उदारीकरण 13वीं किस्त : कॉरपोरेट पूँजी और फासीवाद के गँठजोड़ से तबाही ही बन गया तरक़्क़ी

नवउदारवादी दौर में कॉरपोरेट पूँजी और फासीवाद के सहमेल ने मुनाफे की लूट और जनता में उन्माद को बेलगाम बनाया; उत्पादन में रोबोट का प्रचालन और जनता को भी रोबोट बनाने की कला विकसित हुई।…

उदारीकारण यानी मेहनतकश जनता की बर्बादी के तीन दशक -तेरहवीं किस्त

राष्ट्रवाद के नाम पर भगवाकरण और विकास के नाम पर कॉरपोरेटीकरण

जनविरोधी नव उदारवादी नीतियाँ लागू होने के साथ विगत 40 सालों से भारत में आरएसएस (संघ), भाजपा एंव अन्य आनुषंगिक संगठनों और कॉरपोरेट घरानों का वर्चस्व एक साथ तेजी से बढ़ता गया है। 1984 में जिस भाजपा के पास महज 2 सांसद थे, उसने 2014 में विराट बहुमत यूं ही हासिल नहीं कर ली।

यह उदारीकरण की वह परिघटना है, जिससे फासीवादी ताकतों ने देश-समाज के राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक हर मोर्चे पर वर्चस्व कायम किया और जन-मानस की चेतन में गहरी पैठ बनाई। जिसके चलते राष्ट्रवाद के नाम पर देश के भगवाकरण और विकास के नाम पर कॉरपोरेटीकरण (पूँजी की लूट को खुली छूट) की राह आसान हुई।

पूँजी की संस्कृति का एक रूप है उपभोक्तावादी संस्कृति। एक ऐसी संस्कृति जिसमें लोगों को अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए विवश एवं प्रेरित करता है। यही खरीद-बिक्री पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का आधार है। यह उपभोक्तावादी संस्कृति मानव को एक हवसी इंसान में तब्दील कर देती है, और महिलाओं तक को बाजारू माल के रूप में प्रस्तुत करती है। फासीवादी संस्कृति इसके साथ सहमेल करती है।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

नवउदारवादी नीतियों के साथ फासीवाद का गहरा रिस्ता है

यह यूं ही नहीं है कि इन चार दशकों में भगवाधारी संस्कृति तथा पूँजीवादी-साम्राज्यवादी संस्कृति का घिनौना गठजोड़ मुकम्मल शक्ल अख्तियार कर लिया। कथित हिन्दू धर्म आधारित फ़ासीवाद और कॉरपोरेट फ़ासीवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जनविरोधी दोनों संस्कृति ने गलबहियाँ कर लीं और जनमानस के पोर-पोर में समाती गईं।

आज धर्म का नाम इस्तेमाल करते हुए भारत में संघ-भाजपा की फासीवादी जमात पूरे देश में मेहनतकश जनता के बीच एक-दूसरे के प्रति नफरत फैला रही है। कॉरपोरेट द्वारा विकसित नई तकनीकें फासीवादी नफरत को फैलाने में कारगर और सहायक बनीं।

फासीवाद मज़दूरों में एक ऐसा ‘अँधा गुस्सा’ पैदा कर देता है जिससे मज़दूर अपने वर्ग के, मेहनतकश आबादी के हित को समझने की क्षमता खो बैठता है। उससे दोस्त और दुश्मन पहचानने की क्षमता छीन लेता है।

आरएसएस की फासीवादी विचारधारा सबसे कठोरता से इसी नीति को अपनाता है, जिसका मूल उद्देश्य मज़दूर आन्दोलन को जड़ से ख़तम करना है। इसका मतलब कुछ और नहीं बस, पूँजीपतियों द्वारा बन्दूक को आगे रख कर मज़दूर-मेहनतकशों का शोषण और लूट है।

आज के समय में भारत के मज़दूर-किसान-मेहनतकशों को नुकसान पहुँचाने के लिए आरएसएस के नेतृत्व में सारे फासीवादी संगठन कमर कसके जुट गए हैं। ये तत्व सिर्फ अपने वर्चस्व के लालच और आतंकी मानसिकता के कारण इस काम में लगे हुए हैं। भारत के पूँजीपति और साम्राज्यवादी ताकतें इनका पूरी तरह से इस्तेमाल कर रही हैं।

फासीवाद को पनपने में बढ़ता सामाजिक संकट, बेरोजगारी, हताशा के साथ ही दिमाग में घुसकर कब्जा करने का यह पूरा तंत्र, नई तकनीक और निगरानी की पूरी प्रणाली बेहद कारगर साबित हुई है। निरंकुशता और मनमानापन बढ़ाने के ये औजार फासीवाद के लिए मुफीद भी हैं।

मेहनतकशों के ऊपर दमन, लूट, शोषण बहुत ज्यादा तीखा कर देने का लक्ष्य लेकर ही पूँजीपति वर्ग इन फासीवादियों की ताक़त बढ़ाने में हर प्रकार की मदद कर रहा है। दरअसल, फासीवादियों की ताक़त और समाज में उसका असर जितना मजबूत होगा, मेहनतकशों के ऊपर दमन, लूट, शोषण और तेज कर देना उतना ही आसान हो जायेगा।

प्रगति की विरोधी है फासीवाद

फासीवाद ऐसा विचार और संगठन है, जो हर प्रकार के प्रगतिशील मूल्यों को खत्म करते हुए प्रतिगामी मूल्यों को तेजी से आगे बढ़ाती गई हैं। इसमें टीवी, इंटरनेट, मोबाइल से घर-घर में प्रवेश करना आसान बना।

इस संस्कृति की सबसे अहम विशेषता है- श्रम, विशेषकर शारीरिक श्रम करने वालों से घृणा। इनके समाज विभाजन में जो श्रमजीवी शारीरिक श्रम करता है, वही ‘नीच’ कहलाता है। इसके विपरीत जो व्यक्ति शारीरिक श्रम से जितना ही दूर है अर्थात् जितना बड़ा परजीवी है, वह उतना ही महान एवं श्रेष्ठ है।

इसीलिए यह श्रमजीवी दलितों और महिलाओं के प्रति नफरत और परजीवियों सावर्णों के प्रति सम्मान को स्थापित करता है। वे दलित व स्त्री को किसी प्रकार का जनवादी या बराबरी का हक देने को तैयार नहीं है।

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

सच बोलोगे तो मारे जाओगे !

नव उदारवादी नीतियाँ लागू होते जाने के साथ धीरे-धीरे सामाजिक-राजनैतिक स्थितियाँ बदलती गईं और राष्ट्र के मानक ऐसे बने कि सच बोलना गुनाह और राष्ट्र विरोधी कृत्य क़रार दिया गया। अब समाज उस मुक़ाम पर पहुँच गया, जहाँ प्रमाण मांगना नया अक्षम्य अपराध क़रार दिया गया है!

बस चुप रह कर देखो और स्वीकार करो। यदि अमन की बात की या उन जनविरोधी नीतियों के बारे में कुछ कहा, जो कुछ पूँजीपतियों को फायदा पहुंचा रही हैं, तो जेल में डाल दिए जाओगे!

अब तो अदालतों को भी सरकार यही निर्देश देने लगी है कि जो सत्ता कहे, उसे आदेश मान लिया जाए, न तो सुनवाई हो न ही सबूतों की बात हो, बस “राष्ट्र” को ध्यान में रखा जाए, …और राष्ट्र के बारे में बात करोगे तो मारे जाओगे!

जन विरोधी नीतियों के चार दशक पूरा होने पर इसे दिन के उजाले की तरह देखा जा सकता है।

आज जनता को मानसिक तौर पर एक ऐसा गुलाम बना दिया गया है जो रोबोट बन गई है और फासीवादी ताकतों द्वारा मनमर्जी संचालित की जा रही है। ज़िंदगी की मूल समस्याएं गायब हो चुकी है और विद्वेष चरम पर है।

यह ध्यानतलब है कि नवउदारवाद के दौर में उत्पादन का पूरा तौर-तरीका बदला है, मशीनीकरण तेज हुआ है, इंसानी हाथों को बेरोजगार बनाकर हर काम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंप्यूटर संचालित) और रोबोट से काम का प्रचालन तेजी से बढ़ा है। दूसरी तरफ फासीवादी जमात द्वारा जनता को भी रोबोट बनाने की कला विकसित हुई।

देश के रंगमंच पर जनविरोधी सरकारी नीतियों की बेलगाम गति, और आमजनता की बढ़ती तबाही के बीच तमाम खेल जारी हैं। विभ्रम के नये-नये बादल उमड़-घुमड़ रहे हैं। ….और इसमें जनता के असल मुद्दे विलुप्त हो गये हैं!

#उदारीकरण के तीन दशक – धारावाहिक-

क्रमशः जारी

अगली कड़ी में पढ़ें- इस कठिन समय में करना क्या है?

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