साढ़े नौ साल बाद अन्यायपूर्ण सजा झेलते मारुति के दो और साथियों संदीप व सुरेश को मिली जमानत

साथी संदीप ढिल्लों और सुरेश को आज जमानत मिली, जबकि रामबिलास को नवंबर में मिली थी। सजा झेलते 13 अगुआ मज़दूरों में से दो पवन दहिया व जिया लाल की दुखद मौत हो चुकी है।

चंडीगढ़ उच्च न्यायलय से मिली ज़मानत, अभी आठ साथियों की जमानत बाकी

साढ़े नौ साल जेल में बिताने के बाद मारुति सुजुकी वर्कर्स यूनियन के सदस्य व संघर्षशील साथी संदीप ढिल्लों और सुरेश को आज 19 जनवरी को पंजाब हरियाणा उच्च न्यायलय से ज़मानत मिल गई। अन्यायपूर्ण सजा झेलते 8 मज़दूर अभी भी जेल में हैं। इनमें से एक यूनियन सदस्य, साथी सोहन को ज़मानत नहीं मिल सकी है।

आज साथी संदीप और सुरेश के साथ अन्य साथी सोहन की जमानत की भी अर्जी लगी थी, लेकिन उच्च न्यायलय द्वारा उनकी जमानत की गुंजाइश को न देखते हुए वकीलों ने उनकी जमानत की अपील फिलहाल वापस ले ली है।

ज्ञात हो कि अन्यायपूर्ण सजा झेलते 13 मज़दूरों में से दो साथियों पवन दहिया व जिया लाल की बीते साल दुर्भाग्यपूर्ण दुखद मौत हो गई थी। जबकि बीते 24 नवंबर को साथी रामबिलास को चंडीगढ़ उच्च न्यायालय से ही जमानत मिली थी।

अब शेष 8 साथियों की जमानत की कोशिशें जारी हैं। साथ ही उन सभी साथियों की बेगुनाही के लिए क़ानूनी लड़ाई जारी है।

किस अन्याय का दंड झेल रहे हैं मारुति मज़दूर

18 जुलाई, 2012 को मारुति सुजुकी, मानेसर प्लांट में हुई साजिशपूर्ण घटना में एक मैनेजर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत का सहारा लेकर कंपनी प्रबंधन व हरियाणा सरकार की मिलीभगत से 148 मज़दूरों को जेल के अंदर डाल दिया गया था।

वह भारी दमन चक्र का दौर था, जिसमें सरकार-मालिक गँठजोड़ खुलकर सामने आया था, जो आज भी जारी है। निर्दोष 148 मज़दूरों को पुलिस व जेल की यातनाएं सहनी पड़ी। करीब ढाई हजार स्थाई-अस्थाई मज़दूरों को अवैध रूप से कंपनी से निकाल दिया गया, जिनका संघर्ष आज भी जारी है।

18 मार्च 2017 को सेशन कोर्ट गुडगांव द्वारा इस प्रकरण पर अपना फैसला सुनाया गया, जिसमें 117 मज़दूरों को बरी कर दिया गया, 13 अगुआ मज़दूर साथियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। ये नेतृत्वकारी 13 मज़दूर जेल की कालकोठरी में अन्यायपूर्ण उम्रक़ैद की सजा भुगतते रहे।

इस दौरान दो साथियों साथी पवन दहिया व जिया लाल की बीते साल अकस्मात दुखद मृत्यु हो गई थी। साथी पवन की पैरोल के दौरान घर पर बिजली का करंट लगाने से, जबकि साथी जिया लाल की कैंसर से अकाल मौत हुई थी।

लंबे संघर्ष के बाद भी इन साथियों को कोई कानूनी राहत नहीं मिल पाई। उच्च व उच्चतम न्यायालय से भी लगातार जमानत याचिका खारिज होते जाने के बाद एक निराशा का दौर रहा।

इस निराशा में भी सभी मज़दूरों के वर्गीय भाईचारे ने जेल में बन्द साथियों को हताश नहीं होने दिया। मारुति सुजुकी मज़दूर संघ की यूनियनों के साथ अन्य प्लांट के मज़दूरों ने अपने भाईचारे का फ़र्ज़ निभाते हुए इनके परिवारों की देखभाल की। इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले मारुति सुजुकी प्रोविजनल कमेटी के साथियों ने भी हर स्तर पर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

10 वर्षों से ये साथी न्याय की उम्मीद में आस लगाए हुए बिना किए अपराध के सजा काट रहे हैं।

संघर्ष अभी जारी है

साढ़े नौ साल कालकोठरी में बिताने के बाद साथी रामबिलस को नवंबर में और साथी संदीप व सुरेश को जमानत मिल सकी।

अभी भी आठ साथियों की जमानत और सभी बचे 11 साथियों की बाइज्जत रिहाई के संघर्ष के साथ क़रीब 2500 स्थाई व स्थाई मज़दूर, जो अवैध बर्खास्तगी झेल रहे हैं, की कार्यबहाली का संघर्ष भी जारी है।

न्यायपालिका तक जमानत याचिका को खारिज करने का कारण विदेशी पूँजीनिवेश प्रभावित होना बताती रही। यानी पूरा तंत्र मालिकों के पक्ष में खड़ा है। पिछले साढ़े नौ सालों से देश व दुनिया की तमाम यूनियनों द्वारा एक निष्पक्ष न्यायिक जाँच की माँग पूंजीपतियों और सरकार के गठबंधन से दरकिनार होती रही और मज़दूरों का लंबा संघर्ष जारी है।

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मारुति संघर्ष गाथा- 

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