पर्यावरण दिवस पर पूंजीवाद के विनाश चक्र को रोकने की शपथ लें

एक बेहतर, स्वस्थ समाज के लिए मज़दूर, किसान और नोजवान को जलवायु प्रदूषण को गम्भीरता से लेना होगा, नहीं तो आने वाले समय में सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरा देश एक गैस चैम्बर बन जाएगा और लोग घुट-घुट कर मरने को मजबूर हो जाएंगे।

जलवायु परिवर्तन भारत ही नहीं विश्व के लिए सब से बड़ा खतरा बन कर सामने आया है। 1992 से अब तक विश्व समुदाय की इस मामले में 26 बैठकों का आयोजन हो चुका है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन कांफ्रेंस की 26वीं बैठक ग्लासगो [स्कॉटलैंड] मै हुई।

इस बैठक में बड़ी पूंजीवादी ताकतों, बैंकों और जलवायु विनाश के लिए जिम्मेदार तेल कम्पनीयों के प्रतिनिधियों की बड़ी जमात शामिल हुई। दुनिया के सबसे बड़े प्रदुषण फैलाने वाले जब इस सम्मेलन में शामिल हों तो उससे इसकी जलवायु संकट से निपटने की गंभीरता पर सवाल खड़ा होता है।

इस सम्मेलन में पर्यावरणीय कार्यकर्ता और इस छेत्र में कार्य करने वाले सामाजिक लोगों को भाग लेने की अनुमति नहीं थी। इससे यह साबित होता है कि नेताओं और पूंजीपतियों का गठजोड़ जलवायु परिवर्तन पर गंम्भीर नहीं है। बल्कि हर साल इस तरह की बैठकों को पिकनिक स्थल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। 

पूंजीवादी व्यवस्था मेहनतकशों के साथ-साथ प्रकृति का भी शोषण करती है। इसका खमियाजा पुरे समाज को भुगतना पड़ता है। इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित आम मेहनतकश लोग ही होते हैं क्योकि उनके पास प्रदुषण से बचने के लिए कोई भी सुरक्षा नहीं होती है।

जैसे-जैसे दुनिया ‘विकास’ के मार्ग पर तेज़ी के साथ बढ़ रही है, यह बढ़ते जलवायु संकट का सामना भी कर रही है। इसे बाढ़, सूखे, तुफानो, चक्रवाती तुफानो, समंदर के जलस्तर में बढ़ोतरी, भीषण आग लगने और नई वैश्विक महामारीयों की बढ़ती घटनाओं में देखा जा सकता है। इसका सर्वाधिक शिकार सबसे गरीब, हाशिए पर पड़े लोग और भारी कर्ज में दबे देश होते हैं।

विश्व स्वास्थ सगठन के मुताबिक वायु प्रदुषण दिल की बीमारीयों, फेफड़ों के रोगों, फेफड़ों के कैंसर जैसी जानलेवा बीमारीयों के जोखिम बढ़ाने वाला एक प्रमुख कारण है। साँस की नली में सक्रमण का जोखिम भी इससे बढ़ जाता है और दम्मे की समस्या गम्भीर हो जाती है। 

दिल्ली को लगातार तीसरी बार दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी का तमगा मिला है। हर साल की तरह इस बार भी ठंड के मौसम में दिल्ली-एनसीआर एक गैस चैम्बर बन गया था, जिसमें लोगो के दम घुट रहे थे।

आज समय आ गया है जब जलवायु परिवर्तन को लेकर समाज के हर तबके को अपने स्तर पर कुछ न कुछ प्रयास करने पड़ेंगे। 5 जून दुनिया भर में पर्यावरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इस दिन हम सबको मिलकर पर्यावरण को बचाने का एक काम अपने स्तर पर करने की शपथ लेनी पड़ेगी जैसे हम सब मिलकर हर साल 5 फलदार वृक्ष लगाएंगे; किसान अपने खेतों में रासायनिक खाद का प्रयोग न करके ज्यादा से ज्यादा फसल जैविक खेती के माध्यम से उगाएंगे और सरकार से बीज और सब्सीडी की मांग करेंगे; कार्बन उत्सर्जन करने वाली कम्पनीयों के खिलाफ़ मिल कर आवाज उठाएंगे, कि वे जितना कार्बन वायु में छोड़ती हैं, उन्हें उससे दुगना कार्बन वायु से साफ करना पड़ेगा, तभी वे फैक्ट्री चला सकती हैं इत्यादि।

इस तरह से एक बेहतर, स्वस्थ समाज के लिए मज़दूर, किसान और नोजवान को जलवायु प्रदूषण को गम्भीरता से लेना होगा, नहीं तो आने वाले समय में सिर्फ दिल्ली ही नहीं पूरा देश एक गैस चैम्बर बन जाएगा और लोग घुट-घुट कर मरने को मजबूर हो जाएंगे।

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