आंदोलन: सितंबर में दिल्ली में दहाड़ेंगे 25 लाख कर्मचारी -पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू करो!

सरकार सुन लो- रेलवे एवं रक्षा सहित अन्य केन्द्रीय कर्मचारी संगठनों ने एनपीएस को समाप्त कर सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत परिभाषित पेंशन योजना बहाल कराने का संकल्प लिया है।

पुरानी पेंशन व्यवस्था को लागू कराने और एनपीएस की वापसी के लिए 25 लाख कर्मचारी इस साल सितंबर महीने में देश की राजधानी दिल्ली में दहाड़ेंगे। इनमें रेलवे कर्मियों की यूनियन और एआईडीईएफ, जो चार लाख रक्षा नागरिक कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है, शामिल हैं। इनके अलावा दूसरे विभागों के भी लाखों कर्मी उक्त प्रदर्शन व आंदोलन में शामिल होंगे।

अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) और अन्य यूनियनों ने राष्ट्रीय पेंशन योजना के खिलाफ अपने आंदोलन को मजबूत करने का फैसला किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी कर्मचारी इस साल सितंबर महीने में दिल्ली के जंतर मंतर पर एक विशाल विरोध रैली करने की योजना बना रहे हैं।

कर्मचारियों का कहना है कि “पेंशन कोई इनाम नहीं बल्कि उनका अधिकार है”।

इनकी प्रमुख मांग गैर-सुरक्षा आधारित राष्ट्रीय पेंशन योजना को बंद करने और पुराने केंद्रीय सिविल सेवा नियम, 1972 को बहाल करने की है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार में शुरू की गई नई पेंशन योजना की जगह पुरानी पेंशन को लागू करने की मांग को लेकर पूरे देश में केंद्र से लेकर राज्य सरकार के कर्मचारी लगातार आंदोलन चला रहे हैं। इस बीच राजस्थान सरकार ने एनपीएस को खत्म करके पुरानी पेंशन व्यवस्था लागू कर दी है।

राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) को पीएफआरडीए अधिनियम, 2013 के तहत स्थापित पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण (पीएफआरडीए) द्वारा प्रशासित और विनियमित किया जा रहा है।

एआईडीईएफ की चेन्नई बैठक में योजना हुई तैयार

एआईडीईएफ, जो चार लाख रक्षा नागरिक कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें से 50 फीसदी एनपीएस कर्मचारी हैं। पिछले दिनों चेन्नई के अवादी में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पुरानी पेंशन को लेकर एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया गया है। इसमें भारत सरकार से एनपीएस को वापस लेने का आग्रह किया गया है। वजह, 18 साल की सेवा के बाद कर्मचारियों को केवल एक मामूली पेंशन मिल रही है जो कि वृद्धावस्था पेंशन से भी कम है।

राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) में अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ ‘एआईडीईएफ’ के महासचिव श्रीकुमार ने कहा है कि सरकार, पेंशन को एक इनाम समझ रही है। पेंशन, नियोक्ता की मधुर इच्छा के आधार पर अनुग्रह की बात नहीं है। यह 1972 के नियमों के अधीन निहित है।

पेंशन अनुग्रह राशि का भुगतान नहीं है, बल्कि यह पिछली सेवा के लिए भुगतान है। यह उन लोगों को सामाजिक आर्थिक न्याय प्रदान करने वाला एक उपाय है, जिन्होंने अपने जीवन के सुनहरे दिनों में नियोक्ता के लिए लगातार इस आश्वासन पर कड़ी मेहनत की है कि उनके बुढ़ापे में उन्हें आगोश में नहीं छोड़ा जाएगा।

कर्मचारियों ने यह भी कहा कि जिन कर्मचारियों को 1 जनवरी 2004 के बाद नियुक्त किया गया था और उन्होंने खुद को सेवाओं से मुक्त करना शुरू कर दिया उन्हें उनका न्यूनतम पेंशन और डीए नहीं मिल पा रहा है। उन्हें पेंशन राशि भी नहीं मिल रही है जो उनके मूल ग्रेड वेतन का 50 प्रतिशत है।

रक्षा व रेलवे सहित केन्द्रीय कर्मचारी आएंगे साथ

एआईडीईएफ ने रेलवे और केंद्र सरकार के अन्य कर्मचारियों को शामिल करके अपने संघर्ष को तेज करने का फैसला किया है। सितंबर के दौरान दिल्ली में एक विशाल प्रदर्शन किया जाएगा। रेलवे एवं एआईडीईएफ सहित अन्य कर्मचारी संगठनों ने गैर-गारंटी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) को समाप्त करने और सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत परिभाषित पेंशन योजना को बहाल करने की मांग का संकल्प लिया है। एनपीएस में सुनिश्चित और गारंटीकृत पेंशन का प्रावधान नहीं है।

राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) के कर्मचारी पक्ष ने मद संख्या 02/05/एनसी-44 में तत्कालीन कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की 44वीं साधारण बैठक में एनपीएस को खारिज किया है। 14 अक्तूबर 2006 को आयोजित राष्ट्रीय परिषद (जेसीएम) की 45वीं बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की गई।

कर्मचारी पक्ष का कहना है कि एनपीएस, शेयर बाजार की अनिश्चितताओं के अधीन है। पहली जनवरी 2004 के बाद भर्ती किए गए कर्मचारियों को सीसीएस (पेंशन) नियम 1972 के तहत पेंशन का हकदार बनाया जाना चाहिए।

एआईडीईएफ की राष्ट्रीय कार्यकारी ने भारत सरकार का ध्यान, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तरफ आकर्षित किया है, जिसमें कहा गया है कि पेंशन एक अधिकार है, जो कानून द्वारा लागू करने योग्य है।

श्रीकुमार ने केंद्र सरकार के कर्मचारियों से बिना गारंटी वाले एनपीएस के खिलाफ अथक रूप से लड़ने और एनपीएस को वापस लेने तक निरंतर संघर्ष जारी रखने का आह्वान किया है। पुरानी पेंशन बहाली के लिए नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल रैली/प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा।

एनपीएस क्यों है कर्मचारी विरोधी?

अटल बिहारी बाजपेयी की भाजपा नीत सरकार के समय में इसने रफ्तार पकड़ी और तमाम मज़दूर विरोधी नीतियों के साथ पुरानी पेंशन को खत्म करके नई पेंशन योजना आई, जिसे पश्चिम बंगाल को छोड़कर सभी राज्यों की सरकारों ने लागू किया। जिसे राष्ट्रीय पेंशन योजना कहा गया। वर्ष 2009 में नई पेंशन योजना का नाम बदल कर नेशनल पेंशन सिस्टम कर दिया गया था।

नई पेंशन योजना सरकारी के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए लागू है। इसमें राज्य सरकार तथा कर्मचारी की तरफ से मूल वेतन का 10-10 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा गठित संस्थाओं में जमा कराया जाता है।

एनपीएस में जाने वाला पैसा कोई भी कर्मचारी रिटायरमेंट के समय पूरा नहीं निकाल सकता है। उसे केवल फंड का 60 प्रतिशत ही प्राप्त होता है। शेष 40 प्रतिशत पैसा उसे फिर से केंद्र संस्थाओं के जरिए बाजार में लगाना पड़ता है। योजना लागू होने के समय से अंशदान में 10 प्रतिशत की दर से लाभार्जन उच्च वर्ग के कर्मचारियों के लिए जरूर लाभकारी है।

इसमें 31 मार्च 2022 तक केंद्र सरकार के अधीन 22,83,671 तथा पश्चिम बंगाल को छोड़कर सभी राज्य सरकारों के अधीन नियोजित 55,76,986 सहित कुल 78,60,657 सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों का समेकित एनपीएस अंशदान 4,25,441 करोड़ हो गया है। शेयर बाजार में निवेश के बाद प्रतिफल सहित वर्तमान में उपरोक्त कुल संपत्ति 5,88,004 करोड़ रुपया है जो भारत की जीडीपी का लगभग 2.53 प्रतिशत है।

यह आंकड़ा केवल सरकारी कार्मिकों के धन का है। एनपीएस के अन्य सेक्टर जैसे कॉर्पोरेट क्षेत्र के 14,04,92, असंगठित क्षेत्र के 22,91,660, एनपीएस स्वाबलंबन क्षेत्र के 41,86,943 अभिदाताओं का निवेश के बाद प्रतिफल सहित कुल संपत्ति 7,15,670 करोड़ बैठता है।

संघर्षों को मिली नई ऊर्जा

राजस्थान के बाद छत्तीसगढ सरकार ने सरकारी कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा का हवाला देकर इसी साल 9 मार्च को पुरानी पेंशन योजना को लागू करने की घोषणा की थी। हालांकि तकनीकी कारणों से 2004 से 2022 तक केंद्रीय संस्थाओं में राज्य सरकारों के जमा हजारों करोड़ रुपये को हासिल करना इस सरकारों के लिए आसान नहीं होगा।

लेकिन इन घोषणाओं से एनपीएस विरोधी संघर्षों को नई ऊर्जा मिल गई है। पूरे देश में विभिन्न राज्यों में कर्मचारी लगातार संघर्ष चला रहे हैं। तो केन्द्रीय कर्मचारी भी आंदोलन तेज कर रहे हैं। अब देखना है कि केंद्र की मोदी सरकार सहित राज्य सरकारों के बहरे कानों तक कब आवाज पहुँचती है?

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