मंटो के जन्म दिवस पर उनकी एक मार्मिक और जीवंत कहानी “आखि़री सल्यूट”

सआदत हसन मंटो की यह कहानी आज़ादी के बाद कश्मीर के लिए दोनों मुल्कों में होने वाली पहली जंग की गवाह है। कभी एक रही एक साथ लड़ी दोनों देश की सेना कैसे एक दूसरे पर हमला करने को विवश हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप के महान उर्दू कहानीकार सआदत हसन मंटो आज़ादी की लड़ाई के अहम कलम के सिपाही थे। उन्होंने भारत-पाक विभाजन के दर्द को बेहद गहराई से समझने, उसके संवेदनात्मक व मानवीय पहलू को बेहतरीन रूप से प्रस्तुत करने का जीवंत काम किया। मानवीय त्रासदी उनकी रचनाओं में बेहद शिद्दत से उपस्थित हुआ है, इसीलिए वे दोनों देशों में आज भी लोकप्रिय हैं।

मंटो ने ताउम्र मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखा, मजहबी दंगे की वीभत्सता को अपनी कहानियों में एक जिंदा तस्वीर के रूप में प्रस्तुत किया। उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी।

Saadat Hasan Manto Know About Revolutionary Writer Who Lived In No Mans  Land | मंटो पुण्यतिथि विशेष: झूठी शराफत के दायरे से बाहर होकर लिखने वाले  अफसानानिगार थे सआदत हसन
सआदत हसन मंटो (11 मई 1912–18 जनवरी 1955)

मंटो की ‘आखि़री सल्यूट’ कहानी में हिन्दुस्तान की आज़ादी के बाद कश्मीर के लिए दोनों मुल्कों में होने वाली पहली जंग की गवाह है। कुछ वक़्त पूर्व एक रही दोनों देश की सेना कैसे भावनात्मक रूप से एक दूसरे के अनुरूप हैं लेकिन अपने-अपने देश के संविधान और क़ानून के पाबंद होने की वजह से एक दूसरे पर हमला करने पर विवश हैं। …एक मार्मिक और जीवंत कहानी…

आखि़री सल्यूट

ये कश्मीर की लड़ाई भी अजीब-ओ-ग़रीब थी। सूबेदार रब नवाज़ का दिमाग़ ऐसी बंदूक़ बन गया था जिसका घोड़ा ख़राब हो गया हो।

पिछली बड़ी जंग में वो कई महाज़ों पर लड़ चुका था। मारना और मरना जानता था। छोटे बड़े अफ़सरों की नज़रों में उसकी बड़ी तौक़ीर थी, इसलिए कि वो बड़ा बहादुर, निडर और समझदार सिपाही था। प्लाटून कमांडर मुश्किल काम हमेशा उसे ही सौंपते थे और वो उनसे ओहदा-बरा होता था। मगर इस लड़ाई का ढंग ही निराला था।

दिल में बड़ा वलवला, बड़ा जोश था। भूक-प्यास से बेपर्वा सिर्फ़ एक ही लगन थी, दुश्मन का सफ़ाया कर देने की, मगर जब उससे सामना होता, तो जानी-पहचानी सूरतें नज़र आतीं। बाश्ज़ दोस्त दिखाई देते, बड़े बग़ली क़िस्म के दोस्त, जो पिछली लड़ाई में उसके दोश-बदोश, इत्तिहादियों के दुश्मनों से लड़े थे, पर अब जान के प्यासे बने हुए थे।

सूबेदार रब नवाज़ सोचता था कि ये सब ख़्वाब तो नहीं। पिछली बड़ी जंग का ऐलान। भर्ती, क़द-आवर छातियों की पैमाइश, पी टी, चांद मारी और फिर महाज़। उधर से इधर, इधर से उधर, आख़िर जंग का ख़ातमा। फिर एक दम पाकिस्तान का क़ियाम और साथ ही कश्मीर की लड़ाई। ऊपर-तले कितनी चीज़ें। रब नवाज़ सोचता था कि करने वाले ने ये सब कुछ सोच-समझ कर किया है ताकि दूसरे बौखला जाएं और समझ न सकें। वर्ना ये भी कोई बात थी कि इतनी जल्दी इतने बड़े इन्क़िलाब बरपा हो जाएं।

इतनी बात तो सूबेदार रब नवाज़ की समझ में आती थी कि वो कश्मीर हासिल करने के लिए लड़ रहे हैं। कश्मीर क्यों हासिल करना है, ये भी वो अच्छी तरह समझता था इसलिए कि पाकिस्तान की बक़ा के लिए उसका इलहाक़ अशद ज़रूरी है, मगर निशाना बांधते हुए उसे जब कोई जानी पहचानी शक्ल नज़र आ जाती थी तो वो कुछ देर के लिए भूल जाता था कि वो किस ग़रज़ के लिए लड़ रहा है, किस मक़सद के लिए उसने बंदूक़ उठाई है। और वो ये ग़ालिबन इसी लिए भूलता था कि उसे बार-बार ख़ुद को याद कराना पड़ा था कि अब की वो सिर्फ़ तनख़्वाह, ज़मीन के मुरब्बों और तमगों के लिए नहीं बल्कि अपने वतन की ख़ातिर लड़ रहा है।

ये वतन पहले भी उसका वतन था, वो इसी इलाक़े का रहने वाला था जो अब पाकिस्तान का एक हिस्सा बन गया था। अब उसे अपने उसी हमवतन के खि़लाफ़ लड़ना था जो कभी उसका हमसाया होता था, जिसके ख़ानदान से उसके ख़ानदान के पुश्त-हा-पुश्त के देरीना मरासिम थे।

अब उसका वतन वो था जिसका पानी तक भी उसने कभी नहीं पिया था, पर अब उसकी ख़ातिर, एक दम उसके कांधे पर बंदूक़ रख कर ये हुक्म दे दिया गया था कि जाओ, ये जगह जहां तुमने अभी अपने घर के लिए दो ईंटें भी नहीं चुनीं, जिसकी हवा और जिसके पानी का मज़ा अभी तक तुम्हारे मुँह में ठीक तौर पर नहीं बैठा, तुम्हारा वतन है… जाओ उसकी ख़ातिर पाकिस्तान से लड़ो… उस पाकिस्तान से जिसके ऐन दिल में तुम ने अपनी उम्र के इतने बरस गुज़ारे हैं।

रब नवाज़ सोचता था कि यही दिल उन मुसलमान फ़ौजियों का है जो हिंदुस्तान में अपना घर बार छोड़कर यहां आए हैं। वहां उनसे सब कुछ छीन लिया गया था यहां आकर उन्हें और तो कुछ नहीं मिला। अलबत्ता बंदूक़ें मिल गई हैं। उसी वज़न की, उसी शक्ल की, उसी मार्के और छाप की।

पहले सब मिल कर एक ऐसे दुश्मन से लड़ते थे जिनको उन्होंने पेट और इनाम-ओ-इकराम की ख़ातिर अपना दुश्मन यक़ीन कर लिया था। अब वो ख़ुद दो हिस्सों में बट गए थे। पहले सब हिंदुस्तानी फ़ौजी कहलाते थे। अब एक पाकिस्तानी था और दूसरा हिंदुस्तानी। उधर हिंदुस्तान में मुसलमान हिंदुस्तानी फ़ौजी थे।

रब नवाज़ जब उनके मुतअल्लिक़ सोचता तो उसके दिमाग़ में एक अजीब गड़बड़ सी पैदा हो जाती और जब वो कश्मीर के मुतअल्लिक़ सोचता तो उसका दिमाग़ बिल्कुल जवाब दे जाता…

पाकिस्तानी फ़ौजी कश्मीर के लिए लड़ रहे थे या कश्मीर के मुसलमानों के लिए? अगर उन्हें कश्मीर के मुसलमानों ही के लिए लड़ाया जाता था तो हैदराबाद, और जूनागढ़ के मुसलमानों के लिए क्यों उन्हें लड़ने के लिए नहीं कहा जाता था और अगर ये जंग ठेट इस्लामी जंग थी तो दुनिया में दूसरे इस्लामी मुल्क हैं वो उसमें क्यों हिस्सा नहीं लेते।

रब नवाज़ अब बहुत सोच-बिचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि ये बारीक बारीक बातें फ़ौजी को बिल्कुल नहीं सोचना चाहिऐं। उसकी अक़ल मोटी होनी चाहिए क्योंकि मोटी अक़ल वाला ही अच्छा सिपाही हो सकता है, मगर फ़ित्रत से मजबूर कभी कभी वो चोर दिमाग़ से उन पर ग़ौर कर ही लेता था और बाद में अपनी इस हरकत पर ख़ूब हँसता था।

दरियाए किशनगंगा के किनारे इस सड़क के लिए जो मुज़फ़्फ़राबाद से करन जाती है। कुछ अर्से से लड़ाई हो रही थी… अजीब-ओ-गरीब लड़ाई थी। रात को बाश्ज़ औक़ात आसपास की पहाड़ियां फ़ायरों के बजाय गंदी-गंदी गालियों से गूंज उठती थीं।

एक मर्तबा सूबेदार रब नवाज़ अपनी प्लाटून के जवानों के साथ शब ख़ून मारने के लिए तैयार हो रहा था कि दूर नीचे एक खाई से गालियों का शोर उठा। पहले तो वो घबरा गया। ऐसा लगता था कि बहुत से भूत मिल कर नाच रहे हैं और ज़ोर-ज़ोर के क़हक़हे लगा रहे हैं, वो बड़बड़ाया, “खि़नज़ीर की दुम… ये क्या हो रहा है।”

एक जवान ने गूंजती हुई आवाज़ों से मुख़ातिब हो कर ये बड़ी गाली दी और रब नवाज़ से कहा, “सूबेदार साहब गालियां दे रहे हैं। अपनी माँ के यार।”

रब नवाज़ ये गालियां सुन रहा था जो बहुत उकसाने वाली थीं। उसके जी में आई कि बज़न बोल दे मगर ऐसा करना ग़लती थी, चुनांचे वो ख़ामोश रहा। कुछ देर जवान भी चुप रहे, मगर जब पानी सर से गुज़र गया तो उन्होंने भी गला फाड़ फाड़ के गालियां लुढ़काना शुरू कर दीं… रब नवाज़ के लिए इस क़िस्म की लड़ाई बिल्कुल नई चीज़ थी।

उसने जवानों को दो तीन मर्तबा ख़ामोश रहने के लिए कहा, मगर गालियां ही कुछ ऐसी थीं कि जवाब दिए बिना इंसान से नहीं रहा जाता था।

दुश्मन के सिपाही नज़र से ओझल थे। रात को तो ख़ैर अंधेरा था, मगर वो दिन को भी नज़र नहीं आते थे। सिर्फ़ उनकी गालियां नीचे पहाड़ी के क़दमों से उठती थीं और पत्थरों के साथ टकड़ा टकड़ा कर हवा में हल हो जाती थीं।

रब नवाज़ की प्लाटून के जवान जब उन गालियों का जवाब देते थे तो उसको ऐसा लगता था कि वो नीचे नहीं जातीं, ऊपर को उड़ जाती हैं। इससे उसको ख़ासी कोफ़्त होती थी… चुनांचे उसने झुँझला कर हमला करने का हुक्म दे दिया।

रब नवाज़ को वहां की पहाड़ीयों में एक अजीब बात नज़र आई थी। चढ़ाई की तरफ़ कोई पहाड़ी दरख़्तों और बूटों से लदी फंदी होती थी और उतराई की तरफ़ गंजी। कश्मीरी हितो के सर की तरह। किसी की चढ़ाई का हिस्सा गंजा होता था और उतराई की तरफ़ दरख़्त ही दरख़्त होते थे। चीड के लिए लंबे तनावर दरख़्त जिनके बटे हुए धागे जैसे पत्तों पर फ़ौजी बूट फिसल फिसल जाते थे।

जिस पहाड़ी पर सूबेदार रब नवाज़ की प्लाटून थी, उसकी उतराई दरख़्तों और झाड़ियों से बेनयाज़ थी। ज़ाहिर है कि हमला बहुत ही ख़तरनाक था मगर सब जवान हमले के लिए बखु़शी तैयार थे। गालियों का इंतिक़ाम लेने के लिए वो बेताब थे।

हमला हुआ और कामयाब रहा। दो जवान मारे गए। चार ज़ख़्मी हुए। दुश्मन के तीन आदमी खेत रहे। बाक़ी रसद का कुछ सामान छोड़कर भाग निकले।

सूबेदार रब नवाज़ और उसके जवानों को इस बात का बड़ा दुख था कि दुश्मन का कोई ज़िंदा सिपाही उनके हाथ न आया जिसको वो ख़ातिर ख़्वाह गालियों का मज़ा चखाते। मगर ये मोर्चा फ़तह करने से वो एक बड़ी अहम पहाड़ी पर क़ाबिज़ होगए थे।

वायरलैस के ज़रिये से सूबेदार रब नवाज़ ने प्लाटून कमांडर मेजर असलम को फ़ौरन ही अपने हमले के इस नतीजे से मुत्तला कर दिया था और शाबाशी वसूल कर ली थी।

क़रीब-क़रीब हर पहाड़ी की चोटी पर पानी का एक तालाब सा होता था। इस पहाड़ी पर भी तालाब था, मगर दूसरी पहाड़ीयों के तालाबों के मुक़ाबले में ज़्यादा बड़ा। उसका पानी भी बहुत साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ था। गो मौसम सख़्त सर्द था, मगर सब नहाए। दाँत बजते रहे मगर उन्होंने कोई परवाह न की। वो अभी इस शग़ल में मस्रूफ़ थे कि फ़ायर की आवाज़ आई। सब नंगे ही लेट गए।

थोड़ी देर के बाद सूबेदार रब नवाज़ ख़ां ने दूरबीन लगा कर नीचे ढलवानों पर नज़र दौड़ाई, मगर उसे दुश्मन के छुपने की जगह का पता न चला।

उसके देखते देखते एक और फ़ायर हुआ। दूर उतराई के फ़ौरन बाद एक निस्बतन छोटी पहाड़ी की दाढ़ी से उसे धुआँ उठता नज़र आया। उसने फ़ौरन ही अपने जवानों को फ़ायर का हुक्म दिया। उधर से धड़ा धड़ फ़ायर हुए। इधर से भी जवाबन गोलियां चलने लगीं… सूबेदार रब नवाज़ ने दूरबीन से दुश्मन की पोज़ीशन का बग़ौर मुताला किया।

वो ग़ालिबन बड़े बड़े पत्थरों के पीछे महफ़ूज़ थे। मगर ये मुहाफ़िज़ दीवार बहुत ही छोटी थी। ज़्यादा देर तक वो जमे नहीं रह सकते थे। इनमें से जो भी इधर उधर हटता, उसका सूबेदार रब नवाज़ की ज़द में आना यक़ीनी था।

थोड़ी देर फ़ायर होते रहे। इसके बाद रब नवाज़ ने अपने जवानों को मना कर दिया कि वो गोलियां ज़ाए न करें सिर्फ़ ताक में रहें। जूंही दुश्मन का कोई सिपाही पत्थरों की दीवार से निकल कर इधर या उधर जाने की कोशिश करे उसको उड़ा दें।

ये हुक्म दे कर उसने अपने अलिफ़ नंगे बदन की तरफ़ देखा और बड़बड़ाया, “खि़नज़ीर की दुम… कपड़ों के बग़ैर आदमी हैवान मालूम होता है।”

लंबे लंबे वक़्फ़ों के बाद दुश्मन की तरफ़ से इक्का दुक्का फ़ायर होता रहा। यहां से उसका जवाब कभी कभी दे दिया जाता। ये खेल पूरे दो दिन जारी रहा… मौसम यकलख़्त बहुत सर्द हो गया। इस क़दर सर्द कि दिन को भी ख़ून मुंजमिद होने लगता था, चुनांचे सूबेदार रब नवाज़ ने चाय के दौर शुरू करा दिए।

हर वक़्त आग पर केतली धरी रहती। जूंही सर्दी ज़्यादा सताती एक दौर इस गर्म-गर्म मशरूब का हो जाता। वैसे दुश्मन पर बराबर निगाह थी। एक हटता तो दूसरा उसकी जगह दूरबीन लेकर बैठ जाता।

हड्डीयों तक उतर जाने वाली सर्द हवा चल रही थी। जब उस जवान ने जो पहरेदार था, बताया कि पत्थरों की दीवार के पीछे कुछ गड़बड़ हो रही है। सूबेदार रब नवाज़ ने उससे दूरबीन ली और ग़ौर से देखा।

उसे हरकत नज़र न आई लेकिन फ़ौरन ही एक आवाज़ बुलंद हुई और देर तक उसकी गूंज आस पास की पहाड़ियों के साथ टकराती रही। रब नवाज़ उसका मतलब न समझा। उसके जवाब में उसने अपनी बंदूक़ दाग़ दी।

उसकी गूंज दबी तो फिर उधर से आवाज़ बुलंद हुई, जो साफ़ तौर पर उनसे मुख़ातिब थी। रब नवाज़ चिल्लाया, “खि़ंज़ीर की दुम। बोल क्या कहता है तू!”

फ़ासला ज़्यादा नहीं था। रब नवाज़ के अल्फ़ाज़ दुश्मन तक पहुंच गए, क्योंकि वहां से किसी ने कहा, “गाली न दे भाई।”

रब नवाज़ ने अपने जवानों की तरफ़ देखा और बड़े झुंझलाए हुए तअज्जुब के साथ कहा, “भाई…?” फिर वो अपने मुँह के आगे दोनों हाथों का भोंपू बना कर चिल्लाया, “भाई होगा तेरी माँ का जना… यहां सब तेरी माँ के यार हैं! ”

एक दम उधर से एक ज़ख़्मी आवाज़ बुलंद हुई, “रब नवाज़! ”

रब नवाज़ काँप गया… ये आवाज़ आस-पास की पहाड़ियों से सर फोड़ती रही और मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में, रब नवाज़… रब नवाज़, दोहराती बिलआखि़र ख़ून मुंजमिद कर देने वाली सर्द हवा के साथ जाने कहाँ उड़ गई।

रब नवाज़ बहुत देर के बाद चौंका, “ये कौन था।” फिर वो आहिस्ते से बड़बड़ाया, “खि़ंज़ीर की दुम!”

उसको इतना मालूम था टेटवाल के महाज़ पर सिपाहियों की अक्सरियत 6/9 रेजिमेंट की है। वो भी उसी रेजिमेंट में था। मगर ये आवाज़ थी किस की?

वो ऐसे बेशुमार आदमियों को जानता था जो कभी उसके अज़ीज़ तरीन दोस्त थे। कुछ ऐसे भी जिनसे उसकी दुश्मनी थी, चंद ज़ाती अग़राज़ की बिना पर। लेकिन ये कौन था जिसने उसकी गाली का बुरा मान कर उसे चीख़ कर पुकारा था।

रब नवाज़ ने दूरबीन लगा कर देखा, मगर पहाड़ी की हिलती हुई छिद्री दाढ़ी में उसे कोई नज़र न आया। दोनों हाथों का भोंपू बना कर उसने ज़ोर से अपनी आवाज़ उधर फेंकी, “ये कौन था…? रब नवाज़ बोल रहा है… रब नवाज़… रब नवाज़।”

ये रब नवाज़, भी कुछ देर तक पहाड़ियों के साथ टकराता रहा। रब नवाज़ बड़बड़ाया, “खि़ंज़ीर की दुम!”

फ़ौरन ही उधर से आवाज़ बुलंद हुई, “मैं हूँ… मैं हूँ राम सिंह!”

रब नवाज़ ये सुन कर यूं उछला जैसे वो छलांग लगा कर दूसरी तरफ़ जाना चाहता है। पहले उसने अपने आपसे कहा, “राम सिंह?” फिर हलक़ फाड़ के चिल्लाया, “राम सिंह…? ओए राम सिन्घा… खि़ंज़ीर की दुम!”

खि़ंज़ीर की दुम अभी पहाड़ियों के साथ टकरा टकरा कर पूरी तरह गुम नहीं हुई थी कि राम सिंह की फटी फटी आवाज़ बुलंद हुई, “ओए कुम्हार के खोते!”

रब नवाज़ फ़ूं फ़ूं करने लगा। जवानों की तरफ़ रोबदार नज़रों से देखते हुए वो बड़बड़ाया, “बकता है… खि़ंज़ीर की दुम!” फिर उसने राम सिंह को जवाब दिया, “ओए बाबा टल के कड़ाह प्रशाद… ओए खि़ंज़ीर के झटके।”

राम सिंह बेतहाशा क़हक़हे लगाने लगा। रब नवाज़ भी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगा। पहाड़ियां ये आवाज़ें बड़े खलंडरे अंदाज़ में एक दूसरे की तरफ़ उछालती रहीं… सूबेदार रब नवाज़ के जवान ख़ामोश थे।

जब हंसी का दौर ख़त्म हुआ तो उधर से राम सिंह की आवाज़ बुलंद हुई, “देखो यार। हमें चाय पीनी है!”

रब नवाज़ बोला, “पियो… ऐश करो।”

राम सिंह चिल्लाया, “ओए ऐश किस तरह करें… सामान तो हमारा उधर पड़ा है।”

रब नवाज़ ने पूछा, “किधर।”

राम सिंह की आवाज़ आई, “उधर… जिधर तुम्हारा फ़ायर हमें उड़ा सकता है।”

रब नवाज़ हंसा, “तो क्या चाहते हो तुम… खि़ंज़ीर की दुम!”

राम सिंह बोला, “हमें सामान ले आने दे।”

“ले आ!” ये कह कर उसने अपने जवानों की तरफ़ देखा।

राम सिंह की तशवीश भरी आवाज़ बुलंद हुई, “तू उड़ा देगा, कुम्हार के खोते!”

रब नवाज़ ने भन्ना कर कहा, “बक नहीं, ओए संतोख सर के कछुवे।”

राम सिंह हंसा, “क़सम खा नहीं मारेगा!”

रब नवाज़ ने पूछा, “किसकी क़सम खाऊं!”

राम सिंह ने कहा, “किसी की भी खा ले!”

रब नवाज़ हंसा, ”ओए जा… मंगवा ले अपना सामान।”

चंद लम्हात ख़ामोशी रही। दूरबीन एक जवान के हाथ में थी। उसने मानी ख़ेज़ नज़रों से सूबेदार रब नवाज़ की तरफ़ देखा। बंदूक़ चलाने ही वाला था कि रब नवाज़ ने उसे मना किया, “नहीं… नहीं!”

फिर उसने दूरबीन लेकर ख़ुद ही देखा। एक आदमी डरते डरते पंजों के बल पत्थरों के अक़ब से निकल कर जा रहा था। थोड़ी दूर इस तरह चल कर वो उठा और तेज़ी से भागा और कुछ दूर झाड़ियों में ग़ायब हो गया। दो मिनट के बाद वापस आया तो उसके दोनों हाथों में कुछ सामान था।

एक लहज़े के लिए वो रुका। फिर तेज़ी से ओझल हुआ तो रब नवाज़ ने अपनी बंदूक़ चला दी। तड़ाख़ के साथ ही रब नवाज़ का क़हक़हा बुलंद हुआ। ये दोनों आवाज़ें मिल कर कुछ देर झनझनाती रहीं। फिर राम सिंह की आवाज़ आई, “थैंक यू।”

“नो मेंशन।” रब नवाज़ ने ये कह कर जवानों की तरफ़ देखा, “एक राउंड हो जाये।”

तफ़रीह के तौर पर दोनों तरफ़ से गोलियां चलने लगीं। फिर ख़ामोशी हो गई। रब नवाज़ ने दूरबीन लगा कर देखा। पहाड़ी की दाढ़ी में से धुआँ उठ रहा था। वो पुकारा, “चाय तैयार करली राम सिन्घा?”

जवाब आया, “अभी कहाँ ओए कुम्हार के खोते!”

रब नवाज़ ज़ात का कुम्हार था। जब कोई उसकी तरफ़ इशारा करता था तो ग़ुस्से से उसका ख़ून खौलने लगता था। एक सिर्फ़ राम सिंह के मुँह से वो इसे बर्दाश्त कर लेता था इसलिए कि वो उसका बेतकल्लुफ़ दोस्त था।

एक ही गांव में वो पल कर जवान हुए थे। दोनों की उम्र में सिर्फ़ चंद दिन का फ़र्क़ था। दोनों के बाप, फिर उनके बाप भी एक दूसरे के दोस्त थे। एक ही स्कूल में प्राइमरी तक पढ़ते थे और एक ही दिन फ़ौज में भर्ती हुए थे और पिछली बड़ी जंग में कई महाज़ों पर इकट्ठे लड़े थे।

रब नवाज़ अपने जवानों की नज़रों में ख़ुद को ख़फ़ीफ़ महसूस करके बड़बड़ाया, “खि़ंज़ीर की दुम… अब भी बाज़ नहीं आता।” फिर वो राम सिंह से मुख़ातिब हुआ, “बक नहीं ओए खोते की जूँ।”

राम सिंह का क़हक़हा बुलंद हुआ। रब नवाज़ ने ऐसे ही शिस्त बांधी हुई थी। तफ़रीहन उसने लबलबी दबा दी। तड़ाख़ के साथ ही एक फ़लक शिगाफ़ चीख़ बुलंद हुई। रब नवाज़ ने फ़ौरन दूरबीन लगाई और देखा कि एक आदमी, नहीं, राम सिंह पेट पकड़े, पत्थरों की दीवारों से ज़रा हट कर दोहरा हुआ और गिर पड़ा।

रब नवाज़ ज़ोर से चीख़ा, “राम सिंह! और उछल कर खड़ा होगया,” उधर से बयक वक़्त तीन चार फ़ायर हुए। एक गोली रब नवाज़ का दायां बाज़ू चाटती हुई निकल गई। फ़ौरन ही वो औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़ा।

अब दोनों तरफ़ से फ़ायर शुरू होगए। इधर कुछ सिपाहियों ने गड़बड़ से फ़ायदा उठा कर पत्थरों के अक़ब से निकल कर भागना चाहा। उधर से फ़ायर जारी थे मगर निशाने पर कोई न बैठा। रब नवाज़ ने अपने जवानों को उतरने का हुक्म दिया। तीन फ़ौरन ही मारे गए, लेकिन उफ़्तां-ओ-ख़ेज़ां बाक़ी जवान दूसरी पहाड़ी पर पहुंच गए।

राम सिंह ख़ून में लत पत पथरीली ज़मीन पर पड़ा कराह रहा था। गोली उसके पेट में लगी थी। रब नवाज़ को देख कर उसकी आँखें तमतमा उठीं। मुस्कुरा कर उसने कहा, “ओए कुम्हार के खोते, ये तू ने क्या किया।”

रब नवाज़, राम सिंह का ज़ख़्म अपने पेट में महसूस कर रहा था, लेकिन वो मुस्कुरा कर उसपर झुका और दोज़ानू हो कर उसकी पेटी खोलने लगा, “खि़ंज़ीर की दुम। तुमसे किसने बाहर निकलने को कहा था।”

पेटी उतारने से राम सिंह को सख़्त तकलीफ़ हुई। दर्द से वो चिल्ला चिल्ला पड़ा। जब पेटी उतर गई और रब नवाज़ ने ज़ख़्म का मुआइना किया जो बहुत ख़तरनाक था तो राम सिंह ने रब नवाज़ का हाथ दबा कर कहा, “मैं अपना आप दिखाने के लिए बाहर निकला था कि तू ने… ओए रब के पुत्तर, फ़ायर कर दिया।”

रब नवाज़ का गला रुँध गया, “क़सम वहदहु ला शरीक की… मैंने ऐसे ही बंदूक़ चलाई थी… मुझे मालूम नहीं था कि तू खोते का सिंह बाहर निकल रहा है… मुझे अफ़सोस है!”

राम सिंह का ख़ून काफ़ी बह निकला था। रब नवाज़ और उसके साथी कई घंटों के बाद वहां पहुंचे थे। इस अर्से तक तो एक पूरी मशक ख़ून की ख़ाली हो सकती थी।

रब नवाज़ को हैरत थी कि इतनी देर तक राम सिंह ज़िंदा रह सका है। उसको उम्मीद नहीं थी कि वो बचेगा। हिलाना जुलाना ग़लत था, चुनांचे उसने फ़ौरन वायरलैस के ज़रिये से प्लाटून कमांडर से दरख़ास्त की कि जल्दी एक डाक्टर रवाना किया जाये। उसका दोस्त राम सिंह ज़ख़्मी हो गया है।

डाक्टर का वहां तक पहुंचना और फिर वक़्त पर पहुंचना बिल्कुल मुहाल था। रब नवाज़ को यक़ीन था कि राम सिंह सिर्फ़ चंद घड़ियों का मेहमान है। फिर भी वायरलैस पर पैग़ाम पहुंचा कर उसने मुस्कुरा कर राम सिंह से कहा, “डाक्टर आ रहा है… कोई फ़िक्र न कर!”

राम सिंह बड़ी नहीफ़ आवाज़ में सोचते हुए बोला, “फ़िक्र किसी बात की नहीं… ये बता मेरे कितने जवान मारे हैं तुम लोगों ने?”

रब नवाज़ ने जवाब दिया, “सिर्फ़ एक!”

राम सिंह की आवाज़ और ज़्यादा नहीफ़ होगई, “तेरे कितने मारे गए?”

रब नवाज़ ने झूट बोला, “छः!” और ये कह कर उसने मानी ख़ेज़ नज़रों से अपने जवानों की तरफ़ देखा।

“छः… छः!” राम सिंह ने एक-एक आदमी अपने दिल में गिना, “मैं ज़ख़्मी हुआ तो वो बहुत बददिल होगए थे… पर मैंने कहा… खेल जाओ अपनी और दुश्मन की जान से… छः… ठीक है!”

वो फिर माज़ी के धुंदलकों में चला गया, “रब नवाज़… याद हैं वो दिन तुम्हें…”

और राम सिंह ने बीते दिन याद करने शुरू कर दिए। खेतों खलियानों की बातें। स्कूल के क़िस्से 6/9 जाट रेजिमेंट की दास्तानें… कमांडिंग अफ़सरों के लतीफ़े और बाहर के मुल्कों में अजनबी औरतों से मुआशक़े। उनका ज़िक्र करते हुए राम सिंह को कोई बहुत दिलचस्प वाक़िया याद आगया। हँसने लगा तो उसके टीस उठी मगर उसकी परवाह न करते हुए ज़ख़्म से ऊपर ही ऊपर हंस कर कहने लगा, “ओए सुअर के तिल… याद है तुम्हें वो मेडम…”

रब नवाज़ ने पूछा, “कौन?”

राम सिंह ने कहा, “वो… इटली की… क्या नाम रखा था हमने उसका… बड़ी मार खोर औरत थी!”

रब नवाज़ को फ़ौरन ही वो औरत याद आगई, “हाँ, हाँ… वो… मेडम मनीता फ़नतो… पैसा ख़त्म, तमाशा ख़त्म… पर तुझसे कभी कभी रिआयत कर देती थी मसोलीनी की बच्ची!”

राम सिंह ज़ोर से हंसा… और उसके ज़ख़्म से जमे हुए ख़ून का एक लोथड़ा बाहर निकल आया। सरसरी तौर पर रब नवाज़ ने जो पट्टी बांधी थी, वो खिसक गई थी। उसे ठीक करके उसने राम सिंह से कहा, “अब ख़ामोश रहो।”

राम को बहुत तेज़ बुख़ार था। उसका दिमाग़ उसके बाइस बहुत तेज़ हो गया था। बोलने की ताक़त नहीं थी मगर बोले चला जा रहा था। कभी कभी रुक जाता। जैसे ये देख रहा है कि टंकी में कितना पैट्रोल बाक़ी है।

कुछ देर के बाद उस पर हिज़यानी कैफ़ियत तारी होगई, लेकिन कुछ ऐसे वक़्फ़े भी आते थे कि उसके होश-ओ-हवास सलामत होते थे। इन्ही वक़्फ़ों में उसने एक मर्तबा नवाज़ से सवाल किया, “यारा सच्चो सच बताओ, क्या तुम लोगों को वाक़ई कश्मीर चाहिए!”

रब नवाज़ ने पूरे ख़ुलूस के साथ कहा, “हाँ, राम सिन्घा!”

राम सिंह ने अपना सर हिलाया, “नहीं… मैं नहीं मान सकता… तुम्हें वरग़लाया गया है।”

रब नवाज़ ने उसको यक़ीन दिलाने के अंदाज़ में कहा, “तुम्हें वरग़लाया गया है… कसम पंजतन पाक की…

राम सिंह ने रब नवाज़ का हाथ पकड़ लिया, “क़सम न खा यारा… ठीक होगा।” लेकिन उसका लहजा साफ़ बता रहा था कि उसको रब नवाज़ की क़सम का यक़ीन नहीं।

दिन ढलने से कुछ देर पहले प्लाटून कमांडैंट मेजर असलम आया। उसके साथ चंद सिपाही थे, मगर डाक्टर नहीं था। राम सिंह बेहोशी और नज़ा की हालत में कुछ बड़बड़ा रहा था। मगर आवाज़ इस क़दर कमज़ोर और शिकस्ता थी कि समझ में कुछ नहीं आता था।

मेजर असलम भी 6/9 जाट रेजिमेंट का था और राम सिंह को बहुत अच्छी तरह जानता था। रब नवाज़ से सारे हालात दर्याफ़्त करने के बाद उसने राम सिंह को बुलाया, “राम सिंह… राम सिंह!”

राम सिंह ने अपनी आँखें खोलीं, लेटे लेटे अटेंशन हो कर उसने सेलूट किया। लेकिन फिर आँखें खोल कर उसने एक लहज़े के लिए ग़ौर से मेजर असलम की तरफ़ देखा। उसका सेलूट करने वाला अकड़ा हुआ हाथ एक दम गिर पड़ा। झुँझला कर उसने बड़बड़ाना शुरू किया, “कुछ नहीं ओए राम सय्यां… भूल ही गया तू सुअर के नल्ला… कि ये लड़ाई… ये लड़ाई?”

राम सिंह अपनी बात पूरी न कर सका। बंद होती हुई आँखों से उसने रब नवाज़ की तरफ़ नीम सवालिया अंदाज़ मैं देखा और सर्द हो गया।

प्रस्तुत कहानी रेखता (Rekhta.org) से साभार

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