सूचना छिपाना बर्खास्तगी का कारण नहीं; गलत इंक्रीमेंट की बाद में वसूली गलत -सुप्रीम कोर्ट

दो अहम फैसले : सूचना छिपाने, झूठी जानकारी देने से मनमाने ढंग से बर्खास्त नहीं किया जा सकता है। कर्मचारी का गलती से हुआ इंक्रीमेंट रिटायरमेंट के बाद वसूली का आधार नहीं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा विगत दो दिनों में दो बड़े फैसले आए जो कर्मचारियों के हक से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार कहा कि किसी मामले में कोई सूचना छिपाना, झूठी जानकारी और एफआईआर की जानकारी नहीं देने का मतलब यह नहीं है कि नियोक्ता मनमाने ढंग से कर्मचारी को बर्खास्त कर सकता है।

वहीं मंगलवार को एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी को अतिरिक्त भुगतान या इंक्रीमेंट गलती से किया गया तो रिटायरमेंट के बाद उससे वसूली इस आधार पर नहीं की जा सकती कि ऐसा किसी गलती के कारण हुआ। सुप्रीम कोर्ट के दो फैसले क्या हैं और उसका क्या असर पड़ेगा।

इन दोनों अहम फैसलों को देखें-

सूचना छिपाने का अर्थ यह नहीं कि नियोक्ता मनमाने ढंग से कर्मचारी को बर्ख़ास्त कर सकता है

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने कहा, ‘किसी मामले में केवल जानकारी को छिपाने या झूठी जानकारी देने का मतलब यह नहीं है कि नियोक्ता मनमाने ढंग से कर्मचारी को सेवा से बर्खास्त/समाप्त कर सकता है।’

पीठ ने कहा कि एक उम्मीदवार जो चयन प्रक्रिया में भाग लेना चाहता है, उसे सेवा में शामिल होने से पहले और बाद में सत्यापन/प्रमाणीकरण प्रपत्र में हमेशा अपने चरित्र और महत्वपूर्ण जानकारी प्रस्तुत करना आवश्यक है।

शीर्ष अदालत पवन कुमार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसे रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) में कॉन्स्टेबल के पद के लिए चुना गया था। जब वह प्रशिक्षण ले रहे थे, तो उन्हें इस आधार पर एक आदेश द्वारा हटा दिया गया था कि उन्होंने यह खुलासा नहीं किया कि उसके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति ने जानकारी को छिपाया है या गलत घोषणा की है, उसे नियुक्ति या सेवा में बनाए रखने की मांग करने का कोई अधिकार नहीं है, लेकिन कम से कम उसके साथ मनमाने ढंग से व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने कहा कि अपीलकर्ता द्वारा भरे गए सत्यापन फॉर्म के समय, उसके खिलाफ पहले से ही आपराधिक मामला दर्ज किया गया था, शिकायतकर्ता ने अपना हलफनामा दायर किया था कि जिस शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी वह गलतफहमी के कारण थी।

पीठ ने कहा, ‘हमारे विचार में 24 अप्रैल 2015 को सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित सेवा से हटाने का आदेश उपयुक्त नहीं है और इसके बाद दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ द्वारा पारित निर्णय सही नहीं है और यह रद्द करने योग्य है।’

पवन कुमार के खिलाफ दर्ज एफआईआर से जुड़े मुकदमे की कार्यवाही की पहली सुनवाई पर उन्हें सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया था। हालांकि विभाग ने माना कि मामले की प्रकृति और उनके बरी होने के बावजूद उन्हें बर्खास्त करने के लिए कारण पर्याप्त था। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बर्खास्तगी को मंजूरी दे दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा, ‘इस अदालत द्वारा निर्धारित विवरण से जो उभर कर आता है, वह यह है कि केवल सामग्री/झूठी जानकारी को दबाने से इस तथ्य की परवाह किए बिना कि कोई दोष सिद्ध हुआ है या बरी किया गया है, कर्मचारी/भर्ती को एक झटके से सेवा से स्वैच्छिक रूप से समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।’

पीठ ने कहा कि सभी मामलों को एक ही तरह के ढांचे में नहीं रखा जा सकता है और कुछ हद तक लचीलापन और विवेक अधिकारियों के पास होता है और सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सावधानी के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए, जिसमें प्रकृति और प्रकार की चूक शामिल है।

शीर्ष अदालत ने रेलवे सुरक्षा बल के अधिकारी के लिए नौकरी बहाल करने का आदेश दिया।

गलत इंक्रीमेंट का रिटायरमेंट के बाद वसूली नाजायज

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केरल के एक शिक्षक के मामले में फैसला सुनते हुए कहा कि कर्मचारी को किया गया अतिरिक्त भुगतान उसके रिटायरमेंट के बाद इस आधार पर नहीं वसूल किया जा सकता कि उक्त वेतन वृद्धि किसी गलती के कारण हुई थी।

जस्टिस एस. ए. नज़ीर और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि अतिरिक्त भुगतान की वसूली पर रोक लगाने की अनुमति अदालतों द्वारा दी जाती है और यह कर्मचारियों के किसी अधिकार के कारण नहीं, बल्कि न्यायिक विवेक के तहत कर्मचारियों को उसके कारण होने वाली कठिनाई से बचाने के लिए है।

मामला यह था कि शिक्षक ने साल 1973 में स्टडी लीव ली लेकिन उन्हें इंक्रीमेंट देते समय उस अवकाश की अवधि पर विचार नहीं किया गया था। 24 साल बाद 1997 में उन्हें नोटिस जारी किया गया और 1999 में उनके रिटायर होने के बाद उनके खिलाफ वसूली की कार्यवाही शुरू की गई।

इसके खिलाफ उन्होंने पहली बार केरल के मुख्यमंत्री के सार्वजनिक निवारण शिकायत ब्रांच से संपर्क किया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली जिसके बाद वो हाई कोर्ट पहुंचे। यहां उनकी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट पहुंचे जहां उनके हक में फैसला आया।

अपने पहले के फैसलों का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई सरकारी कर्मचारी, विशेष रूप से जो सेवा के निचले पायदान पर है, जो भी राशि प्राप्त करता है, उसे अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए खर्च करेगा।

पीठ ने कहा कि लेकिन जहां कर्मचारी को पता है कि प्राप्त भुगतान देय राशि से अधिक है या गलत भुगतान किया गया है या जहां गलत भुगतान का पता जल्दी ही चल गया है तो अदालत वसूली के खिलाफ राहत नहीं देगी।

पीठ ने केरल के एक सरकारी शिक्षक के पक्ष में फैसला सुनाया जिसके खिलाफ राज्य की ओर से गलत तरीके से वेतन वृद्धि देने के लिए वसूली की कार्यवाही शुरू की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी 20 साल की कानूनी लड़ाई को समाप्त कर दिया।

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