उत्तराखंड : चुनाव आचार संहिता के बहाने मज़दूरों का दमन क्यों?

इंटरार्क मज़दूरों को मिला नोटिस। संघर्षरत माइक्रोमैक्स, एचपी, इंटरार्क, करोलिया आदि मज़दूर आंदोलनों को दबाने के लिए प्रशासन ने एक बार फिर चुनाव आचार संहिता का चाबुक चलाना शुरू कर दिया है।

उत्तराखंड सहित पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा के साथ ही मज़दूरों के दमन का एक नया दौर शुरू हो गया है। छँटनी, बंदी, बर्खास्तगी और शोषण-उत्पीड़न-दमन के खिलाफ संघर्षरत मज़दूरों को प्रशासन कोई न्याय नहीं दे सकता, लेकिन तरह-तरह से मज़दूरों का दमन जरूर तेज कर रहा है। कभी कोविड-19 के बहाने तो कभी चुनावी आचार संहिता के बहाने।

यह सर्वविदित सत्य है कि चुनाव आचार संहिता केवल चुनाव लड़ने वाली पार्टियों या प्रत्याशियों पर लागू होता है। यह भी स्पष्ट तथ्य है कि चुनाव की अशांति को रोकने के लिए खतरनाक अपराधियों को जिला बदर किया जाए। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से उत्तराखंड में यह एक नई परंपरा शुरू हुई है कि चुनाव आचार संहिता के बहाने संघर्षरत मज़दूरों का दमन बढ़ाया जाए।

अभी उत्तराखंड में जैसे ही चुनाव की घोषणा हुई चुनाव आचार संहिता लागू हो गई। ऊपर से नीम में करेला यह कि कोविड-19 की तीसरी लहर का हौवा है। प्रशासन ने दोनो हवाले के साथ जिले में धारा-144 लागू करके संघर्षरत मज़दूरों सहित सभी नागरिकों के वैधानिक अधिकार सीज कर दिए।

ऐसे में गैर कानूनी छँटनी के खिलाफ 3 साल से संघर्ष कर रहे भगवती-माइक्रोमैक्स के मजदूर हों, गैरकानूनी बंदी के खिलाफ एचपी इंडिया के संघर्षरत मज़दूर हों अथवा अवैध बर्खास्तगी और मांग पत्र के लिए लड़ते इंटरार्क पंतनगर और किच्छा के मज़दूर हों, या फिर करोलिया लाइटिंग के मज़दूर। अपने हक हकूक के लिए संघर्षरत इन मज़दूरों के आंदोलन को कुचलने के लिए प्रशासन ने एक बार फिर चुनाव आचार संहिता का चाबुक चलाना शुरू कर दिया है।

श्रमिक संयुक्त मोर्चा ने संघर्षरत मज़दूरों के पक्ष में रैली-प्रदर्शन का कार्यक्रम लिया था, लेकिन प्रशासन ने चुनाव आचार संहिता, कोविड व धारा-144 का रूआब दिखलाकर अनुमति नहीं दी।

अब कंपनी गेट पर धरनारत इंटरार्क के मज़दूरों को प्रशासन ने नोटिस भेज दी है कि यदि वे कंपनी गेट पर भी धरना चलाएंगे तो उन पर कार्यवाही होगी। इसी तरह श्रम भवन हल्द्वानी से एचपी मज़दूरों का धरना स्थगित करवा दिया गया।

रुद्रपुर स्थित श्रम भवन में बाकायदा एक नोटिस चस्पा हो गई, जिसमें धारा-144 के हवाले से धरना-प्रदर्शन पर रोक के साथ कार्यवाही का डंडा दिखाया गया है।

ज्ञात हो कि साल 2019 में लोकसभा चुनाव के दरमियान जिला प्रशासन ने हद ही पार कर दी थी, जब भगवती-माइक्रोमैक्स और इंटरार्क के मज़दूरों को चुनाव के लिए खतरनाक साबित होने संबंधी नोटिस जारी करके पाबंद कर दिया था। विगत दो वर्षों से कोविड-19 के बहाने मज़दूरों के आंदोलन, धरना-प्रदर्शन को प्रशासन ने प्रतिबंधित रखा।

सवाल यह है कि कंपनियों के भीतर सैकड़ों श्रमिक एक साथ काम करते हैं तब कोविड गाइडलाइंस का कोई उल्लंघन नहीं दिखता है, लेकिन चंद मज़दूर अगर अपने हक के लिए एक साथ एकत्रित होते हैं, तो कोविड-19 का उल्लंघन कैसे हो जाता है? मज़दूर चुनाव में भागीदारी नहीं कर रहे लेकिन चुनाव के लिए क्यों खतरनाक साबित होने लगते हैं?

यह मज़दूरों के साथ घोर अन्याय है। यह एक भयानक दौर की बानगी मात्र है। निश्चित रूप से दमन के बढ़ते इस दौर का एक महत्वपूर्ण कारण मज़दूरों की व्यापक एकता का अभाव है। इसके खिलाफ एकजुट संघर्ष ही इसका जवाब है, जैसा किसान आंदोलन ने दिखाया।

ऐसे में प्रशासन और सरकारें मज़दूरों को बाध्य कर रही हैं कि वह इन नाइंसाफ़ियों और निरंकुशता के खिलाफ अपने संघर्ष को मजबूत करें।

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