दलित उत्पीड़न व संघर्ष पर केंद्रित फिल्म “जय भीम” : नई सोच लेकिन सीमा भी स्पष्ट

मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस चंद्रा के एक चर्चित केस पर आधारित यह फिल्म तमिलनाडु की एक जनजाति के उत्पीड़न और संघर्ष को दिखाती है, लेकिन क़ानूनी लड़ाई तक सिमट गई है।

आइए सार्थक फिल्मों को जानें- 14

जय भीम

एक संघर्ष जो जनपक्षधर वकालत तक सिमट गया, क्रांतिकारी राजनीति का सवाल अधुरा रह गया

इस मूवी में एक वकील रहता है जोकि बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और मार्क्स, लेनिन आदि की विचारधारा लेकर काम करता है। विचारधाराओं का ये मिश्रण और इस मिश्रण से जनसंघर्ष, यह इस फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु भी है और उद्देश्य भी। इसके बार में आगे बात करेंगे, पहले इसकी कहानी पर एक नजर डालते हैं।

फिल्म में साफ-साफ जातिवाद को लेकर बताया गया है कि छोटी कहलाई जाने वाली जाति को कैसे पुलिस का, मालिक का, पैसे वाले लोगों का और कानूनी ढांचे का चौतरफा अत्याचार सहना पड़ता है। फिल्म में एक गर्भवती महिला के पति की झूठे षड्यंत्र में फंसा कर पुलिस द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वह सपेरा जाति से ताल्लुक रखता है और सांप पकड़ कर, सांप का जहर उतार कर और ईंट के भट्टे पर काम करके अपना गुजारा चलाता है।

इन लोगों को स्कूल में दाखिल होने का अधिकार नहीं होता है, इनके पास पक्का मकान नहीं होता है और इनका रहने का कोई पता नहीं होता, यानी यह कहां रहते हैं इसका कोई कागज नहीं है। इस तरीके से बहुत से लोग देश के वोटर लिस्ट में भी शामिल नहीं है। ऐसे में छोटी कहलाने वाली जातियों पर बहुत अत्याचार किया जाता है और फर्जी केस डाल कर इनको बड़ी साजिश द्वारा फँसा दिया जाता है। फिल्म में एक वकील रहता है जो उस गर्भवती महिला को न्याय दिलाने के लिए कठिन परिश्रम करता है।

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लेखक-निर्देशक : टीजे ग्नानवेल, अभिनय : सूर्या, लिजोमोल जोस, के मणिकंदन, राजिशा विजयन, राव रमेश, प्रकाश राज

पिछले कुछ सालों में क्षेत्रीय भाषाओं में जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न को दर्शाते हुए बहुत-सी फिल्में बनी हैं, कुछ फिल्में हिन्दी में भी आई हैं। इन तमाम फिल्मों से एक कदम आगे जाते हुए जय भीम मूवी में दलित मुद्दे को कम्युनिस्ट सोच के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। फिल्म का हीरो, हमारा वकील, खुद एक कम्युनिस्ट है जो कम्युनिस्ट पार्टी के साथ काम भी करता है।

इसमें कम्युनिस्ट के काम करने के बहुत से सकारात्मक पहलू दिखाए गए हैं जैसे कि दलित बस्तियों में शिक्षा का काम जिसमें शिक्षा को समाज कि मुक्ति और अधिकारों से जोड़ा गया है, उदाहरण के लिए, “प से पट्टा”। संगठन की शक्ति को दिखाया गया है, पर्चा बाँटना, विरोध प्रदर्शन करना, हड़ताल जैसी चीजें दिखाई गई हैं। सपेरा जाती का चित्रण भी काफी अच्छा है। फिल्म दिखने में भी काफी खूबसूरत है।

लेकिन इस फिल्म में कुछ बड़ी कमियाँ हैं। सबसे पहली तो ये कि कम्युनिस्ट विचारधारा के चित्रण में पूंजीपति और मालिक वर्ग इस फिल्म से गायब हैं। सारा दोष पुलिस का ही दिखाया गया है, जैसे कि जातिवाद के पीछे सिर्फ भ्रष्ट पुलिस कर्मचारी ही हैं।

इस मूवी में न्याय व्यवस्था को करीब से दिखाया गया है और ये भी दिखाया गया है कि अगर न्याय व्यवस्था में अच्छे वकील हों तो न्याय के बहुत से रास्ते हैं, पर असलियत में क्या लोगों को न्याय मिल पाता है? तारीख पर तारीख चलती रहती है, कई पीढ़ियों तक तारीख चलती रहती है, पर न्याय नहीं मिल पाता  है। मिलता है तो इतना ही कि लोगों का गुस्सा शांत हो जाए, लोगों की छोटी-मोटी मांग पूरी कर लोगों को दबा दिया जाए।

फिल्म में इस तरीके से दिखाया गया है कि कानून व्यवस्था से सब ठीक हो सकता है। कानून व्यवस्था से सब ठीक नहीं हो सकता है। हाँ लेकिन जब हम हमारे अधिकारों के लिए मांग करते हैं, तो जरूर इसी न्याय व्यवस्था के माध्यम से 144 की धारा लगाकर लोगों को एक जगह इकट्ठा नहीं होने दिया जाता है, हड़ताल पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज करवा दिया जाता है, गोली मारी जाती है, आंसू गैस बरसाए जाते हैं!

क्या मजदूर को अपने हक के अधिकार मिल जाते हैं कानून व्यवस्था से? क्या महिलाओं को रोजगार का समान वेतन मिल जाता है कानून व्यवस्था से? हमारे सबसे महत्वपूर्ण और बड़े कानून, हमारे मूल अधिकारों से जुड़े कानूनों को ही ले लें – क्या हम आज भी समान, स्वतंत्र हो पाए हैं? क्या महिलायें और दलित समान और स्वतंत्र नागरिक हैं? क्या शोषण के विरुद्ध कानूनों से हमारे शोषण खत्म हो गए? धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार और धर्मनिरपेक्षता संविधान में तो हैं, लेकिन क्या आज भी हमारे देश में हिंदू-मुस्लिम दंगे-झगड़े नहीं होते हैं? क्या आज भी हमारे देश का माहौल सांप्रदायिकता से भरा नहीं है?

कानून व्यवस्था से सब कुछ ठीक नहीं होता दोस्तों, बस हक के लिए लड़ने के लिए थोड़ी जगह मिल जाती है। लेकिन वो भी आज तेजी से खत्म हो रही है, देश दुनिया का माहौल ऐसा हो गया है कि लोकतान्त्रिक संघर्षों को निर्मम दमन से कुचल दिया जाता है, इस बारे में इस फिल्म में कोई जिक्र नहीं है।

फिल्म को एक बार जरूर देखें, इसमें संघर्ष के दो रूपों की संभावनाएँ और सीमाएँ देखने को मिलेंगी, सिस्टम के अन्दर एक संघर्ष जो दिखाया गया है और सिस्टम बदलने का संघर्ष जो नहीं दिखाया गया है। खासकर वो साथी जरूर देखें जो सामाजिक बदलाव से जुड़े हैं या जुड़ना चाहते हैं, ये फिल्म आपको सोचने पर मजबूर करेगी कि आप क्या करना चाहते हैं – सिस्टम के अन्दर जनपक्षधर वकालत या क्रांतिकारी राजनीति?

नौजवान पत्रिका ‘गोफण’ (अंक-1, जनवरी 2022) में प्रकाशित, साभार

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