9 साल से अन्यायपूर्ण सजा झेलते मारुति के एक मज़दूर नेता रामबिलास को मिली जमानत

दमन के बीच संघर्षों के लगातार सिलसिले के दौरान किसान आंदोलन में एक ऐतिहासिक जीत के बाद साथी रामबिलास की जमानत संघर्षरत मारुति मज़दूरों में उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई है।

पिछले 9 साल से ज्यादा समय से जालिमाना उम्र क़ैद झेलते मारुति सुजुकी मनेसर के 13 साथियों में से एक साथी रामबिलास को चंडीगढ़ उच्च न्यायालय से अंततः जमानत मिल गई।

ज्ञात हो कि अन्यायपूर्ण सजा झेलते मज़दूरों में से दो साथियों पवन दहिया व जिया लाल की इसी साल दुर्भाग्यपूर्ण मौत हो गई थी।

आज (24 नवंबर) पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा इन साथियों की जमानत याचिका पर सुनवाई थी, जिनमें से साथी रामबिलास को जमानत मिल गई है, जबकि अन्य 10 साथियों की याचिका पर सुनवाई जनवरी व फरवरी में होगी। मज़दूरों की ओर से इस केस की पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता ए पी एस देओल ने की।

असल में क्या हुआ था, जिसका दंड झेल रहे हैं मारुति मज़दूर

18 जुलाई, 2012 को मारुति सुजुकी, मानेसर प्लांट में हुई साजिशपूर्ण घटना में एक मैनेजर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत का सहारा लेकर कंपनी प्रबंधन व हरियाणा सरकार की मिलीभगत से 148 मज़दूरों को जेल के अंदर डाल दिया गया था।

उल्लेखनीय है कि मारुति मानेसर प्लांट में हुई 18 जुलाई 2012 की घटना के बाद से जिस तरीके से मज़दूरों पर दमन चक्र चलाया जा रहा था, वह निरंतर चल रहा था। 18 जुलाई की घटना के बाद रात 12:00 बजे कराई गई एफआईआर के बाद अगले ही दिन से निर्दोष 148 मज़दूरों को जेल की यातनाएं सहनी पड़ी।

18 मार्च 2017 को सेशन कोर्ट गुडगांव द्वारा इस प्रकरण पर अपना फैसला सुनाया गया, जिसमें 117 मज़दूरों को बरी कर दिया गया, 13 अगुआ मज़दूर साथियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। इनमें से 2 साथी पवन दहिया व जिया लाल की इसी साल अकस्मात मृत्यु हो गई थी।

पवन की पैरोल के दौरान घर पर बिजली का करंट लगाने से , जबकि जिया लाल की कैंसर से अकाल मौत हुई थी।

लंबे संघर्ष के बाद भी इन साथियों को कोई कानूनी राहत नहीं मिल पाई। उच्च व उच्चतम न्यायालय से भी लगातार जमानत याचिका खारिज होते जाने के बाद एक निराशा का दौर रहा।

इस निराशा में भी सभी मज़दूरों के वर्गीय भाईचारे ने जेल में बन्द साथियों को हताश नहीं होने दिया। मारुति सुजुकी मज़दूर संघ की यूनियनों के साथ साथ अन्य प्लांट के मज़दूरों ने इन साथियों की गैर मौजूदगी में अपना भाईचारे का फ़र्ज़ निभाते हुए इनके परिवारों की देखभाल की। इस आंदोलन की अगुवाई करने वाले प्रोविजनल कमेटी के साथियों ने भी हर स्तर पर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कोरोना महामारी में मज़दूरों ने अपने 2 अहम साथियों को खोया, लेकिन उस दौरान अन्य सभी साथी भी पैरोल पर अपने परिजनों के साथ रहे। 10 वर्षों से ये साथी न्याय की उम्मीद में आस लगाए हुए बिना किए अपराध के सजा काट रहे हैं।

अन्याय के बीच उम्मीद की नई किरण

18 जुलाई 2012 से दमन झेलते जेल में बंद रहे मज़दूरों के संबंध में 18 मार्च 2017 को सेशन कोर्ट गुडगांव ने 117 मज़दूरों को बाइज्जत बरी किया व 31 लोगों को दोषी करार दिया। जिनमें से 13 मज़दूर जेल की कालकोठरी में अन्यायपूर्ण उम्रक़ैद की सजा भुगतते रहे। इस दौरान दो साथियों की दुखद मौत हुई। और अब जाकर साथी रामबिलस को जमानत मिल सकी।

अभी भी 10 साथियों की जमानत और सभी बचे 11 साथियों की बाइज्जत रिहाई के संघर्ष के साथ क़रीब 2500 स्थाई व स्थाई मज़दूर, जो अवैध बर्खास्तगी झेल रहे हैं, की कार्यबहाली का संघर्ष जारी है।

पिछले 9 सालों से देश व दुनिया की तमाम यूनियनों द्वारा एक निष्पक्ष न्यायिक जाँच की माँग पूंजीपतियों और सरकार के गठबंधन से दरकिनार होती रही और मज़दूरों का 10 वर्षों से संघर्ष जारी है। न्यायपालिका तक जमानत याचिका को खारिज करने का करण विदेशी पूँजीनिवेश प्रभावित होना बताती रही। यानी पूरा तंत्र मालिकों के पक्ष में खड़ा है।

अभी भी 10 मज़दूरों की जमानत बाकी है, जो साढ़े नौ साल से जेल की कलकोठरियों में बंद हैं। असल में संघर्ष के इस मुक़ाम पर अन्यायपूर्ण क़ैद झेलते 11 मज़दूरों की बाइज्जत रिहाई का संघर्ष जारी है, जबकि बर्खास्त मज़दूर आज भी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

इस जमानत के साथ उम्मीद की ये छोटी सी किरण ही समस्त परिवारों में उजाला फैलाएगी।

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