कंप्लान, ग्लूकोन-डी निर्माता Zydus वैलनेस का सितारगंज प्लांट बंद, सैकड़ों मज़दूर बेरोजगार

कैडला की सहायक जयडस वैलनेस देश की प्रमुख व भारी मुनाफे वाली कंपनी है। इसके बावजूद बंदी से साफ है कि रियायतें हड़पकर मनमानी बंदी मुनाफाखोर कंपनियों का खेल बन गया है।

उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के सितारगंज औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल की एक और कंपनी जयडस वैलनेस (Zydus Wellness) प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने 18 जून से कंपनी बंदी का नोटिस चस्पा कर दिया है। इससे कम्पनी के सैकड़ों मज़दूरों के पेट पर लात पड़ गया है।

विस्तरित कारोबार, समृद्ध बाजार, फिर भी सितरगंज प्लांट बंद

1988 में स्थापित, जयडस वैलनेस लि. एक भारतीय उपभोक्ता वस्तु कंपनी है, जिसका मुख्यालय अहमदाबाद में है। यह दवा कंपनी कैडिला हेल्थकेयर की सहायक कंपनी है। जयडस लाइफसाइंस लि. जिसे पहले कैडिला हेल्थकेयर लि. के नाम से जाना जाता था, एक भारतीय बहुराष्ट्रीय दवा कंपनी है जो मुख्य रूप से जेनेरिक दवाओं के निर्माण में लगी हुई है।
जयडस वैलनेस के भारत में 4 स्थानों- अलीगढ़, सितारगंज, अहमदाबाद और सिक्किम में 5 विनिर्माण कारखाने हैं।  भारत, ओमान और न्यूजीलैंड में 8 सह-पैकिंग इकाइयां भी हैं। वर्तमान में जायडस वेलनेस बिजनेस 20 देशों और 3 महाद्वीपों में फैला हुआ है।

इसके ब्रांडों में ग्लूकॉन-डी, शुगर फ्री, एवरयुथ स्क्रब, पील-ऑफ, कॉम्प्लान एवरीथ, नायसिल, शुगरलाइट और न्यूट्रालाइट शामिल हैं। कोविड-19 के दौर में भी इन उत्पादों की बाजार में जबरदस्त मांग रही है। लगातार बढ़ते बाजार और उत्पादों की जबरदस्त माँग व बिक्री के बावजूद प्रबंधन ने 18 जून से सितरगंज प्लांट की बंदी की घोषणा कर दी है।

रियायतें हड़पो, पलायन करो की नीति

दरअसल उत्तराखंड राज्य बनने के बाद औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल की स्थापना 2005 में हुई और उसके बाद से भारी सब्सिडी, सस्ते दरों पर खेती वाली जमीनें और विभिन्न तरीके के राज्य और केंद्र सरकार द्वारा टैक्सों में बेइंतहा छूटें व रियायत दी गई।

10 से 15 साल तक इन कंपनियों ने उन रियायतों का जबरदस्त फायदा उठाया, मज़दूरों के खून पसीने से भारी मुनाफा कमाया और अब मुनाफा बटोरकर तमाम कंपनियां मज़दूरों को बेरोजगार बनाकर एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन कर रही हैं।

पिछले दिनों भारत की एकमात्र कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी एचपी इंडिया भी यहां से चेन्नई पलायन कर गई थी और मजदूर सड़क पर आ गए थे जो अभी भी संघर्षरत हैं। इसी क्रम में जयडस वैलनेस ने भी बंदी का नोटिस लगाया है।

नोटिस में आर्थिक नुकसान का बहाना

जयडस प्रबंधन द्वारा लगाए गए नोटिस में लिखा है कि सितारगंज यूनिट में बनाए जाने वाले कॉम्प्लान, ग्लूकॉन-डी, कुकीज जैसे उत्पाद संपूर्ण भारत से कच्चा माल मंगा कर बनाया जाता रहा है और उत्तराखंड व देश के अन्य हिस्सों में इसे बेचा जाता रहा है।

नोटिस में बहाना लिया गया है कि कोविड-19 के प्रभाव के कारण कच्चे माल की कीमत बढ़ने से सितारगंज यूनिट में उत्पादन की कीमत में लगातार बढ़ोतरी होने लगी जिसे कम नहीं किया जा सका। कंपनी को बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धा भी बनाए रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

बगैर किसी क़ानूनी प्रक्रिया के 18 जून से बंदी का फरमान

आर्थिक कारणों का हवाला देते हुए सितारगंज यूनिट को बंद करना बताया गया है और जयडस वैलनेस कि सितारगंज यूनिट को दिनांक 18/06/2022 से पूर्ण रुप से बंद करने की घोषणा की गई है।

प्रबंधन ने इसके लिए किसी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया को नहीं अपनाया, कानूनों के कमजोर ढांचे का लाभ उठाया। साथ ही यहां के मजदूर संगठित नहीं है यूनियन भी नहीं है। ऐसी स्थिति में बड़े ही आसानी के साथ मनमाने तरीके से बंदी का यह नोटिस चस्पा कर दिया गया है।

उसमें साफ लिख दिया है की सभी कर्मचारियों को उनके सभी विधिक देय उनके खातों में ट्रांसफर कर दिए जाएंगे। यानी मामूली पैसा देकर सभी मज़दूरों की छुट्टी कर दी गई है।

ऐसी स्थिति में सैकड़ों मजदूर अपनी जिंदगी का कीमती समय और खून पसीना इस कंपनी को देने के बाद एक झटके में सड़क पर आ गए हैं।

यही आज का सच है, एकजुट संघर्ष ही रास्ता

आज यही स्थिति उत्तराखंड के औद्योगिक क्षेत्र से लेकर पूरे देश की बन रही है और मजदूरों के सामने बार-बार अंधकार की स्थिति पैदा हो रही है।

जिले के पंतनगर स्थित भगवती-माइक्रोमैक्स के 303 मज़दूर भी इसी तरीके से गैरकानूनी छंटनी के शिकार हुए थे और 27 दिसंबर, 2018 से संघर्ष कर रहे हैं। संगठित रूप से जमीनी लड़ाई से लेकर कानूनी लड़ाई तक वे लड़ते रहे हैं। औद्योगिक न्यायाधिकरण हल्द्वानी से लेकर उच्च न्यायालय नैनीताल तक से जीत हासिल की है।

इस मामले में भी प्रबंधन के गैरकानूनी कृत्य उजागर हुए। श्रम विभाग से लेकर शासन-प्रशासन-सरकार की भूमिका इस पूरे दौर में नंगी होकर सामने आई है। स्पष्ट आदेशों के बावजूद मजदूरों की अबतक कार्यबहाली ना होना भी शासन-प्रशासन-सरकार की मज़दूर विरोधी स्पष्ट नीति का द्योतक है।

फिर भी वहां के मज़दूर चूंकि संघर्ष कर रहे हैं, इसलिए किस्तों में जीत हासिल करते हुए पूरी जीत तक जाने के लिए संकल्पित हैं।

अब देखना यह है जयडस वैलनेस के मज़दूर संगठित होकर किस हद तक संघर्ष कर पाते हैं? जाहिर सी बात है बगैर संघर्ष कुछ भी हासिल होना नहीं है।

भूली-बिसरी ख़बरे

%d bloggers like this: