28-29 मार्च की मज़दूर हड़ताल को सफल बनाओ! -मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)

हड़ताल को नए लेबर कोड के खात्मे के साथ मज़दूर हित में क़ानून बनाने, देश बेचो अभियान पर रोक लगाने व सभी प्रकार की लूट के खात्मे के सतत व जुझारू आंदोलन में बदलने के लिए भी ताक़त लगाएं!

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने मोदी सरकार द्वारा बनाई गई मज़दूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं को रद्द करने, मज़दूरों की रोजी रोटी छीनने वाली निजीकरण, मुद्रीकरण, ठेका प्रथा जैसी जनविरोधी नीतियों पर रोक लगवाने आदि माँग के साथ आगामी 28 और 29 मार्च को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है।

देशभर के कई संघर्षशील ट्रेड यूनियनों व मज़दूर संगठनों के साझा मंच ‘मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान’ (मासा) ने इस हड़ताल का समर्थन करते हुए एक पर्चा जारी किया है, जिसे हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं।

मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA) का आह्वान

28-29 मार्च, 2022 की मज़दूर हड़ताल को सफल बनाओ!

  • मज़दूर विरोधी 4 श्रम संहिताएं रद्द करो!
  • सभी मज़दूरों को न्यूनतम मजदूरी ₹25000 व श्रम कानूनों की सुरक्षा सुनिश्चित करो!
  • ठेकेदारी प्रथा खत्म करो!
  • सार्वजनिक संपत्तियों का निजीकरण-मुद्रीकरण बंद करो!

रस्म अदायगी नहीं हड़ताल को मज़दूर वर्ग के निरंतर जुझारू और निर्णायक संघर्ष में तब्दील करो!

केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने आगामी 28 और 29 मार्च को मोदी सरकार द्वारा बनाई गई मज़दूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को रद्द किये जाने की मांग के साथ साथ मज़दूरों की रोजी रोटी छीनने वाली निजीकरण, मुद्रीकरण, ठेका प्रथा जैसी जनविरोधी नीतियों पर रोक लगवाने के लिए देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है। शुरू से ही ट्रेड यूनियन व मज़दूर संगठनों का मानना है कि संघर्षों से हासिल श्रम कानूनों को खत्म करके जो चार श्रम संहिताएं बनाई गई हैं वे पूरी तरह मज़दूर हितों के खिलाफ हैं। यहां तक कि सत्ताधारी दल से जुड़े संगठन बीएमएस ने भी साफ तौर पर कहा है कि नए लेबर कोड मज़दूर विरोधी हैं। मज़दूर संगठनों के पुरजोर विरोध के बावजूद मोदी सरकार ने ये श्रम संहिताएं क्यों बनाई हैं?

कॉरपोरेट्स व बड़े पूंजीपतियों की पिछले लंबे समय से ऐसे मज़दूर विरोधी कानून बनाने की मांग रही है। बात स्पष्ट है कि मोदी सरकार ने ये नए लेबर कोड पूंजीपतियों के हित में बनाए हैं। इन लेबर कोडस् के लागू होने के बाद मज़दूरों की स्थिति अधिकार विहीन गुलामों जैसी हो जाएगी। किसानों के जुझारू आंदोलन से डरी मोदी सरकार अभी तक लेबर कोडस् को लागू नहीं कर सकी है किंतु मौका देख यथाशीघ्र लागू करने की फिराक में है।

इन श्रम संहिताओं में यूनियन बनाने और हड़ताल करने के अधिकार को पेचीदा व आपराधिक बना दिया गया है। हायर एंड फायर नीति लागू करना, मज़दूरों को ठेका श्रम और कैजुअल नौकरियों में धकेल दिया जाना, सामूहिक सौदेबाजी के बजाय व्यक्तिगत वार्ता, आदि के प्रावधान किये गए हैं। इनमें कोई भी प्रावधान मज़दूरों की जायज मांगों को पूरा करने में अक्षम है- जैसे की ठेका और स्थायी श्रमिकों के बीच समानता, समान काम की समान मज़दूरी, नौकरी की सुरक्षा, न्यूनतम मज़दूरी के स्वीकृत फार्मूले के कार्यान्वयन आदि का पालन।

न्यूनतम मज़दूरी भुगतान, ईएसआई, पीएफ, काम के दौरान मज़दूरों की सुरक्षा पर मालिकों की जिम्मेदारी से छूट देकर दोषी मालिकों को मिलने वाली सजा को एक प्रकार से खत्म कर दिया गया है। मज़दूरों की शिकायत पर श्रम निरीक्षकों द्वारा कम्पनियों के औचक निरीक्षण के अधिकार पर रोक लगा दी गई है। स्वतंत्र न्यायालयों की जगह न्यायाधिकरण बनाने की बात की गई है। न्यायाधिकरणों में स्वतंत्र जजों की बजाए सरकारी जज के साथ नौकरशाह बैठेंगे। इनके फैसलों को सिविल कोर्ट में भी चुनौती नहीं दी जा सकेगी। कारखाना की परिभाषा बदल कर मज़दूर वर्ग के बड़े हिस्से को श्रम कानूनों के दायरे से बाहर कर दिया गया है।

ठेकेदारी प्रथा को खत्म करने के बजाय सरकार नीम (NEEM ) ट्रेनी व फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट (FTE ) आदि कानूनों के जरिए इसे बढ़ावा दे रही है। इसपे तुर्रा यह की नए श्रम कोड में ठेकेदार को भी नियोक्ता मान के समस्या को हल करने के बजाये, इस मुद्दे से पीछा छुड़ा लिया गया है। महिला मज़दूरों की सुरक्षा का सवाल एक बड़ा सवाल है। पुराने श्रम कानूनों में कम्पनियां महिलाओं से रात की पाली में काम नहीं ले सकतीं थीं। लेकिन अब मालिकों को बगैर उचित सुरक्षा प्रावधान के रात की पाली में भी महिलाओं से काम लेने की इजाजत दे दी है। स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माने जाने वाले उद्योगों में भी महिलाओं व बच्चों से काम लेने की छूट दी गई है।

आज देश मे बेरोजगारी अपने चरम पर है। हांलाकि शारीरिक श्रम सहित सभी किस्म का श्रम सम्माननीय है, फिर भी उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवानों को चाहत के अनुसार नौकरी नहीं मिल पा रहा है। अतः उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान भी हार-थक कर चपरासी व गार्ड जैसी नौकरी करने को मजबूर हैं। सम्मानजनक नौकरी नहीं मिलने से नौजवान अब आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं। जिन सरकारी संस्थानों में युवाओं को सरकारी नौकरी मिल सकती है, उनका तेजी से निजीकरण, निगमीकरण किया जा रहा है।

निजीकरण उदारीकरण की नीतियों के द्वारा बैंक, बीमा, टेलीकॉम, इंधन आयल, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल-जंगल-जमीन आदि को कॉरपोरेट पूंजीपतियों को सौंप दिया गया है, अथवा सौंपने की प्रक्रिया चल रही है। सरकार के “राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन” का अर्थ है कि जितना भी संभव हो राष्ट्रीय सम्पति को बेचना – स्वाभाविक रूप से, कॉर्पोरेट्स को ही। सड़क, रेल नेटवर्क, एयरलाइंस, दूरसंचार नेटवर्क बेचा जा रहा है। एयर इंडिया, बीपीसीएल, आईडीबीआई, कोयला खदानों और सभी बड़े सरकारी निगमों को बिक्री के लिए तैयार किया जा रहा है, जिसका मज़दूरों पर प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ने वाला है।

इनमें से ज्यादातर को यह सरकार अपने पसंदीदा पूंजीपतियों- टाटा, अडानी और अंबानी को ही बेचे। बंदरगाहों, मरीन्स और अन्य तटीय “बुनियादी ढांचे” के निर्माण के लिए भारत की तटरेखा भी मुख्य रूप से अडानी को बेची जा रही है। मुंबई, पारादीप और कोच्चि जैसे प्रमुख बंदरगाह भी तेजी से निजीकरण की राह पर हैं। जो सार्वजनिक क्षेत्र के मज़दूर पहले अपने नियोक्ता से उचित और निष्पक्ष कार्रवाई का दबाब बनाने में सक्षम थे, अब निजी क्षेत्र की सनक के भरोसे छोड़ दिए जायेंगे। यहाँ तक की दलित और आदिवासी भी अपने हिस्से का दावा करने में जहां सक्षम थे, अब उनके पास भी कोई अधिकार नहीं बचेगा।

देश की सत्ता व संसाधनों पर कोरपोरेट्स के नियंत्रण के कारण बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी से देश के मज़दूर, गरीब किसान, छोटे व्यापारी अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं। अभी हाल में ईपीएफ पर ऐतिहासिक रूप से ब्याज दर कम करके कमर्चारियों-मज़दूरों पर एक और हमला बोला गया है। देश में गरीबी-अमीरी के बीच खाई तेजी से बढ़ रही है। महिला हिंसा, दलितों, आदिवासियों-अल्पसंख्यकों पर अपराध की घटनाएं बढ़ रही हैं। सत्ता के गलियारों में अपराधियों का कब्जा है।

काले दमनकारी कानूनों के जरिये पुलिसिया आतंक मेहनतकश जनता एवं उनके पक्षधर बुद्धिजीवी कार्यकर्ताओं पर कहर बरपा रहा है। मज़दूरों-मेहनतकशों का जीवन चौतरफा संकटों से घिरा है और वे संकट से निजात पाना चाहते हैं। सरकार को भय है कि मज़दूर भी किसानों की तरह मज़दूर विरोधी कानून व नीतियों तथा शोषण दमन की जड़ वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के रास्ते पर न चल पड़ें इसलिए वह मज़दूर वर्ग को विभाजित करने के लिए अंध देशभक्ति और हिंदुत्ववाद के सिद्धांतों को आगे बढ़ा रही है। वे लगातार लोगों का ध्यान गैर-मुद्दों की ओर मोड़ते हैं कि लोग क्या खाते हैं और क्या पहनते हैं।

दुर्भाग्य से स्थापित मज़दूर संगठनों का नेतृत्व मज़दूर वर्ग को ऐसे प्रभावों से बचाने में और निरंतर जुझारू व निर्णायक संघर्ष करने में असफल रहा है। वे एक दो दिन की हड़ताल की रस्म अदायगी तक ही अपने आप को सीमित रखे हुए हैं जबकि आज मज़दूर वर्ग को अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर जुझारू व निर्णायक आंदोलन छेड़ने की जरूरत है।

अत: साथियों मासा अपील करता है कि सभी मज़दूर 28 और 29 मार्च 2022 की अखिल भारतीय हड़ताल में बढ़चढ़ कर भाग लेकर कामयाब बनायें। यह मज़दूरों और सभी लोकतांत्रिक ताकतों के साथ हाथ मिलाके एक व्यापक जन आंदोलन और प्रतिरोध की शुरुआत हो सकती है। हड़ताल को मज़दूर विरोधी लेबर कोडस् को रद्द करवाने, निजीकरण, निगमीकरण, ठेका प्रथा जैसी नीतियों पर रोक लगवाने के साथ-साथ मोदी सरकार की विभाजनकारी हिंदुत्ववादी फासिस्ट एजेण्डा को परास्त करने के लिए राष्ट्रव्यापी संघर्ष खड़ा करें तभी मज़दूर वर्ग अपनी मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। मासा की यह स्पष्ट मांग है की आशा-मनरेगा-आंगनबाड़ी -एनएचएम जैसे सभी स्कीम कर्मचारियों को अविलम्ब नियमित और स्थायी किया जाये और साथ में सभी सुविधाओं सहित सम्मानजनक मज़दूरी दिया जाये।

साथियों आप जानते हैं कि 23 मार्च को शहीद-ए-आज़म भगत सिंह व उनके साथियों राजगुरु व सुखदेव का शहादत दिवस है, उन्होंने आजादी के आंदोलन के दौरान कहा था- “हम यह कहना चाहते हैं कि युद्ध छिड़ा हुआ है और यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है- चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपतियों के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तो भी स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता।”

उनकी यह बात पूरी तरह सच है। यह युद्ध आज भी जारी है। आजादी के बाद शक्तिशाली व्यक्तियों पूंजीपतियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है जिसकी वजह से मेहनतकश लोगों की दुर्दशा हो रही है और मेहनतकश जन के पास अपनी दुर्दशा से छुटकारा पाने का केवल एक ही रास्ता है कि वे अपनी संगठित ताकत के दम पर भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर शक्तिशाली व्यक्तियों के एकाधिकार को खत्म कर दें और अपना सामूहिक अधिकार कायम कर लें।

आइये इस दो दिवसीय हड़ताल को सफल बनाएं! नए लेबर कोड के खात्मे के साथ मज़दूर हित में क़ानून बनाने, देश बेचो अभियान पर रोक लगाने व सभी प्रकार की लूट के खात्मे के सतत व जुझारू आंदोलन में इसे बदलने के लिए ताक़त लगाएं! सब मजदूर मिलकर अपनी मुक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ें!

  • मजदूर एकता जिंदाबाद!
  • नए श्रम कानून मुर्दाबाद!
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण पर रोक लगाओ!

इंकलाब जिंदाबाद !    मज़दूर एकता जिंदाबाद !     मज़दूर वर्ग पर हमला नहीं सहेंगे!

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA)

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