पुरानी पेंशन बहाली का आंदोलन हो रहा है मुखर; शेयर बाजार आधारित है नई पेंशन योजना

बाजार के चढ़ाव-उतार पर आधारित एनपीएस में न्यूनतम गारंटीकृत पेंशन नहीं है। पेंशन धन का 40 फीसदी निवेश करना अनिवार्य होगा। इससे सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा नष्ट हुई है।

केंद्रीय कर्मचारी पुरानी पेंशन (ओपीएस) बहाली के साथ 7वें वेतन आयोग के तहत न्यूनतम मूल वेतन 18000 रुपये से बढ़ाकर 26000 रुपये करने की मांग कर रहे हैं। रेलवे से लेकर केंद्र के अधीन तमाम महकमों में ओपीएस के लेकर आवाज मुखर हो रही है।

राज्य कर्मचारियों ने ओपीएस को बहाल करने की मांग तेज कर दी है। उत्तर प्रदेश समेत काई राज्यों में पुरानी पेंशन की बहाली को लेकर जोरदार विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही है।

हाल ही में छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पुरानी पेंशन बहाल की गई। इससे कर्मचारियों का ओपीएस लागू करने का संघर्ष और तेज हो गया है।

गुजरात राज्य संयुक्त कर्मचारी मोर्चा (जीएसयूईएफ) के बैनर तले गांधीनगर के सत्याग्रह छावनी में लगभग सभी सरकारी विभागों के कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

मध्य प्रदेश राज्य कर्मचारी संघ ने प्रांतीय आव्हान पर जिला स्तर पर पीएम एवं सीएम के नाम ज्ञापन सौंपा, जिसमें 1 सूत्रीय मांग जनवरी 2004 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को लागू एनपीएस को तुरंत बंद कर पुरानी पेंशन योजना बहाली की मांग की गई।

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमांचल, पंजाब, राजस्थान, जम्मू कश्मीर, झारखंड, बिहार से लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों में आंदोलन लागतर तेज होता जा रहा है। इस बीच झारखंड, तमिलनाडु सरकरों ने पुरानी पेंशन बहाली की बात की है।

विगत दिनों अखिल भारतीय राज्य कर्मचारी महासंघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में संयुक्त किसान मोर्चा की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त कर्मचारी मोर्चा बनाकर सार्वजनिक क्षेत्र को बचाने आदि माँगों के साथ पुरानी पेंशन बहाली का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर चलाने की घोषणा हुई है।

क्या है नई और पुरानी पेंशन योजना?

पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) 1 अप्रैल 2004 से पहले लागू थी। इसके बाद नई पेंशन योजना (एनपीएस) लागू हुई। एनपीएस पहली बार केंद्र सहित कुछ राज्यों में 2004 से तथा बाकी राज्यों में साल 2005 में लागू हुई थी। पश्चिम बंगाल को छोड़कर सभी राज्य सरकारों ने अपने कर्मचारियों के लिए एनपीएस को अपनाया था। केरल तथा त्रिपुरा में भी बाद में एनपीएस लागू हुआ।

इसके तहत नई पेंशन योजना की राशि के लिए अलग-अलग खाते खोले गए और फंड के निवेश के लिए फंड मैनेजरों की भी नियुक्ति की गई। इस दायरे में केंद्र व राज्य सरकार के साथ निगम कर्मचारियों शिक्षकों सहित अर्ध सैनिक बल भी शामिल हैं जो पुरानी पेंशन से वंचित हो गए हैं।

नई पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत सरकारी कर्मचारी के मूल वेतन से 10 प्रतिशत राशि काटी जाती है और उसमें नियोक्ता/सरकार 14 फीसदी अंशदान देती है। पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) में कर्मचारी के वेतन से कोई कटौती नहीं होती थी। ओपीएस में रिटायर्ड कर्मचारियों को सरकारी कोष से पेंशन का भुगतान किया जाता था। वहीं, एनपीएस शेयर बाजार आधारित है और इसका भुगतान बाजार पर निर्भर करता है।

ओपीएस वह पेंशन योजना थी, जिसमें अंतिम आहरित वेतन के आधार पर पेंशन दी जाती थी। इसमें महंगाई दर बढ़ने के साथ डीए भी बढ़ता था। सरकार जब नया वेतन आयोग लागू करती है तब भी वह पेंशन बढ़ाती है। एनपीएस में नए कर्मचारियों को पुराने कर्मचारियों की तरह सेवानिवृत्ति के समय पेंशन और पारिवारिक पेंशन का घोषित लाभ नहीं मिलता है।

शेयर आधारित-निवेश आधारित-बाजार आधारित है एनपीएस

दरअसल नई पेंशन योजना पूरी तरह बाजार आधारित और पूँजीपतियों के हित में है। इसमें कर्मचारियों के बुढ़ापे के सहारे को भी छीन लिया गया है। 1991 के बाद राव-मनमोहन सरकार ने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को ही तिलांजलि दे दी। तबसे सबकुछ बाजार के हवाले करने की नीति चल रही है।

अटल बिहारी बाजपेयी की भाजपा नीत सरकार के समय में इसने रफ्तार पकड़ी और तमाम मज़दूर विरोधी नीतियों के साथ पुरानी पेंशन को खत्म करके नई पेंशन योजना आई, जिसे बंगाल को छोड़कर सभी राज्यों ने लागू किया। जिसे राष्ट्रीय पेंशन योजना कहा गया।

दिसंबर 2018 में मोदी कैबिनेट ने राष्ट्रीय पेंशन योजना में पूँजीपतियों के लिए कुछ महत्वपूर्ण बदलाव कर निवेशकों के लिए और ज्यादा आकर्षक बना दिया।

सरकार का कहना है कि पेंशन फंड के निवेश का रिटर्न अच्छा होने पर नए कर्मचारियों को भी भविष्य में रिटायरमेंट के समय पुरानी भविष्य निधि और पेंशन की योजना के मुकाबले अच्छी रकम मिल सकती है।

कर्मचारियों का कहना है कि पेंशन फंड के निवेश का रिटर्न बेहतर होगा, यह कैसे संभव है। इसलिए वे पुरानी पेंशन योजना को लागू करने की मांग कर रहे हैं।

क्यों कर्मचारी विरोधी है एनपीएस?

एनपीएस में न्यूनतम गारंटीकृत पेंशन नहीं है। सरकार द्वारा कर्मचारियों को प्रदान की जाने वाली सामाजिक सुरक्षा की अवधारणा नष्ट हुई है। इसने कर्मचारियों के भविष्य के साथ-साथ सेवानिवृत्ति सुरक्षा (सामाजिक सुरक्षा) को भी प्रभावित किया है।  बाजार आधारित व्यवस्था होने के कारण इसमें किसी भी तरह के रिटर्न की गारंटी नहीं है।

कर्मचारियों के लिए पेंशन धन का 40 फीसदी निवेश करना अनिवार्य होगा। जो बाजार के चढ़ाव-उतार (यानी निवेशित धन के शेयर भाव) पर आधारित है। यह निवेशित धन कॉर्पोरेट मुनाफे को जरूर बढ़ाएगा, लेकिन कर्मचारियों को नुकसान होगा।

नई पेंशन पर महंगाई भत्ते के अभाव में मूल्य वृद्धि से कोई बचाव नहीं है। 80 वर्ष, 85 वर्ष, 90 वर्ष, 95 वर्ष या 100 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर अतिरिक्त पेंशन का कोई लाभ नहीं मिलेगा। लापता कर्मचारियों के मामले में कोई सुरक्षा नहीं होती। अनिवार्य सेवानिवृत्ति पेंशन का अभाव है। मुआवजा पेंशन नहीं मिलती।

स्पष्ट है कि 2004 के बाद भर्ती कर्मचारी को पेंशन और पारिवारिक पेंशन का घोषित लाभ नहीं मिलता है। अधिवर्षिता पेंशन, मुआवजा पेंशन, अनिवार्य सेवानिवृत्ति पेंशन व अनुकंपा भत्ता आदि के लिए पात्र नहीं हैं।

गुजरात में ओपीएस के लिए संघर्ष तेज

पुरानी पेंशन व्यवस्था को फिर से शुरू करने, नियत वेतन व्यवस्था को खत्म करने और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने सहित कई मांगों को लेकर राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के कर्मचारियों ने सोमवार को एक दिवसीय धरना-प्रदर्शन किया।

गुजरात राज्य संयुक्त कर्मचारी मोर्चा (जीएसयूईएफ) के बैनर तले गांधीनगर के सत्याग्रह छावनी में लगभग सभी सरकारी विभागों के कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। करीब एक लाख कर्मचारियों ने काम से छुट्टी ली और विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।

ज्ञात हो कि गुजरात में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।

2005 में बंद कर दी गई पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मांग के अलावा, कर्मचारियों ने ठेका प्रथा और निश्चित वेतन व्यवस्था के माध्यम से नियुक्तियों को समाप्त करने की मांग की। मोर्चा ने सीएम को संबोधित एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें कहा गया था कि वह सरकारी कर्मचारियों के कल्याण के लिए जिम्मेदार हैं और उनकी सरकार को सातवें वेतन आयोग की सभी सिफारिशों को स्वीकार करना चाहिए।

कुछ दिनों पहले, सरकारी स्कूल के शिक्षकों के निकाय गुजरात राज्य शैक्षणिक संघ ने भी नई पेंशन योजना (एनपीएस) को रद्द करने की मांग को लेकर सत्याग्रह छावनी में धरना दिया था। पुरानी पेंशन योजना को बहाल करने की मांग को लेकर सोमवार को अन्य विभागों के कर्मचारी भी धरने में शामिल हुए।

सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि कई महीनों में ऐसा पहली बार हुआ है जब इतनी बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया।

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