एक्शन-2022 : सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन का मैला प्रथा के ख़िलाफ़ अभियान- #Stop Killing Us

पिछले 35 सालों से मैला प्रथा उन्मूलन व सफाई कर्मियों की सीवर-सेप्टिक टैंको में हो रही मौतों को रोकने और सफाई कर्मचारियों की मुक्ति तथा पुनर्वास के मुहिम जारी हैं।

11 मई 2022 को सफाई कर्मचारी आंदोलन ने राजेंद्र प्लेस मेट्रो स्टेशन के पास सिद्धार्थ सर्किल दिल्ली से ACTION 2022 लॉंच किया। आंदोलन के कार्यकर्ता व अन्य सहयोगी बैनर और तख्तियां लेकर जुलूस के रूप  में सिद्धार्थ सर्किल पहुंचे। तख्तियों पर STOP KILLING US लिखा हुआ था। वहां जागरूकता हेतु पर्चे भी बांटे गए।

इस अवसर पर अपनी बात रखते हुए सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेज़वाडा विल्सन ने कहा कि तकनीक के इस आधुनिक युग में भी जातिवादी मानसिकता के कारण देश में मैला प्रथा जारी है। सीवर और सेप्टिक टैंक में लोग सफाई के नाम पर जान गवां रहे हैं। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री ने इस अमानवीय प्रथा  पर और सीवर-सेप्टिक टैंकों में  होने वाली मौतों  पर चुप्पी साध रखी है। सरकार संसद में झूठे आंकडें देती है कि मैनुअल स्केवेंजिंग से पांच सालों में (2016 -2020 तक) 340 सफाई कर्मचारियों की डेथ हुई है। जबकि हमारे आंकड़ों के अनुसार पिछले पांच सालों (मई 2017 से मई 2022) में ही 479 सफाई कर्मचारी  सीवर-सेप्टिक टैंकों की सफाई के  दौरान मारे जा चुके हैं। जब तक सरकार मैला प्रथा का खात्मा नहीं करती और सीवर-सेप्टिक टैंकों में हो रही इन हत्याओं को नहीं रोकती तब तक हमारा ये अभियान जारी रहेगा।

वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भाषा सिंह ने कहा कि क्या आप जानते हैं कि जिस समय देश में आजादी की 75वीं जयंती धूमधाम से मनायी जा रही है, उस समय भी देश के कई हिस्सों में महिलाएं शुष्क शौचालय साफ करने को मजबूर हैं। देश के कई राज्यों में आज भी ऐसे शौचालय हैं, जहां औरतों व पुरुषों को हाथ से मैला (टट्टी) उठानी पड़ती है। वे सुबह-सुबह टोकरी, टीना आदि लेकर घरों से मानव मल को इकट्ठा करती हैं और दूर जाकर फैंकतीं हैं। यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है। ऐसा करवाना मानव गरिमा के खिलाफ और मानवता पर कलंक तो है ही, गैर-कानूनी भी है। इसी प्रकार सीवर-सेप्टिक टैंकों में सफाई कर्मचारियों की हत्याएं हो रही हैं। इन्हें रोकना बेहद जरूरी है।

सफाई कर्मचारी आंदोलन पिछले 35 सालों से मैला प्रथा उन्मूलन और सफाई कर्मचारियों की सीवर-सेप्टिक टैंको में हो रही मौतों को रोकने और सफाई कर्मचारियों की मुक्ति तथा पुनर्वास के मुहिम में लगा है। एक्शन-2022 की लौन्चिंग भी इस खात्मे के लिए अगला कदम है।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता दीप्ती सुकुमार ने कहा कि सिर्फ क़ानून बना देने से समस्या का समाधान नहीं होता। उसका सख्ती से कार्यान्वयन होना जरूरी होता है जो सरकार नहीं कर रही है। सरकार द्वारा उपेक्षा  और राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव के कारण ही आज इक्कीसवीं सदी में भी यह अमानवीय प्रथा और सफाई कर्माचारियों की मौतों का सिलसिला जारी है।  इसके खात्मे के लिए ही सफाई कर्मचारी  आंदोलन ने एक्शन-2022  लांच किया है।

सीनियर सोशल एक्टिविस्ट इंदिरा खुराना ने कहा कि मैला प्रथा उन्मूलन और सफाई कर्मचारियों की मौतों को रोकने के लिए  सफाई कर्मचारी कानूनों को लागू करवाने के लिए सरकार पर दबाब बनाना जरूरी है। मुझे लगता है  एक्शन-2022 इस मकसद में जरूर कामयाब होगा।

गौरतलब है कि देश का कानून (वर्ष 2013 का कानून), मैला उठवाने को कानूनी तौर पर जुर्म मानता है और साफ-साफ कहता है कि ऐसा काम किसी भी भारतीय नागरिक से करवाना अपराध है और इसके लिए एक साल की जेल व 1लाख रुपये का जुर्माना- दोनों का प्रावधान है।

गहरे दुख की बात है कि यह गैर-कानूनी, मानवताविरोधी प्रथा आज भी चल रही है। इसका खात्मा तुरंत होना चाहिए।

सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) पिछले 35 सालों से देश भर से मैला प्रथा के खात्मे के लिए संघर्षशील है। देश के सभी राज्यों में हम अपने, सफाई कर्मचारी समाज के बीच इस सवाल पर आंदोलन कर रहे हैं और समाज की मुक्ति और सशक्तिकरण के लिए बस्ती-बस्ती जाकर काम कर रहे हैं। मैला ढोने का काम करने वाली हमारी बहनें हमारे साथ मिल कर शुष्क शौचालय तोड़ रही हैं, DM-DC को ज्ञापन दे रही हैं। हम आपसे अपील करते हैं कि इस प्रथा को पूरी तरह से खत्म करने में हमारी मदद करें, SKA का साथ दें।

क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में हर तीसरे-चौथे दिन एक भारतीय नागरिक सीवर-सेप्टिक टैंक में अपनी जान गंवाता है। हम सब जानते हैं कि देश में साफ-सफाई का काम जाति आधारित है। एक जाति के लोग ही इस काम में उतारे जाते हैं। सब के सब दलित समाज से ही होते हैं। हालांकि,  देश का कानून और सुप्रीम कोर्ट, साफ कहता है कि किसी भी इंसान को सीवर-सेप्टिक टैंक में उतारना अपराध है। यह सब जानते हैं कि सीवर-सेप्टिक टैंक में जानलेवा मीथेन गैस होती है, जो सेकेंडों में जान ले लेती है। इतनी मौतें होने के बाद भी, अभी तक इन्हें रोकने के लिए सरकारों ने कोई पहलकदमी नहीं की है—क्यों? इन मौतों को केवल सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई को मशीनों से करवा करके ही रोका जा सकता है। इंसान का मल-मूत्र सफाई से कोई शारीरिक संपर्क न हो। लेकिन इस दिशा में सरकारें कोई ठोस कदम नहीं उठा रही हैं। मशीनीकरण के नाम पर सरकारें बड़ी-बड़ी कंपनियों को बढ़ावा दे रही हैं, जिससे समाज को नुकसान है। सफाई कर्मचारी आंदोलन का स्पष्ट मानना है कि सीवर-सेप्टिक टैंक में आधुनिक मशीनों से सफाई का काम सफाई के काम में लगे लोगों को ही देना चाहिए, ताकि किसी को भी काम से हाथ न धोना पड़े।

सरकार सफाई के काम को गरिमामय और जातिगत दंश से दूर करने के बजाय, लगातार इस काम को ठेके प्रथा के हवाले कर रही है। इसकी वजह से सफाईकर्मियों का दोहरा-तिहरा शोषण हो रहा है। उन्हें बहुत ही कम वेतन पर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है, साथ ही काम के घंटे बढ़ गये हैं और नौकरी की कोई गारंटी भी नहीं रही है, लगातार छंटनी का खतरा मंडराता रहता है। इससे सफाई कर्मियों जीवन दयनीय बन गया है। इस पर और ज्यादा मार पड़ी है सफाई कर्मचारियों की ट्रैकिंग प्रणाली लागू होने से। उनके ऊपर हर समय प्रशासन और सिस्टम जासूसी निगाह बनाये रखता है। यह मॉडर्न गुलामी की शुरुआत है। सफाई कर्मचारियों को बंधुआ मजदूर बनाया जा रहा है। यह हमें बिल्कुल मंजूर नहीं है।

हम आपको याद दिलाना चाहते हैं कि हर संकट में सफाई कर्मियों को ही सिस्टम झौंक देता है। कोरोना काल में सारे देश और सारी दुनिया ने देखा कि किस तरह से जानलेवा कोरोना के समय भी हमारा समाज मुस्तैदी से अपने काम में लगा रहा। हम, अपनी जान को जोखिम में डालकर, फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में काम करते रहे। अनगिनत लोगों की जानें गईं, लेकिन हमें इसके एवज में न सम्मान मिला और न ही गरिमामय रोजगार। यह अन्याय है, भेदभाव है, इसके खिलाफ SKA ने आवाज उठाई।

हम इन तमाम सवालों पर जनता को जागरूक करने के लिए, सरकारों पर दबाव बनाने के लिए एक्शन 2022 (Action 2022)  शुरू कर रहे हैं। सफाई कर्मचारी आंदोलन एक राष्ट्रव्यापी संस्था है, जिसके हर राज्य में वॉलेंटियर हैं। सफाई कर्मचारी समाज से जुड़े ये तमाम वॉलेंटियर दिन-रात देश से मैला प्रथा के खात्मे, सीवर-सेप्टिक टैंक में मौतों को रोकने और समाज के आर्थिक-सामाजिक सशक्तिकरण के लिए काम करते हैं। हमने समाज को न्याय दिलाने के लिए देश की सर्वोच्च अदालत—सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 2003 से लेकर 2014 तक जनहित याचिका पर संघर्ष किया और अंत में समाज के हक को सुनिश्चित किया। देश की संसद का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 1993 में बने कानून को लागू करने के लिए आंदोलन किया और फिर 2013 के नये कानून को पारित करने के लिए दबाव बनाया। आज देश भर में मैला प्रथा से बाहर आईं महिलाओं के समुचित पुनर्वास के लिए आंदोलन सक्रिय है।

Action 2022 के तहत हम आज आपसे सड़कों पर मिल रहे हैं। हमारा मिशन है- मैला प्रथा का खात्मा और सीवर-सेप्टिक टैंक में मौतों को रोकना। इसके लिए हम देश में जागरूकता फैलाने के लिए निकले हैं।

हम लोग, अपने प्यारे देश के सभी निवासियों से यह अपील करने के लिए निकले हैं कि वे सब इस देश को मैला प्रथा से मुक्त बनाने और सीवर-सेप्टिक टैंक में हो रही मौतों को पूरी तरह से रोकने में हमारी मदद करें। हम आपसे यह अपील करना चाहते हैं कि हमारे देश में कोई भी इंसान, दूसरे इंसान का मल-मूत्र उठाने के लिए मजबूर नहीं किया जाए। किसी भी बच्चे को, किसी भी पत्नी-मां को अपने घर के व्यक्ति को, किसी भी भारतीय नागरिक को सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करते हुए जान न गंवानी पड़े।

दिल्ली में यह जागरूकता अभियान ACTION 2022 11 मई से 18 मई तक चलेगा।

न्यूजक्लिक से साभार

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