम विभाग को आईटी क्षेत्र के इन कर्मचारियों के हितों की रक्षा करनी चाहिए है जो देश के लिए एक बड़ा राजस्व उत्पन्न करते हैं। मगर तमाम दमन शोषण के बावजूद सरकारी महकमा कॉरपोरेट की सेवा करने के लिए ऐसे मामलों में मूक दर्शक बना रहता है।

मगर, इस अन्याय के खिलाफ अब आईटी सेक्टर के कर्मचारियों ने अलग-अलग राज्यों में अपनी ट्रेड यूनियनों को संगठित करना शुरू कर दिया है।

इस मामले में याचिकाकर्ता थिरुमलाई सेलवन शनमुगम को 10.08.2006 को टीसीएस कंपनी में सहायक सिस्टम इंजीनियर के रूप में नियुक्त किया गया था। टीसीएस ने अचानक से 25000 वरिष्ठ कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी और 55000 नए कर्मचारियों की भर्ती की ताकि कंपनी फ्रेशर्स को कम वेतन दे सके। याचिकाकर्ता शनमुगम की सेवा को भी कार्य क्षमता प्रदर्शन के नाम पर 6.2.2015 से समाप्त कर दिया गया था।

इसके बाद, उन्होंने नियोक्ता टीसीएस को सेवा की निरंतरता, बैक वेज और अन्य सभी लाभों के साथ नौकरी पर बहाल करने का निर्देश देने के लिए श्रम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। प्रतिवादी नियोक्ता टीसीएस ने न्यायालय में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता आई.डी. एक्ट 1947 की धारा 2(o) की परिभाषा के अनुसार “श्रमिक” नहीं है और वह सहायक सलाहकार थे और जिनके कार्य प्रकृति में पर्यवेक्षी यानि सुपरवाइजर के हैं। याचिकाकर्ता ने टीसीएस के इस तर्क का विरोध किया और अदालत के समक्ष सिद्ध किया कि वह आईडी अधिनियम, 1947 के प्रावधानों के तहत एक “श्रमिक” है।

माननीय श्रम न्यायालय, चेन्नई के पीठासीन अधिकारी ने सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा है वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि याचिकाकर्ता आई.डी. एक्ट 1947 के अनुसार एक “कर्मकार” है, क्योंकि वह अपने मुख्य कर्तव्य के साथ कुछ प्रमुख भूमिका निभा रहा है, इसलिए वह उसे प्रबंधक नहीं माना जाएगा। इसके बाद, न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि नियोक्ता टीसीएस द्वारा याचिकाकर्ता श्रमिक को जारी किया गया सेवा समाप्ति आदेश भी अवैध है इसलिए इसे रद्द किया जाता है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सेवा की निरंतरता के साथ बहाल करने और सेवा से उसकी बर्खास्तगी की तारीख से उसकी बहाली की तारीख तक पूरा वेतन और अन्य सभी परिचारक लाभ का भुगतान करने का आदेश दिया। यह एक ऐतिहासिक फैसला है और यह आईटी उद्योग के श्रमिकों को विश्वास दिलाएगा कि देश का कानून उन पर समान रूप से लागू होता है।

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